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व्यापार गोष्ठी: चुनावी मुद्दा कौन-महंगाई, ईंधन या करार

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 9:42 AM IST

महंगाई और करार पर ही होगी जंग
सुनील मुद्गल, कॉन्सेप्ट इंडिया प्रा.लि. फोर्ट, मुंबई


इस बार के चुनाव में परमाणु करार और महंगाई ही मुख्य मुद्दे होंगे। परमाणु करार को देश हित में बता करकेयूपीए दुबारा सत्ता में आना चाहेगी तो लेफ्ट और भाजपा इस करार को देश की सुरक्षा में खतरा बताने की कोशिश करेगी। इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच तकरार जग जाहिर है तो चुनावी मुद्दा बनना लाजमी है। दूसरा मुद्दा मंहगाई का होगा। इसी के  अंदर ईंधन की बात भी आ जाएगी।

चुनावी बजट पेश करके सरकार ने तो मार्च में ही चुनावी बिगुल फूक दिया था। किसानों को 71000 करोड़ का पैकेज देकर मनमोहन सरकार जुलाई में चुनाव कराने के  मूड में थी लेकिन महंगाई ने सरकार को अपना इरादा बदलने में मजबूर कर दिया। ताजा आंकड़ों और रिपोर्टों से साफ जाहिर है कि अप्रैल तक महंगाई काबू में आ जाएगी और सरकार का इरादा भी उसी समय चुनाव कराने का है। तब तक ईंधन की कीमतों में हुई वृध्दि को लोग भूल भी जाएंगे।

मुख्य मुद्दा रहेगा महंगाई
ओम प्रकाश मालवीय, भोपाल

वैसे देखा जाए तो इस बार का चुनावी मुद्दा महंगाई ही रहेगा। महंगाई की मार खा रहे लोग आज इसी मुद्दे को लेकर चलेंगे। कई सालों बाद इतनी महंगाई के कारण हर एक आम नागरिक का जीना दूभर हो गया है। धनी लोगों के पसीनें छूट गए हैं। आखिर सरकार किस-किस को जवाब देगी। आज बाजार में खाने-पीने की चीजों के साथ-साथ अन्य वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ रही है। जरा सा ईंधन की दर क्या बढ़ी पूरे भारत वर्ष में महंगाई की आग ने अपनी ओर सभी को लपेट लिया रहा। भारत सरकार के आला अधिकारियों का कहना है कि अभी महंगाई की आग और भड़केगी। लिहाजा ईंधन भी चुनाव का अहम मुद्दा रहेगा।

थाली से भारी कुछ भी नहीं होता
अरूणा शर्मा, शिक्षिका (से. नि.), लखनऊ

चुनावों में वैसे तो जातिगत, धार्मिक समीकरण मुख्य भूमिका निभाते हैं पर इस बार महंगाई एक अहम मुद्दा रहेगी। बीते चार सालों का संप्रग सरकार का लेखा-जोखा देखें तो महंगाई के सिवाए मिला ही क्या है जनता को। चार साल सरकार चलने के बाद आज संप्रग को परमाणु करार याद आया है। दरअसल कांग्रेस और वाम दोनों इसे चुनाव में मुद्दा बनाना चाहते हैं लेकिन यह मुमकिन नहीं है। थाली से भारी कुछ नहीं और महंगाई की मार सबसे ज्यादा थाली को ही झेलनी पड़ी है।

मुद्दा वह, जिसका असर ज्यादा पर हो
आलोक, मालवानी, मलाड, मुंबई

चुनावी मुद्दा उस बात को बनाया जाता है, जो ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रभावित कर सके। सबसे कारगर मुद्दा कौन होगा, यह अभी कह देना थोड़ी जल्दबाजी होगी। चुनाव होने के समय तक यदि सत्ता पक्ष महंगाई के  जिन्न को काबू कर ले जाता है तो विपक्ष के पास परमाणु करार ही मुख्य मुद्दा बचेगा, लेकिन यदि सरकार विफल रहती है तो महंगाई सारे मुद्दों को अपने आगे दबा देगी।

लाख टके का सवाल है महंगाई
राजेश कपूर, 21181 इंद्रा नगर, लखनऊ

हर चुनाव में असली मुद्दा वही होता है, जिससे वोट देने वाली जनता प्रभावित होती है। वोट देने वाले आम आदमी ही होते हैं और उसको महंगाई का मुद्दा अवश्य प्रभावित करेगी, ये बात विरोधी दल भी बखूबी जानते हैं। ईंधन की मूल्य वृध्दि से आम आदमी का आवागमन ही नहीं वरन रसोई भी कीमती हुई है और साथ ही महंगाई और भी बढ़ गई है।

अत: यही मुद्दा जबरदस्त होगा क्योंकि आम आदमी परमाणु करार की गंभीरता को नहीं समझता या दूसरों शब्दों में परमाणु करार का असर जब होगा तब होगा, महंगाई व ईंधन तो अभी असर दिखा रही है। महंगाई की थोड़ी बहुत जिम्मेदारी यूपीए सरकार की हो सकती है परंतु चुनाव के लिए ये बहुत बड़ा मुद्दा होगा।

करार चुनाव का नहीं, सरकार का मुद्दा
मनोज मोदी, हरिद्वार

इस बार सरकार सभी मामलों में निरंतर खड़ी है, चाहे वो महंगाई का मुद्दा हो या कच्चे तेल का या परमाणु करार का, सभी मोर्चों पर सरकार हारी हुई नजर आती है। जब महंगाई ने जोर पकड़ा तो सरकार ने अंतरराष्ट्रीय तेजी का नाम दिया पर ऐसा नहीं था, क्योंकि मामला तो तब भी शांत नहीं हुआ जब निर्यात पर रोक लगी।

सरकार यह मानने को राजी नहीं हुई कि यह तेजी डिमांड-सप्लाई पर आधारित न होते हुए वायदा बाजार के कारण हुई है। वहीं जब कच्चे तेल में तेजी आई तो अंतरराष्ट्रीय तेजी के साथ सरकार ने वायदा बाजार को जिम्मेदार ठहराया। देश की जनता को  परमाणु करार में फायदा और नुकसान ही नहीं पता तो यह चुनाव का मुद्दा कम पर सरकार गिराने का मुद्दा ज्यादा नजर आता है।

आम आदमी का करार से संबंध नहीं
डॉ. सतीश कुमार शुक्ल, सलाहकार एवं पूर्व भारतीय आर्थिक सेवा अधिकारी, मुंबई

परमाणु ऊर्जा का आम आदमी से कोई सीधा संबंध नहीं है। दीर्घकाल में यह हमारी आर्थिक प्रगति में सहायक सिध्द हो सकता है। अत: महंगाई और ईंधन की कीमत वृध्दि ही आगामी चुनाव के  मुद्दे हो सकते हैं। ये दोनों आपस में संबंधित हैं और वर्तमान में महंगाई ईंधन कीमतों में वृध्दि की ही देन है। अत: ये दोनों ही अगले चुनावों में जनसमर्थन के लिए प्रयुक्त किए जा सकते हैं। हालांकि यह परिस्थिति जन्य है और किसी भी सरकार के वश के बाहर है, फिर भी इसके आधार पर वोट तो पाया जा सकता है।

तीनों ही मुद्दे अहम
अशोक कुमार शुक्ल, नेहरू विहार, बी-101, प्रथम तल, नई दिल्ली

चुनाव की दृष्टि से तीनों ही मुद्दें प्रमुख हैं, जिसमें सबसे अधिक प्रभावी कारक के रूप में महंगाई है। तीनों मुद्दें एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। महंगाई को बढ़ाने ईंधन का बड़ा योगदान है। ईंधन किसी भी कार्य के लिए एक प्राथमिक जरूरत है। अत: यह वैश्विक स्तर पर भी सबसे प्रमुख है। परमाणु करार की बात करें तो यह मुद्दा चुनावी दृष्टि से सबसे कमजोर दिखता है। महंगाई किसी भी चुनाव में पूर्व से ही सबसे अधिक प्रभावी कारक रही है। भारत जैसे देश में जहां अधिकतर जनता गरीब है, उसके लिए महंगाई की मार प्राथमिक है।

करार सरकार की लड़ाई
ठाकुर सोहन सिंह भदौरिया, से. नि. बैंक अधिकारी, मुख्य डाकघर, बीकानेर

परमाणु करार वामपंथियों और कांग्रेस के बीच की लड़ाई है। जनता की इसमें सबसे कम रुचि है। ईंधन के रूप में पेट्रोल, डीजल, गैस और विद्युत की जरूरत संपन्न व मध्यम वर्ग को सर्वाधिक है लेकिन इस पीड़ा की चुभन इस वर्ग को कम है। यह वर्ग मतदान केंद्रों तक जाना अपनी तौहीन समझता है। इसलिए वोट पाने के लिए यह असली मुद्दा नहीं बन सकता है। निम्नवर्ग, जो मतदाताओं का 50 फीसदी है, जमकर वोट डालता है, यह वर्ग महंगाई की मार से पीड़ित है। अत: इसमें कोई शक नहीं कि आगामी चुनाव के लिए महंगाई ही मुख्य मुद्दा बनेगी।

ईंधन का मसला पहले उठेगा
संतोष कुमार, मंडराई हरदा वाले, एम. पी. नगर बोर्ड ऑफिस, भोपाल, (मध्य प्रदेश)

आने वाले समय में पहला मुद्दा ईंधन पर उठाया जाएगा। बढ़ती हुई ईंधन की कीमतों से सारी दुनिया के लोग परेशान हैं। माना कि कच्चे तेल की कीमत बढ़ जाने के कारण रसोई गैस, डीजल और पेट्रोल के भाव काफी ज्यादा हो गए हैं, जिसके कारण भारत के हर कोने में विरोध की आवाज उठने लगी है। आज के दौर में क्या गरीब और क्या अमीर सभी परेशान हैं। खासकर के मध्यम परिवार का जीना मुश्किल हो गया है।

महंगाई काबू नहीं आई तो..
हर्ष गोयल, पुत्र- विनोद कुमार गोयल, निकट- मुन्सफी, नगीना, बिजनौर, उत्तर प्रदेश

जहां तक चुनाव में मुद्दे का सवाल है तो हमारे देश की जनता बहुत भोली-भाली है। वह जल्दी ही पिछली बातों को भूल जाती है। इस वक्त महंगाई जनता के सामने सबसे बड़ी समस्या है। पिछले चार माह में महंगाई ने जो विकराल रूप धारण किया है, उसने मध्यवर्गीय व गरीब परिवारों की रीढ़ की हड्डी तोड़ कर रख दी है। आज आम आदमी के इस्तेमाल होने वाली प्रत्येक वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं।

दुनिया की दुहाई भी नहीं बचा पाएगी
रितेश माखेचा, मुंबई

परमाणु करार को लेकर आम लोगों में कोई खास चर्चा नहीं है। आम लोगों पर फर्क पड़ता है तो इस बात का की उसकी जेब पर इस समय कितना असर पड़ रहा है। सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद महंगाई  की मार से आम आदमी परेशान है। सरकार अगर सोचती है कि वह अतंरराष्ट्रीय स्थितियों का हवाला देकर बचा जाएगी तो बता दें कि सरकार अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकती है।

परमाणु करार से क्या लेना-देना है
सिदूंरी देवी, गृहिणी, लखनऊ

जिस तरह से इस सरकार के काल में जरूरी चीजों के दाम बढ़े हैं, वैसा पहले कभी नहीं हुआ है। जब जनता प्याज के दाम बढ़ने पर भाजपा को सबक सिखा सकती है तो फिर इसके साथ भी वैसा ही होगा। फ्रिज, टीवी के दाम वहीं हैं और जरूरी चीजों के दाम बढ़ गए हैं। इस सरकार को गरीबों की कोई परवाह नहीं है। करार से हमको क्या लेना देना।

महंगाई-ईंधन डुबाएंगे सरकार को
हर्षवर्ध्दन कुमार, डी-5556, द्वितीय तल, गांधी विहार, नई दिल्ली


सत्ता-सुख के बाद चुनावी वैराग्य का समय आ गया है। आए भी क्यों न साहब! तमाम सरकारी कसरतों के बावजूद भी महंगाई एवं ईंधन की तपिश कम नहीं हो रही है। चुनाव में मुख्य मुद्दा महंगाई और ईंधन होगा। कारण कि इसका सीधा असर मतदाताओं के रोजमर्रा की जिंदगी से है। उसे खाने की थाली से लेकर सुख-सुविधाओं तक की वस्तुओं में मन मारना पड़ रहा है। जनता-जनार्दन त्रस्त है। बतौर मतदाता मुझे स्पष्ट दिखता है कि जिस तरह ‘प्याज की रुलाई’ ने एनडीए सरकार डुबो दी थी, उसी तरह महंगाई-तेल की फिसलन यूपीए सरकार को डुबो देगी।

करार जो देगा, उससे क्या फर्क पड़ेगा
डॉ. उमेश मित्तल, चिकित्सक, गंगोह रोड, सहारनपुर

प्रत्येक चुनाव की अलग-अलग परिस्थिति होती है इसलिए चुनाव के मुद्दे बदलते रहते हैं। मेरे मत में इस चुनाव में असली मुद्दा देश का विकास, देश की सुरक्षा और बढ़ती महंगाई रहेगा। बढ़ती महंगाई ने जनजीवन को अस्तव्यस्त कर रखा है। आतंकवादियों ने देश की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती दे रही है। परमाणु करार से नि:संदेह देश की ऊर्जा जरूरतें बढ़ेंगी। परंतु आम जनता को इससे मतलब नहीं है। जनता को तो सस्ता तेल और सस्ती गैस चाहिए। महंगे तेल गैस से महंगाई बढ़ रही है और जनता का बजट फेल हो रहा है। अत: महंगाई ही सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है।

पुरस्कृत पत्र

भूख से बढ़कर कुछ भी नहीं
राकेश शुक्ला, इवेंट मैनेजर, लखनऊ

महंगाई ही ज्यादातर चुनावों में मुख्य मुद्दा बनती है। हमें आपातकाल के दौरान जनता पार्टी का वो नारा आज भी याद है- ‘खा गई चीनी, पी गई तेल, ये देखो इंदिरा का खेल।’ यह बताता है कि अक्सर महंगाई ही चुनावों का मुख्य मुद्दा रहती है। रही बात परमाणु करार की तो दो जून की रोटी को तरस रहे देश के करोड़ों परिवारों ने इसका नाम ही नहीं सुना है।

परमाणु करार को मुद्दा समझने वाले राजनीतिक दल शायद यह भूल रहे हैं कि भूख से बढ़कर कुछ भी नहीं है। हालांकि ईंधन के बढ़े दाम भी महंगाई का हिस्सा है, इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसके बावजूद अगला चुनाव सिर्फ और सिर्फ महंगाई के दम पर ही लड़ा जाएगा। वाम दल इस मुगालते में न रहें कि परमाणु करार का विरोध उन्हें देशभक्त साबित कर देगा। लिहाजा उन्हें भी असलियत जान लेनी चाहिए।

सर्वश्रेष्ठ पत्र

असली मुद्दा महंगाई ही होगा
स्नेहा असाटी, सिल्वर 1 सीडीए, रिलायंस लाइफ इंश्योरेंस, छिन्दवाड़ा (मध्य प्रदेश)

चुनाव में असली मुद्दा महंगाई का ही होगा, कारण भले ही इसके कच्चे तेल की वैश्विक कीमत हो। सरकार की यह सफाई चुनाव में किसी काम नहीं आने वाली है। इस देश का 70 से 80 फीसदी आदमी सिर्फ अपनी आम दिनचर्या के बारे में सोचता है। अधिकांश को तो शायद ही परमाणु करार के बारे में सही तरीके से पता होगा। उसे तो रोजमर्रा की जिंदगी में जेब कितनी ढीली हो रही है, इसी से मतलब रहता है। आज हर गृहिणी का किचन का बजट पूरी तरह से बिगड़ गया है। इसलिए महंगाई ही चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा होने वाली है।

कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा
डॉ. जी. एल. पुणताम्बेकर, रीडर, वाणिज्य विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर

वैसे भारतीय लोकतंत्र में चुनावी समर की जो प्रवृत्ति है, उस लिहाज से इस विषय पर विचार प्रकट करना अभी थोड़ी जल्दबाजी है। यहां आम लोगों के सरोकारों से कम, नौंटकियों से चुनाव अधिक जीते-हारे जाते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि जनहित से जुड़े इन तीनों महत्वपूर्ण मुद्दों को दरकिनार कर कब बाबरी मस्जिद, गोधरा कांड या श्राईन बोर्ड जैसे मुद्दे चुनावी हवा को बदल दें। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आगामी चुनाव में मुद्दे तो तीनों ही उछलेंगे परन्तु उनकी तीव्रता में अंतर होगा। हालांकि महंगाई तथा ईंधन चुनाव में बड़े मुद्दे होंगे।

थाली पर असर का जवाब चाहिए
सिध्दार्थ मिश्रा, सिल्वर पार्क, मीरा रोड, थाणे(महाराष्ट्र)

महंगाई में लगातार हो रही बढ़ोतरी का असर लोगों कीथाली पर पड़ा है। लोग अपनी कमाई का ज्यादातर हिस्सा खाने में ही खर्च कर रहे हैं। पिछले कुछ सालों से जिस विकास की रफ्तार में हम इतरा रहे थे, उसमें भी महंगाई की जंग लगने की पूरी पूरी उम्मीद जताई जाने लगी है। महंगाई को रोकने के लिए सरकार ने हाल ही में कई ऐसे कदम उठाए हैं जो महंगाई पर तो कोई असर नहीं दिखा सके, उलटा हमारे व्यापार में जरूर विपरीत असर डाल रहे हैं। रोटी में पड़े असर का जवाब तो सरकार को देना ही होगा।

कांग्रेस के लिए भारी पड़ेगा चुनाव
हर्षवर्ध्दन सिंह रावत, निवेश सलाहकार, लखनऊ

आम चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा महंगाई ही रहेगा। मंहगाई ने लोगों की जेबें खाली कर दी है और इस पर जल्दी काबू भी नहीं पाया जा सकता है। कांग्रेस के लिए आम चुनाव भारी पड़ेगा। परमाणु करार के बारे में लोगों को कुछ पता नहीं है और न ही वो जानना चाहते हैं। इसे चुनावी मुद्दा बनाने से भी कांग्रेस को कुछ हासिल नहीं होगा। रही बात ईंधन की तो उसकी बढ़ी कीमत भी महंगाई के खाते में ही जाएगी। आने वाले दिनों में तेल की कीमत और भी बढ़ सकती है। सबसे ज्यादा आग तो घर के चूल्हे में लग गई है।

बकौल विश्लेषक

महंगाई तो लोगों का मुद्दा, पर दलों के मसले हैं जुदा
कमल नयन काबरा, अर्थशास्त्री

आगामी चुनाव के मुख्य मुद्दों को दो तरीकों से देखना ज्यादा अच्छा होगा-एक, वे मुद्दे जो जनता की नजर में होंगे और दूसरे, वैसे मुद्दे जिसमें राजनीतिक दलों का हित होगा। इन दोनों में कोई समानता नहीं है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि वे मुद्दे जो आम जनता और उसके मुश्किलात से जुड़े हैं, वे राजनीतिक दलों के मुद्दे नहीं बन पाते हैं। उदाहरण के लिए सरकार महंगाई को कम और विकास को ज्यादा अहमियत दे रही है। आम जनता के हित और पार्टी के हित अलग-अलग हैं। पार्टी के लिए बुश ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, आम जनता नहीं।

यही वजह है कि बजाए महंगाई के कांग्रेस परमाणु मुद्दे को लेकर चुनाव लड़ना चाहेगी। परमाणु मुद्दे को कांग्रेस इस तरह प्रचारित कर रही है कि यह राष्ट्रीय हित में है, लेकिन ऐसा है नहीं। वास्तविकता यह है कि राष्ट्रीय पार्टियां जनता से जुड़े मुद्दे को लेकर चलना ही नहीं चाहतीं। अगर बीजेपी की बात करें तो बढ़ती महंगाई को लेकर वह रोना तो रोती है लेकिन यह स्पष्ट नहीं करती कि वह किन मुद्दों पर कांग्रेस से लड़ेगी।

वायदा बाजार बीजेपी की ही देन है। हमारे यहां जो पार्टियां चुनाव लड़ती हैं-वह या तो जात-पात या फिर मंदिर-मस्जिद को जमीन दिए जाने के मुद्दे को ही लेकर आती हैं। जबकि आम जनता का मुद्दा है-रोजगार, सुरक्षा, कानून व्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि। बीते 17 सालों में आम जनता के हितों की उपेक्षा की जा रही है। हमारे लोकतंत्र को उदारीकरण ने बंधक बना लिया है। यहां दो चेहरे हैं- भाजपाई और कांग्रेसी और दोनों के पीछे ही अमेरिका है। यानी ‘जनता बेबस लोकतंत्र’।
बातचीत: पवन कुमार सिन्हा

प्याज ही रुला देती है तो महंगाई तो मार ही देगी
अरविंद मोहन, प्रोफेसर, अर्थशास्त्र, लखनऊ विश्वविद्यालय

आने वाले चुनाव में मेरी समझ से महंगाई और ईंधन की आसमान छूती कीमतें ही मुद्दा होंगी। इसमें भी महंगाई ही खास मुद्दा बनेगी। जिस देश में प्याज की कीमत कई प्रदेशों की सरकारें गिरा देती है, वहां महंगाई मुद्दा न बने ऐसा हो ही नही सकता। पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमत भी एक मुद्दा होगा। पर परमाणु करार कोई मुद्दा नहीं बनने वाला है। इसे कांग्रेस और वाम दलों ने जरुर मुद्दा बनाने की कोशिश की है पर वह दोनों कामयाब नहीं होंगे। इस देश का आम आदमी परमाणु करार के बारे में जानता ही नहीं है।

जहां तक महंगाई की बात रही तो सरकार ने हर कोशिश कर के देख ली है। बाजार से तरलता कम करने की भरपूर कोशिश की गई है पर कीमतें काबू में आ ही नहीं रही है। यह अर्थशास्त्र का पुराना सिध्दांत है कि मांग को गिरा दो लेकिन यहां चैलेंज डिमांड का है ही नहीं। ऐसे में बाजार से 25000 से 30000 करोड़ रुपये की तरलता कम करने से भी कुछ हासिल होने वाला नहीं है। अनाज का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी बढ़ाया गया है पर साथ ही विकास की रफ्तार भी धीमी हो चली है। भारत में मंहगाई को क्षेत्रवार देखना होगा।

अभी जैसा लगता है कि चुनाव दिसंबर में होंगे तो उस समय तक कीमतें बढ़ने की दर कम होगी न की कीमतें कम होंगी। मेरा मानना है कि नवंबर तक मुद्रास्फीति की दर 14 से 15 फीसदी पर जा पहुंचेगी उसके बाद इसमें गिरावट आएगी। लेकिन दिसंबर-जनवरी तक अगर मुद्रास्फीति 8-9 फीसदी पर आ भी गई तो भी जनता की याददाश्त में यह चीज ताजी रहेगी। अगला चुनाव महंगाई के नाम पर लड़ा जाएगा न कि परमाणु करार के नाम पर। जनता सरकार से इसी मुद्दे पर जवाब चाहेगी।
बातचीत: सिध्दार्थ कलहंस

…और यह है अगला मुद्दा

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First Published : July 8, 2008 | 12:15 AM IST