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संकट की घड़ी में साथी बन सकते हैं परंपरागत खाद्यान्न

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 5:45 AM IST

पिछले चार दशक में पैदा हुए लोगों को याद भी नहीं होगा कि उन्होंने अपने रोज के भोजन में कभी रागी या बाजरा भी खाया हो।


जिस तरह से भारत में सभी लोगों ने चावल और गेहूं को अपने मुख्य भोजन के तौर पर अपना लिया है और ज्वार उनकी थालियों से गायब हो रहा है, उसका सीधा मतलब यही निकलता है कि देश में गेहूं और धान की खेती की बढ़ती जरुरतों को देखते हुए बाकी अनाज की खेती सिमटती जा रही है।

ज्वार की खेती असिंचित जमीन पर बेहतर ढंग से होती है, पर अब इसकी मांग धीरे धीरे घटती जा रही है। इनकी खेती को बढ़ावा देने के लिए भी कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। रागी, बाजरा या जई की बिक्री के लिए सरकार की ओर से कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य तय नहीं किया गया है। न ही इन अनाज की सरकारी खरीद की कोई व्यवस्था है।

यहां तक कि धान जिसे देश की आजादी के बाद लोगों ने ज्वार के स्थान पर अपना मुख्य भोजन बना लिया, उसकी भी सरकारी खरीद महज दो या तीन राज्यों में ही की जाती है। ऐसे में स्पष्ट है कि ज्वार को सरकार की खाद्यान्न खरीद की सूची में शामिल करने में कई साल लग जाएंगे। अगर ऐसा होता है तो एक बार फिर ज्वार को लोगों के भोजन में शामिल किया जाने लगेगा।

पहले से ही कुछ किसानों ने इस दिशा में कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। उनकी दिलचस्पी ज्वार की खेती में होने की एक वजह यह है कि ज्वार की खेती में लागत काफी कम आती है। पिछले सप्ताह आंध्र प्रदेश की महिला किसानों ने दिल्ली में ज्वार की खेती की सफलता की कहानी को एक अनूठे अंदाज में पेश किया। इन महिलाओं ने खुद अपने बलबूते पर खेती की, बाजार में फसल की बिक्री का बीड़ा भी खुद उठाया और खरीद पर भी अपना नियंत्रण बनाए रखा।

उन्होंने शुरु से लेकर आखिर तक अपनी सभी जिम्मेदारियों पर एक डॉक्युमेंटरी फिल्म भी तैयार की। इस काम में उनकी सहायता डेक्कन डेवलपमेंट सोसाइटी (डीडीएस) ने की, जिन्होंने इसके पहले भी मेडक जिले के 80 गांवों में आत्मनिर्भर किसानों की एक छोटी सी फौज तैयार करने का बीड़ा उठाया था। डीडीएस के निदेशक पी वी सतीश ने कहा कि अब एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया गया है जो देश में ज्वार की खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि डीडीएस खुद भी इस नेटवर्क का एक हिस्सा है।

डीडीएस के प्रयास में कदम बढ़ा रही महिलाओं को इस वजह से सशक्त नहीं बनाया जा रहा है क्योंकि उन्हें डॉक्युमेंटरी फिल्म की शूटिंग करनी है, बल्कि, वास्तव में उन्होंने कुछ ऐसा कर दिखाया है जिसकी सराहना की जानी चाहिए। उन्होंने बंजर जमीन पर भी खेती को मुमकिन कर दिखाया है। इन महिलाओं को सिखाया गया कि किस तरह वे खुद का बीज बैंक बनाएं तथा जैविक खाद और कीटनाशक तैयार करें। इन्हें एक तो ये खुद इस्तेमाल कर सकती हैं या फिर चाहें तो बेच भी सकती हैं।

ये महिलाएं एक सार्वजनिक वितरण इकाई भी चला रही हैं जहां ज्वार को वे खुद बेच रही हैं। इन गांवों में अब किसानों को अपनी पैदावार की बिक्री के लिए किसी दूसरे ढांचे पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा। वे जिन फसलों का उत्पादन कर रहे हैं उनकी कीमत अब वे खुद तय कर सकेंगे। चूंकि, ज्वार की पैदावार शुष्क इलाके में की जाती है और इसकी सिंचाई के लिए कोई खास इंतजाम की जरूरत नहीं होती, यही वजह है कि शुष्क इलाकों से भी ज्वार की जितनी पैदावार होती है वह पूरे एक साल तक के लिए काफी होती है।

ज्वार के बीज की तुलना किसी जादुई बीज से करना भी गलत नहीं होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि, एक तो इसकी पैदावार बिना पानी के होती है, दूसरा इससे मवेशियों को पर्याप्त चारा मिल जाता है। खासकर ज्वार की फसल से खाद की कमी को भी दूर किया जा सकता है, जिसके संकेत (देश के विभिन्न राज्यों में खाद की कमी देखने को मिल रही हैं) अभी से मिलने लगे हैं। इन महिला किसानों के आंदोलन के साथ जुड़ने के लिए सात अन्य जिलों के गांवों के लोगों ने इस मॉडल को अपनाना शुरू कर दिया है।

साथ ही डीडीएस के साथ हाथ मिलाने के लिए कई स्वयंसेवी संगठन भी आगे आए हैं। मेडक में ज्वार को लेकर किया जा रहा आंदोलन सफल होने की एक वजह यह भी थी कि इसे सही समय पर शुरू किया गया था। पी वी सतीश समय रहते ही गांव के लोगों के पास पहुंचे थे। कहने का मतलब है कि जब वह इस तरीके की योजना लेकर लोगों के पास पहुंचे तो उनकी जुबान पर से ज्वार का स्वाद पूरी तरह से उतरा नहीं था।

इस वजह से जब उन्हें इसकी पैदावार के लिए प्रेरित किया गया तो उन्हें इस दिशा में कदम उठाने में समय नहीं लगा। डीडीएस की महिलाओं द्वारा बनाई गई इस फिल्म में बताया गया है कि वे ज्वार की विभिन्न किस्मों को उपजाया करती थीं।

वे तब तक ज्वार की खेती किया करती थीं, जब तक धान की लोकप्रियता ने ज्वार को पछाड़ नहीं दिया था। उनके व्यंजनों और फसल पकने के समय गाए जाने वाले गानों में ज्वार अब भी शामिल है। शायद समय आ गया है जब देश के दूसरे हिस्सों में भी लोग फिर से ज्वार को याद करने लगें और फसल के गीतों में भी एक बार फिर से उसे जगह मिल जाए।

First Published : June 16, 2008 | 11:04 PM IST