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बैंकिंग प्रणाली की परंपरागत दवा

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 8:46 AM IST

विश्व के बैंकों ने पिछले कई सालों से जोखिम प्रबंधन के जिन मानदंडों को अपना रखा है, उन्हें शुरू करने का श्रेय स्विट्जरलैंड को जाता है।


स्विट्जरलैंड को दुनिया में बैंकिंग की राजधानी के नाम से भी जाना जाता है। मौजूदा मानदंडों, जिन्हें बेसल 2 के नाम से जाना जाता है, से बैंकों को संपत्ति के विभिन्न जोखिमों से बचने के उपाय मिलते हैं। जोखिम जितने अधिक होंगे, उनसे निपटने के लिए उपाय भी उतने ही अधिक तैयार किए जाएंगे।

जोखिम प्रबंधन के प्रति बेसल का जो नजरिया रहा है उसका डंका दुनिया भर में बजता है और यह भी माना जाता रहा है कि जोखिम के दौर में बैंकों को रिटर्न की अधिकतम गारंटी के लिए इससे बेहतर विकल्प नहीं सुझाए जा सकते। जिलियन टेट ने हाल ही में फाइनेंशियल टाइम्स में एक आलेख में बताया था कि इस नजरिए का आधार यह है कि बैंकों को भी इस बात की जानकारी होती है कि कुछ जोखिम उनके असेट पोर्टफोलियो में शुरुआत से ही निहित होते हैं। हम पिछले कुछ समय के दौरान सब प्राइम संकट की मार को भी देख चुके हैं।

बैंक अक्सर अपने पोर्टफोलियो का एक बड़ा हिस्सा जटिल प्रतिभूतियों के लिए रखते हैं। स्विट्जरलैंड के सबसे बड़े बैंकों में से एक यूबीएस को सब प्राइम संकट की वजह से जबर्दस्त नुकसान उठाना पड़ा था। अपने नुकसान की भरपाई के लिए यूबीएस को 35 अरब डॉलर बट्टे खाते डालने पड़े थे। अगर इस बैंक ने भी अपनी जोखिम वाली प्रतिभूतियों का सटीक मूल्यांकन किया होता तो उन्हें इससे अधिक रकम देनी होती। अब यह पूरे वित्तीय तंत्र की जिम्मेदारी है कि वह कुछ ऐसे तरीके अपनाए जिससे ये घटनाएं फिर से न होने पाएं।

स्विटजरलैंड के केंद्रीय बैंक स्विस नेशनल बैंक (एसएनबी) के पास इस विषय का एक समाधान है। बैंक यह मानता है कि विभिन्न बैंकों के पास इतना अनुभव और इतनी क्षमता नहीं होती कि वे ठीक-ठीक इस बात का अंदाजा लगा सकें कि संपत्तियों के मामले में उन्हें कितना नुकसान होने की आशंका है। ऐसे में केंद्रीय बैंक का सुझाव है कि कुछ सामान्य पैमाने और दिशा निर्देश तैयार किए जाएं। इसका मतलब यह नहीं है कि बैंक उन संपत्तियों का वर्गीकरण कर दें जो जोखिम के दायरे में आती हैं।

दरअसल वह इस पैमाने को ही तय कर देना चाहता है जिस अनुपात में किसी बैंक के पास जोखिम वाली संपत्तियां हों। बेसल 2 में जिन प्रावधानों का उल्लेख किया गया है, ये अनुपात उनसे अलग हैं। यह उपाय एक तरीके से बैंकों पर अतिरिक्त बोझ डाल देगा। जोखिम प्रबंधन की नजर से देखें तो एसएनबी का यह नया फार्मूला नायाब भी है और अनोखा भी। बेहतर है कि बैंक जोखिम वाली प्रतिभूतियों का सही आकलन करना सीखें और यह भी उनके हित में ही है कि वे जोखिम मुक्त संपत्तियों को शामिल करने पर अधिक से अधिक ध्यान दें।

हालांकि इन उपायों पर अमल किया जाएगा या नहीं, इस बारे में तत्काल कुछ कह पाना जल्दबाजी होगा। कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली जिस वैधानिक तरलता अनुपात को मानती आ रही है, ये उपाय बहुत कुछ उस जैसे ही हैं। पुराने समय में इसे इस तरीके से देखते थे कि बैंक यह सुनिश्चित करें कि सरकार को ज्यादा से ज्यादा ऋण उपलब्ध कराया जाए ताकि सरकारी ऋण के लिए बाजार में प्रतियोगिता कम हो और सरकार को कम दर पर ऋण मिल सके।

First Published : July 2, 2008 | 10:16 PM IST