सरकारी क्षेत्र के बैंकों के प्रबंध निदेशकों, मुख्य कार्याधिकारियों और पूर्णकालिक निदेशकों के कार्यकाल को पांच वर्ष से बढ़ाकर 10 वर्ष करने (या 60 वर्ष की आयु जो भी पहले हो) के सरकार के निर्णय को समझदारी भरा कदम माना जा सकता है क्योंकि ऐसा करने से ऐसे समय में बैंकिंग क्षेत्र की प्रतिभाओं को साथ बनाए रखा जा सकेगा जब उनके निजी क्षेत्र के प्रतिद्वंद्वियों के साथ जाने की आशंका रहती है।
बहरहाल गजट अधिसूचना में सरकारी बैंकों के प्रमुखों और पूर्णकालिक निदेशकों के लिए अनारक्षित विस्तार की पेशकश नहीं है। इस अधिसूचना में कहा गया है कि नियुक्ति शुरुआत में पांच वर्ष के लिए होगी और इसे पांच वर्ष का एक और अवधि विस्तार दिया जा सकेगा। इससे संकेत मिलता है कि सरकारी बैंकों के प्रमुख सरकार की इच्छा होने पर सेवा विस्तार पा सकेंगे। बहरहाल सरकारी बैंकों के प्रमुखों के लिए लंबा कार्यकाल, पांच वर्ष के कार्यकाल की तुलना में हस्तक्षेप की अधिक गुंजाइश तैयार करता है क्योंकि पांच वर्ष के कार्यकाल में शुरुआती एक-डेढ़ वर्ष का समय तो अक्सर नई जिम्मेदारियों को समझने में ही निकल जाता है।
परंतु एक बार फिर व्यापक तस्वीर की बात करें तो बैंकों के प्रबंध निदेशकों और मुख्य कार्याधिकारियों के कार्यकाल में यह बढ़ोतरी सरकारी बैंकों में प्रतिभाओं की कमी की समस्या को आंशिक रूप से ही दूर कर सकती है। पहली बात तो यह कि ऋण संबंधी निर्णयों के मामले में वे निरंतर सरकार के स्वामित्व के अधीन काम करते हैं।
हालांकि इन निर्णयों को लेकर ‘फोन पर निर्देश’ की घटनाएं कम हुई हैं लेकिन निजी क्षेत्र के बैंकों के उलट सरकारी बैंकों में यह अभी भी एक समस्या है। एक और बात यह कि सरकारी बैंकों और निजी बैंकों के वेतन भत्तों में इतना अधिक अंतर है कि लंबे कार्यकाल का आकर्षण शायद ही उसकी भरपाई कर पाए।
देश में सर्वाधिक वेतन पाने वाले निजी बैंक के सीईओ का वेतन सर्वाधिक वेतन वाले सरकारी बैंक के प्रमुख से 35 गुना अधिक है। अगर आवास तथा अन्य भत्तों को शामिल कर दिया जाए तो भी इस अंतर में बहुत कम बदलाव आता है। सन 2020 में जब निजी क्षेत्र के कुछ बैंकों ने कोविड-19 लॉकडाउन लगने के बाद वेतन में कटौती की तब एक सरकारी बैंक के प्रमुख ने मजाक में कहा था कि अगर उनके बैंक में वेतन कटौती की गई तो उन्हें तो सड़क पर जीवन गुजारना पड़ेगा।
वेतन में असमानता का सिलसिला नीचे तक चलता है जिससे यह बात आंशिक रूप से सामने आती है कि आखिर क्यों सरकारी बैंक अपने कर्मचारियों की कमी पूरी नहीं कर पाते जबकि बीते करीब 10 वर्ष में निजी बैंकों की कर्मचारी क्षमता दोगुनी हो चुकी है।
अंत में 10 वर्ष के संभावित कार्यकाल और 60 वर्ष की सेवानिवृत्ति की आयु को साथ रखकर देखा जाए तो निजी क्षेत्र के प्रतिस्पर्धियों की तुलना में यहां भी काफी तीव्र विरोधाभास नजर आता है। सन 2021 में भारतीय रिजर्व बैंक ने निजी बैंकों, लघु वित्त बैंकों और विदेशी बैंकों के पूर्ण स्वामित्व वाले अनुषंगियों के प्रबंध निदेशकों और सीईओ को लेकर जो दिशानिर्देश दिए थे उनके मुताबिक वे 70 वर्ष की कुल आयु सीमा के भीतर 15 वर्ष तक पद पर बने रह सकते थे।
इसे देखते हुए यह स्पष्ट नहीं है कि सरकारी बैंकों और पूर्णकालिक निदेशकों के लिए अपेक्षाकृत कम कार्यावधि और सेवानिवृत्ति आयु का प्रावधान क्यों किया गया है। वह भी ऐसे समय पर जबकि वाणिज्यिक ऋण में सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी 10 वर्ष पहले के 74.2 फीसदी से घटकर मार्च 2022 में 54.8 फीसदी रह गई। इसके विपरीत निजी बैंकों की हिस्सेदारी इसी अवधि में तकरीबन दोगुनी बढ़कर 36.9 फीसदी हो गई। सरकारी और निजी बैंकों के बीच प्रतिभाओं के लिए समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए केवल सेवा अवधि विस्तार से बात नहीं बनेगी, हालांकि यह बढ़िया शुरुआती कदम हो सकता है।