पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन से खुलकर असहमति जताई थी जिसकी दुनिया भर में प्रशंसा हुई लेकिन यह शानदार तारीफ अब फीकी पड़ती दिख रही हैं क्योंकि यूक्रेन के चार क्षेत्रों में रूस के अवैध जनमत संग्रह की निंदा करने और यूक्रेन से सैनिकों की बिना शर्त वापसी का आह्वान करने वाले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के मुद्दे पर भारत ने अनुपस्थित रहने का फैसला किया।
इस तरह भारत ने भी वही रास्ता अख्तियार किया है जो चीन, ब्राजील और गैबॉन ने किया। यह स्पष्ट नहीं है कि भारत ने बिना अपवाद वाले इस प्रस्ताव के लिए मतदान करने के उलट जाने का विकल्प क्यों चुना, जो हमेशा से युद्ध के बजाय वार्ता को अपनी घोषित प्राथमिकता के तौर पर रेखांकित करता है। हालांकि भारत ने लगातार कहा है कि विश्व व्यवस्था, संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र, अंतरराष्ट्रीय कानून और क्षेत्रीय संप्रभुता के सम्मान पर आधारित है।
रूस-यूक्रेन के सवाल पर संयुक्त राष्ट्र में पहले भी करीब दर्जन भर मौके पर अनुपस्थित रहने के बजाय इसे नीतिगत संतुलन साधने की भारत की जरूरत के रूप में देखा गया जो मुख्य रूप से रूस की रक्षा आपूर्ति पर निर्भर है। इसकी वजह से परमाणु निरस्त्रीकरण और अप्रसार व्यवस्था को मजबूत करने की भारत की वैश्विक प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठाया गया है जिसे भारत ने परमाणु परीक्षण किए जाने के बाद भी लगातार कई मौके पर दोहराया है।
इस स्थिति को आने वाले महीनों में अच्छी तरह से आजमाया जा सकता है क्योंकि पुतिन ने अपनी यूक्रेन आक्रमण योजना का दायरा बढ़ा दिया है। पिछले महीने घोषित सैन्य मसौदे का विस्तार इस व्यापक योजना का ही एक हिस्सा है। रूस ने पिछले महीने के अंत में यूक्रेन क्षेत्र में ‘जनमत संग्रह’ का आयोजन किया था जिसमें उसने एकतरफा जीत का दावा किया था। इसे एक अलग मुद्दे के रूप में देखा जा सकता है।
पुतिन ने चार पूर्वी यूक्रेन क्षेत्रों, दोनेत्स्क, लुहांस्क, खेरसॉन और जापोरिझिया को रूस का हिस्सा घोषित करने के आदेशों पर हस्ताक्षर करके जनमत संग्रह का तेजी से पालन कराने की कोशिश की। इस स्पष्ट कदम को आगे बढ़ाने की वजहें भी पारदर्शी हैं और किसी से छिपी नहीं हैं। सबसे पहले यूक्रेन की सेना ने इस क्षेत्र में कुछ दूरी तक रूस की अग्रिम पंक्ति की सेना को वापसी के लिए मजबूर करते हुए अपने क्षेत्र के एक बड़े हिस्से पर फिर से कब्जा कर लिया है जिस क्षेत्र का दावा पुतिन के आदेश में किया गया है।
यह रूस के राष्ट्रपति के लिए सैन्य आक्रामकता बढ़ाने का एक वैध कारण बन गया है क्योंकि उनके मुताबिक यूक्रेन अपनी भूमि की रक्षा नहीं कर रहा, बल्कि रूसी क्षेत्र पर हमला कर रहा है। इससे भी अधिक भयावह बात यह है कि पुतिन की तरफ से परमाणु हथियारों को तैनात करने की खुली धमकी भी दी गई है और आदेश पर हस्ताक्षर के मौके पर उन्होंने 1945 में अमेरिका द्वारा जापान पर गिराए गए परमाणु बमों का उल्लेख किया जिसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ था। परमाणु युद्ध का खतरा अप्रत्याशित तरीकों से युद्ध की गतिशीलता को बदल देगा।
पुतिन ने सार्वजनिक रूप से अपनी परमाणु योजनाओं के बारे में नहीं बताया है, लेकिन अनुमान यह है कि वह संभवतः उन क्षेत्रों में सामरिक परमाणु हथियारों को तैनात नहीं करेंगे जहां यूक्रेन बेहतर स्थिति में है क्योंकि इससे कई ऐसे लोग बरबाद हो जाएंगे जिनका उन्होंने हाल ही में रूसी नागरिकों के रूप में स्वागत किया है। इसके अलावा यूक्रेन यानी उसकी राजधानी कीव को निशाना बनाकर लंबी दूरी के हथियार इस्तेमाल करने से क्षेत्रीय लाभ नहीं मिलेगा लेकिन इससे अमेरिका और नाटो को राजनीतिक संदेश मिलने की संभावना है।
अमेरिका ने महत्त्वपूर्ण खनिज सुरक्षा साझेदारी से भारत को न जोड़कर और पाकिस्तान के साथ एफ 16 के लिए हस्ताक्षर करके यूक्रेन पर भारत के रुख पर एतराज के संकेत दिए हैं। ऐसे में भारत के लिए अहम होगा कि वह रूस-यूक्रेन संकट पर एक सूक्ष्म और सुसंगत रुख अख्तियार करे जिसकी वजह से इसकी अपने सहयोगियों के साथ अधिक विश्वसनीयता कायम हो सके।