गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा के बाद भी मामला अब तक पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय ने हाल ही में एक पूर्व शर्त रखी कि सरकार से सरकार के स्तर पर निर्यात किए जाने वाले गेहूं का इस्तेमाल केवल घरेलू खपत के लिए किया जाएगा और उसे किसी अन्य देश को निर्यात नहीं किया जाएगा। इस बीच समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के अनुसार बांग्लादेश को भेजा जाने वाला चार लाख टन गेहूं जो हजारों ट्रकों में लदा हुआ है, वह भी पश्चिम बंगाल में फंसा रहा है क्योंकि सीमा शुल्क अधिकारी उसे आगे नहीं जाने दे रहे।
ऐसे में इस समूचे घटनाक्रम पर एक त्वरित निगाह डालने की आवश्यकता है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने विश्व स्तर पर गेहूं की कमी पैदा की क्योंकि यूक्रेन दुनिया के सबसे बड़े गेहूं निर्यातक देशों में से एक है। वैश्विक स्तर पर गेहूं की कीमतों में मजबूती को भारतीय किसानों तथा कारोबारियों के लिए एक बड़े अवसर के रूप में देखा गया क्योंकि वे विश्व बाजार मे अपना माल बेच सकते थे। प्रधानमंत्री ने तो यहां तक दावा कर दिया था कि भारत दुनिया का पेट भरने में सक्षम है और वह गेहूं आपूर्ति के मामले में यूक्रेन की कमी को पूरा कर सकता है।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक है लेकिन वह गेहूं का बड़ा निर्यातक नहीं रहा है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय ने एक कार्यबल गठित किया और नौ देशों में एक प्रतिनिधिमंडल भेजने का निर्णय लिया ताकि भारतीय गेहूं को प्रोत्साहित किया जा सके। प्रतिनिधिमंडल की रवानगी के महज एक दिन पहले सरकार ने अचानक यह घोषणा कर दी कि गेहूं के निर्यात पर तत्काल प्रभाव से रोक लगायी जाती है।
निर्यात पर अचानक प्रतिबंध लगाने की घोषणा से अफरातफरी का माहौल बन गया। बंदरगाहों पर जाने के लिए ट्रकों पर लदी गेहूं की खेप वहीं फंस गई क्योंकि यह स्पष्ट नहीं था कि उन्हें जहाजों पर लादा जाएगा अथवा नहीं। जिन किसानों ने अपनी उपज सरकारी एजेंसियों को नहीं बेची थी क्योंकि वे ऊंची वैश्विक कीमतों का लाभ उठाना चाहते थे वे भी अचानक उठाए गए इस कदम से फंस गए।
इसके पश्चात स्पष्टीकरण आने शुरू हुए। कहा गया कि जिन अनुबंधों पर निजी कारोबारी पहले हस्ताक्षर कर चुके हैं उन्हें निर्यात करने दिया जाएगा। यह भी कहा गया कि सरकारों के बीच होने वाले सौदे जारी रहेंगे। ताजा ब्योरे के अनुसार भारत से गेहूं खरीदने वाले देशों को उसका घरेलू इस्तेमाल करना होगा। यह उचित निर्णय है हालांकि इसे शुरुआत में ही स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए था।
गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध की घोषणा ने बहस को जन्म दे दिया। आलोचकों का कहना है कि अचानक उठाए गए इस कदम से एक विश्वसनीय कारोबारी साझेदार के रूप में भारत की प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचेगी। अन्य तरीकों की बात करें तो घरेलू खरीद मूल्य में इजाफा करके भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता था। सरकार के निर्णय के समर्थकों का कहना है कि भारत को अतिरिक्त अनाज को बाहर बेचने से पहले अपने देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
दोनों ही दलीलों में दम है लेकिन ये एक बड़े बिंदु की अनदेखी करती हैं। बीते कुछ वर्षों से भारत का नीति निर्माण और हमारी नीतिगत घोषणाएं जल्दबाजी में की जाती हैं और बाद में उन्हें उतनी ही जल्दबाजी में संशोधित किया जाता है या बदल दिया जाता है।
हर महीने और हर सप्ताह अधिसूचनाओं एवं स्पष्टीकरण का आना जारी रहता है। उनमें से कुछ विरोधाभासी होती हैं और उन्हें आगे और अधिक स्पष्ट करने की आवश्यकता होती है। उच्च स्तरीय अधिकारियों की ओर से कोयला खरीद/आयात, दूरसंचार, कोविड-19 टीके के निर्यात, ई-कॉमर्स तथा यहां तक कि इलेक्ट्रिक वाहन बनाम पेट्रोल-डीजल इंजन को लेकर की गई घोषणाओं के मामले में भी ऐसा देखने को मिला। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) तथा ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) जैसे बड़े कानूनों की बात करें तो यहां भी अधिसूचना, बदलाव, संशोधन एवं स्पष्टीकरण आदि आमतौर पर देखने को मिलते रहे। मूल कानून पारित होने के बाद बहुत लंबे समय तक इनका सिलसिला चलता रहा। आईबीसी के मामले में तो आगे भी संशोधनों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। जीएसटी के मामले में दरों के साथ लगातार छेड़छाड़ की जा रही है जबकि इसे जारी किए हुए करीब पांच वर्ष का समय बीत चुका है। कोई भी नीति पहले दिन से एकदम परिपूर्ण नहीं हो सकती। ऐसे में समय के साथ प्रतिपुष्टि के आधार पर उनमें संशोधन करना और उन्हें बेहतर बनाना भी समझ में आता है।
बहरहाल, एक धारणा जो जोर पकड़ रही है वह यह है कि भारत में नीतिगत घोषणाएं अक्सर पर्याप्त चर्चा और बहस के बिना ही कर दी जाती हैं। अक्सर नियमों के मसौदे अलग-थलग ढंग से तैयार कर लिए जाते हैं और उन लोगों से कोई मशविरा नहीं लिया जाता जो उनसे प्रभावित होने वाले होते हैं। ज्यादातर मामलों में घोषणाएं अल्पावधि पर केंद्रित होती हैं और उनकी प्रकृति भी प्रतिक्रियावादी होती है, बजाय कि सुविचारित रणनीतियों के।
यह भी संभव है कि प्रतिपुष्टि उच्चतम स्तर पर नहीं पहुंचे और उसके पूर्व ही घोषणाएं हो जाएं। गेहूं से जुड़े प्रतिनिधिमंडल और निर्यात प्रतिबंध की बात करें तो जमीनी अधिकारियों को यह बात तो पता ही होगी कि गर्म हवा के थपेड़ों के कारण फसल प्रभावित हुई है और उत्पादन अनुमान के मुताबिक नहीं हुआ है। शायद उनकी रिपोर्ट उन अधिकारियों के पास बहुत देर से पहुंचीं जो प्रतिनिधिमंडल भेजने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन तथ्य यही है कि यह कोई इकलौती ऐसी घटना नहीं है। चिंता का विषय भी यही है। बिजली उत्पादकों के सामने कोयले का संकट और गर्मियों में मांग में बढ़ोतरी का अनुमान लगाने में उनकी नाकामी भी ऐसा ही उदाहरण है। बिजली संयंत्रों में कोयले की कमी सरकार के जागने के बहुत पहले से अखबारों की सुर्खियां बनती रही।
नीतियों को वापस लेना और उनमें बदलाव इतनी जल्दी-जल्दी होता है कि घरेलू और वैश्विक कारोबारी तक इससे उलझन में हैं। कोई भी निवेशक चाहता है कि नीतिगत दिशा स्पष्ट रहे तथा जमीन पर पैसा लगाने के पहले वह स्थिरता सुनिश्चित करना चाहता है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि वह नीतिगत पंगुता की शिकार थी। ऐसा इसलिए कि वहां इतनी बहसें होती थीं कि समय पर कोई नीति बन ही नहीं पाती थी। मौजूदा प्रशासन की बात करें तो दिक्कत इसके उलट है। नीतिगत घोषणाएं बहुत जल्दी की जाती हैं और उतनी ही जल्दी उन्हें पलट भी दिया जाता है।
(लेखक बिज़नेस टुडे और बिज़नेस वर्ल्ड के पूर्व संपादक तथा संपादकीय सलाहकार संस्था प्रोजैकव्यू के संस्थापक हैं)