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उपयोगी सुझाव

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 4:11 PM IST

चौहत्तर दिन का समय बड़े सुधार हासिल करने के लिए अधिक नहीं होता है लेकिन देश के प्रधान न्यायाधीश यू यू ललित ने यह कहकर इस दिशा में निर्णायक कदम उठाया है कि सर्वोच्च न्यायालय 29 अगस्त से यानी उनके कार्यकाल के पहले दिन से पांच सदस्यीय संविधान पीठ के 25 लंबित मामलों की सुनवाई करेगा और यह आकलन करेगा कि क्या उन पर न्यायालय में सुनवाई होनी चाहिए। यह न केवल उनके पूर्ववर्ती के प्रदर्शन से एकदम अलग और लंबी छलांग है ब​ल्कि यह दशकों के गिरावट वाले रुझान से भी एकदम उलट है। सन 1960 के दशक में जहां प्रति वर्ष संविधान पीठ के औसतन 134 निर्णय सुनाये जाते थे, वहीं 2021 में यह सिलसिला घटकर दो फैसलों तक सिमट गया।
न्यायमूर्ति ललित के इस शुरुआती कदम से उनके उस व्यापक प्रस्ताव पर भी जोर पड़ता है जिसमें उन्होंने कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय के मौजूदा ढांचे में कम से कम संवैधानिक पीठ को पूरे वर्ष काम करते रहना चाहिए। यह समझदारी भरा सुझाव है। सर्वोच्च न्यायालय के ऊपर काम के दबाव का मात्रात्मक विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि देश की सबसे बड़ी अदालत का 85 प्र​तिशत समय देश भर की अपीलें सुनने में चला जाता है और उसके पास बड़े पीठों के लिए समय ही नहीं रह जाता है। संवैधानिक पीठ में प्राय: पांच, सात या नौ न्यायाधीश हो सकते हैं और यह पीठ संवैधानिक प्रश्नों पर विचार करता है।इन संवैधानिक पीठों के सामने लंबित मामलों में से अ​धिकांश बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं।
संवैधानिक पीठों के समक्ष मौजूद कुल 53 मामलों में से जिन 25 मामलों पर सुनवाई होनी है उनमें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षण, सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय अपील शाखा का निर्माण, व्हाट्सऐप की ​निजता और 2016 की नोटबंदी की वैधता से जुड़े मामले शामिल हैं। परंतु बड़े पीठों के लिए कई और महत्त्वपूर्ण मामले भी हैं जो लंबित हैं। उदाहरण के लिए अनुच्देद 370 की वैधता जो जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे से संबं​धित है और जिसे 2019 में समाप्त किया गया था, नागरिकता संशोधन अ​धिनियम की चुनौतियां और मु​स्लिम विवाह कानूनों की संवैधानिकता जैसे मामले शामिल हैं। न्यायमूर्ति ललित के कदम ने एक ऐसी बहस को प्रासंगिक बना दिया है जो सन 1970 के दशक से चली आ रही है।
वह यह कि सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित मुकदमों की भारी भीड़ से कैसे निपटा जाए? देश की सबसे बड़ी अदालत के समक्ष फिलहाल 70,000 से अ​धिक मामले लंबित हैं। इनमें सर्वोच्च न्यायालय को 15-15 न्यायाधीशों के चार क्षेत्रीय पीठों में बांटने का सुझाव शामिल है जिनमें से प्रत्येक सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के बीच अपील न्यायालय की तरह काम करेगा। इससे न्यायाधीशों के पास संवैधानिक मसलों से निपटने के लिए अ​धिक समय बचेगा। 1974 में 58 वें वि​धि आयोग ने ऐसी जोनल अदालतों के विचार को यह कहते हुए नकार दिया था कि यह संविधान निर्माताओं के इरादों के विपरीत है।यह संभव है कि कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू हुई आभासी सुनवाई जो अब भी जारी है, की मदद से सुनवाई की प्रक्रिया तेज की जाए और लंबित मामलों के बोझ को कम किया जाए।
इसके साथ ही यह दलील भी दी गई कि संवैधानिक पीठ द्वारा की जाने वाली सुनवाई से भी न्याय व्यवस्था में लंबित मामलों की तादाद कम होगी क्योंकि उनसे संवैधानिक प्रश्न हल होंगे तथा अपील की गुंजाइश में कमी आएगी। हालांकि न्यायमूर्ति ललित के प्रस्ताव के विरुद्ध एक दलील यह है कि अगर पांच न्यायाधीशों को स्थायी रूप से सं​वैधानिक पीठ में नियुक्त कर दिया गया तो इससे अपील और रिट याचिकाओं की सुनवाई के लिए न्यायाधीशों की संख्या में कमी आएगी। इस समस्या को हल करने के लिए न्यायाधीशों की तादाद को मौजूदा 34 से बढ़ाया जा सकता है।
इस विषय में पहले ही पद स्वीकृत हैं। इसके साथ ही यदि सर्वोच्च न्यायालय अपील की सुनवाई के मामले में कुछ ज्यादा ही विवेकशील हो गया है तो ऐसे में अ​धिक अहम मसलों की सुनवाई के लिए गुंजाइश बनेगी। यदि न्यायमूर्ति ललित ढाई महीने की अवधि में इस बहस को आगे बढ़ा सके तो यह सर्वोच्च न्यायालय की बहुत बड़ी सेवा होगी। 

First Published : August 29, 2022 | 9:31 PM IST