एनडीए सरकार बेहतर थी
संतोष सांगले, बाजार निवेशक, मुंबई
कारोबारियों के नजरिए से देखा जाय तो वर्तमान में बाजार एवं अर्थव्यवस्था की जो हालत है, उससे साफ जाहिर होता है कि यूपीए की बजाय एनडीए की सरकार बेहतर थी। इसके पीछे कारण भी स्पष्ट है कि एनडीए में शामिल सभी घटक दलों ने प्राय: आम जनता के बारे में सोचा था। इसके अलावा एनडीए ने ही भारत को इंडिया बनाकर वैश्विक पटल पर देश को नए आयामों तक पहुंचाया।
साथ ही वर्तमान में जिस कदर से महंगाई दर, हफ्ते दर हफ्ते बढ़ रही है और उसे सरकार रोकने में नाकाम साबित हो रही है। इससे स्पष्ट है कि यूपीए सरकार आम आदमी के हितों की रक्षा करने के मामले में हर मोड़ पर विफल साबित हो रही है। वहीं शायद इस पड़ाव पर एनडीए की सरकार बेहतर परिणाम देने का माद्दा रखती है और महंगाई के बढ़ती दरों को काबू रखने में एनडीए की थिंकटैंक कामयाब हो सकती थी।
दोनों को मिलेंगे एक जैसे नंबर
फिरोज अशरफ, पाकिस्तान मामलों के जानकार एवं स्तंभलेखक, मुंबई
यूपीए और एनडीए में बेहतर साबित करने की प्रतिस्पर्धा में दोनों सरकारों को समान अंक दिए जा सकते हैं। उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रता काल से ही नेहरू सरकार ने सरकारी उद्योग की बजाय निजी उद्योग क्षेत्रों को तरजीह दी है और जिसका नतीजा वर्तमान में साफ देखा जा सकता है। 1947 में नेहरू सरकार द्वारा सरकारी और निजी क्षेत्रों को वर्गीकृत किया गया और टाटा प्लान की घोषणा की गयी।
जिसके पश्चात टाटा, बिड़ला और अंबानी जैसे उद्योगपतियों की परिसंपत्ति में उछाल देखा गया है, उससे साफ जाहिर होता है कि वर्तमान परिस्थितियों में भी अमूमन हालत जस के तस हैं। वहीं एनडीए सरकार की बात की जाय तो आम एवं गरीब जनता के नजरिए से इस सरकार ने भी कोई काबिले तारीफ कार्य नहीं किया था। जिसका ही नतीजा था कि सरकार औंधे मुंह गिर गयी। हालांकि वर्तमान सरकार भी इसी राह पर आगे बढ़ रही है और कारोबारियों पर शामत आन पड़ी है।
यूपीए ने पूरे किए हैं वादे
किशोर मयानी, प्रबंध निदेशक , आइवरी गोल्ड मीडिया , मुंबई
यूपीए और एनडीए सरकार की कारोबारियों के नजरिये से तुलना की जाए तो दोनों सरकारों को 49-51 के अनुपात में वर्गीकृत किया जा सकता है। दोनों सरकारों ने एक समान बड़ी-बड़ी घोषणाएं एवं वादे किये हैं,लेकिन घोषणाओं को लागू करने के लिहाज से यूपीए सरकार ने बेहतर कदम उठाए हैं। हालांकि कारोबारियों के नजरिए से दोनों सरकारों ने सिर्फ लोगों को निराश किया है।
वहीं वैश्विक पटल पर यूपीए सरकार ने भारत की तस्वीर को ग्लोबलाइज किया है। नतीजतन विदेशी धरती पर एक आम भारतीय स्वयं को अच्छे हालातों में देख रहा है। इसके अलावा एनडीए की सरकार में थिंकटैंक पॉवर की कमी हमेशा देखी गई। जिसके चलते केंद्र की सत्ता में रहते हुए कोई उल्लेखनीय कार्य इस सरकार द्वारा नहीं किया गया,वहीं राज्य की सरकारों में एनडीए ने उल्लेखनीय कार्य किए हैं। यूपीए सरकार के शासनकाल के दौरान सर्विस सेक्टर में बेहतर नीतियां लागू की गई हैं, जिससे बेहतर परिणाम सामने आए हैं और कारोबारियों के चेहरे पर खुशी देखी जा सकती है।
यूपीए फैसला लेने में है नाकाम
नफीस अहमद, 211, जगत ट्रेड सेंटर, पटना
यूपीए और एनडीए में मतभेद तो हमेशा जारी रहेगा चाहे गद्दी पर कोई भी हो। बढ़ती महंगाई ने तो आम आदमी की कमर तोड़ दी है। आम आदमी के रोजमर्रा के खर्चों में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। बढ़ती तेल कीमतों और महंगाई से आम आदमी का बुरा हाल है। ऐसे हालत में देखा जाए तो व्यापारियों का सबसे बुरा हाल है, क्योंकि बढ़ती महंगाई के कारण कं पनियों को अपनी वस्तु या सेवा की दरों में इजाफा करना पड़ रहा है।
पर बाजार में खरीदार कम न हो जाए, इस डर से कीमतों में वृद्धि न करते हुए व्यापारियों का मुनाफा कम होता जा रहा है और व्यापारी इस महंगाई में दोहरी मार खा रहे हैं। व्यापारियों की मानें तो यूपीए और एनडीए में एनडीए बेहतर विकल्प है। क्योंकि यूपीए सरकार कभी अपने तरफ से कोई फैसला कर पाने में असमर्थ है। उसे हर बात के लिए वाम दलों की सलाह लेनी पड़ती है। और सरकार ने जब भी वाम दलों की सलाह मानी है, यूपीए का बुरा हाल हुआ है।
व्यावहारिक निर्णय मुश्किल
डॉ. सतीश कुमार शुक्ल, आर्थिक सलाहकार, मुंबई
कारोबारी जगत की अपनी दुनिया है और अपने गणित हैं, जबकि राजनीति की अपनी प्राथमिकताएं हैं। अत: दोनों में समन्वय कठिन है, लेकिन कारोबारी जगत हर सरकार से तालमेल बैठाकर अपना हित साध लेता है। कारोबारी जगत किस शासन में बेहतर था, यह कहना सैद्धांतिक तौर पर आसान हो सकता है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर इसका निर्णय करना मुश्किल है।
एनडीए के समय आर्थिक सुधारों का जोर था, लेकिन उसका सही प्रतिफल यूपीए के समय में ज्यादा प्राप्त हुआ। आर्थिक सुधार एक निरंतर प्रक्रिया है, जिसमें किसी समय विशेष पर यह कहना कि कौन बेहतर रहा, कठिन है। यह तो आम बात है कि पेड़ कोई और लगाता है और फल दूसरा खाता है। तुलनात्मक दृष्टि से यूपीए के समय ज्यादा खींचतान रही, जो कि किसी भी कारोबार के लिए घातक सिध्द हो सकती है। वैश्विक उथल-पुथल का खामियाजा तो यूपीए को ही भुगतना पड़ा।
यूपीए ने दिया है काफी फायदा
ओ.पी. मालवीय, गौतम नगर, भोपाल-23
देखा जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि कारोबारियों के लिए यूपीए सरकार बेहतर है, क्योंकि इस सरकार ने कारोबारियों को काफी फायदा दिया है। इस वर्ष के मार्च महीने तक लगभग सब कुछ ठीक था, परंतु अप्रैल, मई, जून में हर व्यापारी ने काफी धन बटोरा है। लोहा, सीमेंट, दलहन, मिर्च-मसाला के भाव ने आसमान छू लिए थे। खाद्य तेल के भाव में भी काफी उछाल रहा। बड़े-बड़े व्यापारियों ने अपनी काली सामग्री को नंबर वन बनाकर करोड़ों रुपये कमाये। केंद्र सरकार की क्या नीति रही, ये तो ऊपर वाला ही जाने, मगर भारत की जनता केंद्र सरकार का यह खेल जान चुकी थी।
लाख कोशिशों के बावजूद भी महंगाई पर लगाम लगा पाना संभव नहीं हो पा रहा है। यूपीए सरकार को इसका विरोध भी सहना पड रहा है। लगभग सभी पार्टियों ने इसका विरोध किया था, मगर देश की आम जनता की क्या हालत हुई, ये तो उनका दिल ही जानता है। अब इस सरकार को इसका खामियाजा भुगतना होगा। आपसी लड़ाई झगड़े के कारण देश की यह हालत हुई है। केंद्र सरकार और सुधार करे, औरों की भी सुनें और मिल-जुलकर काम करें। अब तो बेहतर यहीं होगा कि सरकार अपनी नीति बदले, तब ही वह आम जनता का दिल जीत पाएगी। यूपीए सरकार 100 प्रतिशत सरकार सफल हो, ऐसी कामना करते हैं।
महंगाई ने थोड़ा बिगाड़ा जायका
राजेन्द्र प्रसाद मधुबनी, फ्रेण्डस कॉलोनी, मधुबनी, बिहार
मौके का फायदा सभी उठाते हैं। कोई अवसर नहीं चूकना चाहता है। सरकार किसी की भी हो, सुधार की प्रक्रिया निरंतर चलती रहेगी। सुधार की नजर से देखें, तो इसका बीजारोपण एनडीए ने किया तो यूपीए ने इसे आगे बढ़ाया। निवेश की गाड़ी तेजी से दौड़ने लगी। विश्व स्तर पर निवेशकों के आंसू गिर रहे थे और भारत मुस्कुरा रहा था। शेयर के जरिये हमने धन लगाना शुरू किया। शेयर ने ऐसा उछाल मारा कि सारे रिकॉर्ड टूट गए। गरीब से गरीब भी शेयर को जानने लगा है। इंश्योरेंस कंपनियां और म्युचुअल फंडों ने इस प्रवृति को और आगे बढाया।
कारोबारियों को मुश्किलों को हल करने के लिए वर्तमान सरकार ने काफी कोशिशें भी की। लेकिन महंगाई ने जायका थोड़ा बिगाड़ दिया। लेकिन जहां तक कारोबारियों के हित और सुधार की बात है, तो उसका ख्याल हर सरकार को रखना हीं पड़ेगा। शेयर बाजार में विदेशियों के पैसे लगने लगे और जब उन्हें अपना फायदा मिल गया, तो वे बाजार से निकलने लगे। बाजार धाराशायी होने लगा और हम मूकदर्शक बने रह गए। इसलिए हमें इस संबंध में सतर्कता और बहुत कुछ सीखने की जरुरत है। इन चीजों पर सरकार से कोई फर्क नहीं पड़ता है।
एनडीए को मिलेंगे ज्यादा अंक
मिहिर वत्स, भोपाल
एनडीए सरकार को भी महंगाई का डंक सहना पडा था। प्याज वाली घटना ने तो सरकार को पटखनी तक दे दी थी। यूपीए सरकार के लिए कुछ इसी तरह की विकराल स्थिति आ गई है। महंगाई की चौतरफा मार से सरकार बौखला गई है। आज जब पानी सिर से ऊपर गुजरा तो सरकार को होश आया है। लेकिन होश आने का क्या फायदा, जब महंगाई पर नियंत्रण रखने में कोई सफलता नहीं मिल पा रही हो। लेकिन अगर सूक्ष्म तौर पर यह निश्चय करना जरूरी हो कि इन दोनों सरकार में कारोबारियों के लिए कौन बेहतर है, तो एनडीए को ज्यादा अंक जरूर मिलेंगे।
वैसे ये बात कुछ इस तरह की है कि अगर दो कमजोर विद्यार्थी में एक बेहतर हो, तो उसे ही तेज माना जाता है। वैसे मेरी राय में हर सरकार कारोबारियों के लिए अच्छा काम करना चाहती है। इसकी वजह केवल वोट प्राप्त करना मात्र नहीं है, बल्कि दलों को चुनाव लड़ने के लिए इनसे धन भी काफी मात्रा में प्राप्त होता है। इसलिए कोई भी सरकार नहीं चाहेगी कि कारोबारियों के प्रतिकूल कोई नीति बनाई जाए।
उम्मीद पर खरी नहीं उतरी
अपेक्षित टोंक, जैसलमेर, राजस्थान
आज जब चुनाव की दहलीज पर देश खड़ा है, इस बाबत यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कौन सरकार कारोबारियों के लिए बेहतर है। सत्तासीन सरकार लाचार है और दूसरी तरफ विपक्ष इस लाचारी का पूरा फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता है। इस राजनीतिक उठापटक में आपने एक दिलचस्प सवाल लोगों के सामने रखा है।
वैसे मैं समझता हूं कि हर सरकार कारोबारियों को अपने पक्ष में रखना चाहती है। इस लिहाज से देखें तो कोई भी सरकार कारोबारियों के खिलाफ किसी प्रकार का कदम उठाकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना नहीं चाहेगी। लेकिन आज जो हालात बन गए हैं, उस आधार पर लोगों को लगने लगा है कि यूपीए सरकार कारोबारियों की अपेक्षा पर खरी नहीं उतरी है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि यूपीए सरकार ने थोड़ी नीतिगत विफलता जरूर दिखाई है। इस तरह सरकार लोगों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई है।
एनडीए सरकार क्या कर लेती?
ऋषि रंजन, ए-502, नेहरू विहार, तिमारपुर, नई दिल्ली
सरकार चाहे एनडीए की हो या यूपीए की, महंगाई या कारोबारी नीतियां वैश्विक परिदृश्यों पर निर्भर करती है। आज के जो हालात हमारे सामने हैं, उससे एक बात तो स्पष्ट है कि अगर एनडीए की भी सरकार होती तो कमोबेश हालत इसी तरह की होती। हालांकि इस सरकार ने शुरुआती सालों में इसने कच्चे तेल की कीमतों में कोई इजाफा नहीं किया, क्योंकि इससे सरकार के राजनीतिक भविष्य को ग्रहण लग सकता था।
लेकिन जब तेल की वैश्विक कीमतें आसमान छूने लगी, तो सब कुछ सरकार के हाथों से निकलता हुआ मालूम पड़ने लगा। इसके अलावा वैश्विक खाद्यान्न संकट का भी असर कीमतों में दिखने लगा। आज महंगाई की जो भी स्थिति हमारे देश में है, उसके लिए कहीं-न-कहीं सरकार की अदूरदर्शिता दिखती है। लेकिन एनडीए को क्लीन चिट दे देना भी मुश्किल है।
पुरस्कृत पत्र
पहले के कामों को भुलाना गलत
श्रीमती रमेश खन्ना, प्रधानाचार्य (सेवानिवृत)कन्या इंटर कॉलेज, लखनऊ
वर्तमान को बुरा और पहले को अच्छा कहने की आदत हम हिंदुस्तानियों की आदत रही है। यूपीए सरकार में अगर कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से दाम बढ़े है तो लोगों की क्रयशक्ति भी बढ़ी है। लोगों का वेतन जो बीते चार सालों में बढ़ा है, वह पहले कभी नहीं हुआ है। आखिरकार क्रय शक्ति बढ़ेगी तभी तो कारोबारियों की पौ बारह होगी। ऐसे ही नहीं उत्तर प्रदेश के छोटे शहरों में शॉपिंग मॉल और बडी क़ंपनियों के शोरूम खुल रहे हैं।
चिदंबरम को अच्छे काम की शाबाशी मिलनी चाहिए। वैसे भी महंगाई जैसे गंभीर और नाजुक मामले पर किसी सरकार के पहले के सारे कामों को भुला देना भी उचित नहीं है। वैसे भी जरा सोचिए कि कौन सरकार चाहेगी कि चीजों की कीमतें बढ़ा दी जाएं और लोग परेशान हो जाएं। इस लिहाज से यूपीए सरकार ने धैर्य बनाए रखा, वह प्रशंसा के लायक है।
सर्वश्रेष्ठ पत्र
होम वर्क नहीं किया यूपीए ने
सुशीला देवी, सृष्टि रुपा भवन, सरस्वती लेन, पूर्वी लोहानीपुर,पटना, बिहार
मैं एनडीए को ही बेहतर मानती हूं। कारण है कि उस सरकार ने कारोबारियों से लेकर गृहणियों तक का ख्याल रखा था। किचेन बजट संतुलित था। प्याज रुलाई के अलावा कोई बड़ी घटना नही घटी थी। उस सरकार के पास दूरदर्शिता और बाजार नियामक करने की क्षमता थी। लेकिन यूपीए सरकार ने महंगाई रूपी भावी संकट का अनुमान लगाने में सामान्य सतर्कता का भी परिचय नहीं दिया। 8 से 9 प्रतिशत विकास दर के सम्मोहन में उसने न तो कृषि की ओर ध्यान दिया और न ही कृषि उत्पादों के उचित भंडारण पर।
जादुई छड़ी नहीं है सरकार के पास
हर्षवर्द्धन कुमार, डी- 55,56, द्वितीय तल, गांधी विहार, नई दिल्ली-9
1991 में खुली अर्थव्यवस्था नीति आने से सरकार का बाजार पर से नियंत्रण घटा। ऐसे में किसी भी सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है, चाहे वह यूपीए हो या एनडीए। आखिर एनडीए सरकार के समय में भी तो प्याज रुलाई ने लोगों के होश उडा दिए थे। यूपीए सरकार को दोष देने के बजाए हमें जमीनी हालात समझना चाहिए कि महंगाई के लिए कुछ अंतरराष्ट्रीय कारक भी जिम्मेदार हैं। यूं भी सरकार के पास कोई जादुई छड़ी नहीं है, जो उसे घुमाया और सब कुछ ठीक हो जाए। सब्सिडी देकर बोझ और बढ़ रहा है।
लोग एनडीए की तरफ देख रहे हैं
जितेन्द्र खन्ना, क्षेत्रीय प्रतिनिधि-एलारसिन फार्मा, लखनऊ
सरकार यूपीए को हो या एनडीए की, गरीब तो हर किसी के समय में पिस रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि एनडीए की सरकार में भाजपा और अन्य घटक दलों में आम आदमी के लिए संवेदनाएं ज्यादा थी। यूपीए सरकार की एक निगाह वैश्विक संकट पर रहती है, तो दूसरी आंख लोगों की जेब पर रहती है। वर्तमान सरकार के समय में किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा है। यूपीए सरकार न तो लोगों को राहत दे रही है और जो महंगाई मुंह फाड़ कर बढ़ती जा रही है, उसे भी नियंत्रित कर पाना उसके लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
सरकार की नीतियां रहीं अदूरदर्शितापूर्ण
सुनील अग्रवाल, प्रतिनिधि-एचडीएफसी, लखनऊ
कारोबार के लिहाज से तो एनडीए सरकार ही बेहतर थी। जनता की आम जरूरतों के सामान की कीमतें नियंत्रण में थीं और तेल की कीमतें भी लोगों की जेब के मुताबिक हुआ करती थीं। आज तो लोगों को यह भी नहीं पता कि तेल की कीमतें किस ऊंर्चाई को हासिल करेंगी। एक समय था, जब लोग कच्चे तेल की वैश्विक कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल भी नहीं सोच पाते थे, आज यह सोचना आम हो गया है कि यह 200 डॉलर पार कर रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि आखिरकार सरकार ऐसे में अदूरदर्शिता क्यों दिखाती रही? इसी कारण जरूरी चीजों की कीमतें बढ़ी हैं।
बकौल विश्लेषक
इतनी उपलब्धियां हैं तो फिर क्यों फोड़ें महंगाई का ठीकरा
अजय प्रकाश, प्रोफेसर, व्यापार प्रबंधन विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय
मेरे विचार से यूपीए सरकार के कामकाज में कोई खास खामी नहीं दिखती है । कारोबारियों के लिए वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने खासी उदारता दिखाई हैं। हमें यह समझना होगा कि महंगाई, कच्चे तेल का दाम बढ़ना और खाद्यान्न संकट, इन सभी के कारण वैश्विक हैं। महंगाई की आग सारे देश में फैली हुई है। यहां तारीफ करनी होगी यूपीए सरकार की जिसने वैश्विक खाद्यान्न संकट को भारत में नहीं आने दिया। इस बार फसल का अच्छा होना कुछ मौसम की मेहरबानी बाकी किसानों की हाड़तोड़ मेहनत का नतीजा है। इस साल फसल बीते चार सालों से अच्छी ही रही है।
रही बात तेल की कीमतों की तो एनडीए के पास ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है, जिससे यह मंहगाई को काबू में रख सकती और जनता को राहत पहुंचाती। गौर करने लायक बात यह है कि तेल कंपनियो का घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। इसके बावजूद हमारे देश में तेल की कीमतें पड़ोसी देशों के मुकाबले कहीं ज्यादा कम हैं। यूपीए सरकार में सेंसेक्स की उड़ान को कौन भूल सकता है। आज आम आदमी की व्यापारियों के सोच में बढ़ोतरी होने के साथ आमदनी और कमाई में भी बढ़ोतरी हुई है। शेयर बाजार में आम आदमी का दखल बढ़ रहा है। व्यापार के चैनल आम आदमी की भाषा हिन्दी की ओर रुख कर रहे है।
यह सब कुछ उपलब्धियां यूपीए सरकार के कार्यकाल में ही देखने को मिली हैं। इतनी सारी उपलब्धियों के बावजूद महंगाई का ठीकरा चिदंबरम, मनमोहन और यूपीए के सिर फोड़ना कहां की समझदारी है। लोगों को यह समझना होगा कि महंगाई से जुड़ा मामला एक प्रकार का वैश्विक प्रभाव भी तो होता है।
बातचीत: सिद्धार्थ कलहंस
विकास तो किया पर चूक भी पड़ सकती है काफी महंगी
अशोक मीनावाला, चेयरमैन, ऑल इंडिया जेम्स एंड ज्वेलरी ट्रेड फेडरेशन, मुंबई
किसी पार्टी विशेष की बात न करके देश के विकास की बात की जाए तो बेहतर होता है। देश की सत्ता किसी भी पार्टी के पास रहे मायने यह नहीं रखता, मायने यह रखता है कि किसने कितना विकास किया और विकास के कामों में कहां चूक हो गई। यूपीए मई 2004 में जब सत्ता में आई थी तो उस समय देश की सकल घरेलू विकास दर 8.5 फीसदी थी, जो इस समय 9 फीसदी के आसपास चल रही है। यह विकास दर भारतीय जनता पार्टी के अगुवाई वाले गठबंधन यानी एनडीए के समय बहुत कम थी ।
चार फीसदी से नीचे चल रही विकास दर को एनडीए ने अपने कार्यकाल में 8 फीसदी से ऊपर ले जाकर देश के विकास को एक नई गति दी थी। हमें याद है कि विदेशों में हमारी विकास दर को हिन्दू ग्रोथ रेट कह कर मजाक उड़ाया जाता था, जो आज सभी के लिए प्रेरणा का विषय बनी हुई है। मेरे कहने का मतलब यह है कि जिस विकास को एनडीए ने शुरू किया था यूपीए ने उस दर को नीचे न लाकर एक मजबूती प्रदान की है। विकास के जिस पौधे को एनडीए ने लगाया था यूपीए सरकार ने उसको बखूबी पाला है।
अपने कार्यकाल के आखिरी समय में एनडीए ने इंडिया शाइनिंग की चमक में कई जरूरी कामों की अनदेखी कर दी थी, उसी तरह यूपीए महंगाई की मार में इस समय बेसहारा दिखाई दे रही है। हालांकि महंगाई में वैश्विक कारण मेन रोल प्ले कर रहे हैं पर जवाब तो सरकार को ही देना होगा। शेयर बाजार का हाल भी किसी से छुपा नहीं है, जिसकी नाराजगी भी सरकार को झेलनी ही होगी।
बातचीत: सुशील मिश्र
…और यह है अगला मुद्दा
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