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खूबसूरत एयरपोर्टों का है इंतजार

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 1:41 PM IST

आपको यह लगा था कि हवाई अड्डों का निजीकरण, पर्यटन उद्योग के लिए  एक ताजी सुबह की तरह आएगा। सच कहूं तो यह बात सच भी है और झूठ भी।


पिछले हफ्ते मैंने मुल्क के उन चार शहरों का दौरा किया, जहां नए प्राइवेट एयरपोर्ट हैं। यहां साफ दिखता है कि घरेलू हवाई अड्डों पर किस तरह सेवाओं में सुधार हुआ है। यहां यात्रियों के लिए चौड़े गलियारे, ज्यादा चेक-इन काउंटर, अच्छी रोशनी, साफ-सुथरा फर्श, साफ टॉयलेट, अच्छा खाना, खूबसूरत शॉपिंग एरिया, जबरदस्त पार्किंग स्पेस और बस व टैक्सियों के लिए अच्छी-खासी जगह मौजूद थी।

आप साफ देख सकते हैं, जब यह एयरपोर्ट बनकर तैयार हो जाएंगे तो मुल्क को अपने एयरपोर्टों पर शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं रहेगी। हालांकि, अब भी दिल्ली और मुंबई के हवाई अड्डों में काफी सुधार की जरूरत है। उनकी हालत देखकर लगता है कि उनपर बमों की बारिश की गई है। दिल्ली एयरपोर्ट की हालत तो और भी खस्ता है। यहां पर काम काफी धीमी रफ्तार से हो रहा है। इसलिए लोगों को काफी दिक्कत हो रही है।

लेकिन यहां अब नया रनवे बनकर तैयार हो रहा है। इसका मतलब यह है कि अब विमानों को शहर के ऊपर कम चक्कर काटना पड़ेगा। इस बारे राहत की बात यह लगती है कि बेंगलुरु और हैदराबाद एयरपोर्टों की दुर्दशा के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर लिखा जाता है। बेंगलुरू एयरपोर्ट से शहर के होटल तक पहुंचने में मुझे रात के आठ बजे केवल 36 मिनट लगे थे। वहां से वापस हवाई अड्डा पहुंचने में मुझे 40 मिनट लगे, वह भी थोड़ी-बहुत भीड़ की वजह से। इसे बुरा तो नहीं कहा जा सकता। हैदराबाद में थोड़ा ज्यादा वक्त लग गया, करीब एक घंटा।

लेकिन राहत नेशनल हाईवे पर बन रहे एक पुल को देखकर मिलती है, जिससे आप कुछ मिनटों में ही हवाई अड्डे तक पहुंच जाएंगे। वैसे, हालात इतने अच्छे भी नहीं हैं। बेंगलुरु और हैदराबाद के एयरपोर्टों में डिपार्चर गेट को बहुत छोटा बनाया गया है। मतलब सामान के साथ इनसे पार पाने में आपको खासी मशक्कत करनी पड़ेगी। साथ ही, यहां के वेटिंग एरिया में कई तरह की दुकानें और एक फूड कोर्ट बना दिया गया है। इस वजह से यहां माहौल काफी तकलीफदेह हो जाता है। यहां एक अदद कुर्सी की तलाश में आपको घंटों लग सकते हैं। ऊपर से यहां लाइनें भी इन्हीं कुर्सियों के बीच से होकर गुजरता है।

इसके अलावा, तेज आवाज वाला एनाउन्समेंट सिस्टम भी लगता है कि आपके कान के पर्दे फाड़कर ही चुप होगा। मुझे एयरपोर्ट पर एक अदद बुकशॉप की भी काफी कमी महसूस हुई। पुराने वाले एयरपोर्ट पर आपको किताबों की बेहतरीन दुकान बड़ी आसानी दिख सकती थी। नए एयरपोर्ट पर तो एक बड़े से स्टोर में बस कुछेक छोटे से बुकशेल्फ हैं। एयरलाइन लाउन्ज अभी बनकर तैयार नहीं हुए हैं। इसकी जानकारी भी आपको आसानी से नहीं मिलती है।

आप एयरलाइन लाउन्ज  की तलाश में बस एयरपोर्ट के चक्कर ही काटते रह जाएंगे, जब तक कि कोई आपको इस बारे में बता नहीं देता। ऊपर से यहां गुसलखाने भी ऐसे हैं, जिन तक पहुंचने के लिए आपको लंबी यात्रा करनी पड़ेगी। लेकिन सबसे बड़ी खामी तो मुझे यह दिखी कि बेंगलुरु में सारे एयरक्राफ्ट एयरोब्रिज से अच्छी खासी दूरी पर रुकते हैं, और मुसाफिरों को बसों के जरिये एयरपोर्ट तक लेकर आते हैं। यह आलम इसलिए है क्योंकि बेंगलुरु का यह चमचमाता एयरपोर्ट एयरलाइन कंपनियों से एयरोब्रिज के इस्तेमाल के लिए मोटी फीस की डिमांड कर रहा हैं।

वजह तो एयरपोर्ट ही जाने, लेकिन चूंकि मुसीबत के इस वक्त में एयरलाइन कंपनियां लागत कम करने की कवायद में जुटी हुई हैं, इसलिए वे यह फीस नहीं दे रही हैं। हैदराबाद एयरपोर्ट की हालत काफी बेहतर है। हालांकि, उसकी फ्लोरिंग में काफी खामी है। वहां टाइलों को ठीक तरीके से नहीं लगाया गया है। वैसे उम्मीद है कि कम से कम इतने सुधार तो दिल्ली और मुंबई के एयरपोर्टों पर दिखेंगे।

First Published : July 25, 2008 | 10:38 PM IST