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दूसरों को पछाड़ने का वॉट एन आइडिया?

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 9:45 AM IST

आइडिया की शुरुआत बहुत ज्यादा अच्छी नहीं रही थी। जबकि देश के दो बड़े कारोबारी घराने इससे जुड़े हुए थे।


जैसे बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपने बेटे के करियर को आगे बढ़ाने में मदद की, वैसे ही आइडिया में सबसे बड़ी हिस्सेदार कंपनी आदित्य विक्रम बिड़ला समूह ने भी इसको प्रोमोट करने की दिशा में काफी काम किया है। गौरतलब है कि अभिषेक बच्चन ही आइडिया के ब्रांड एंबेसडर भी हैं।

समूह की कोशिश आने वाले पांच साल में आइडिया को इस श्रेणी की तीन शीर्ष कंपनियों में से एक बनाने की है। फिलहाल देश में मोबाइल सेवा मुहैया कराने वाली कंपनियों में आइडिया पांचवें पायदान पर है। वैसे शीर्ष तीन कंपनियों में शामिल होने की कवायद काफी मुश्किल है। शीर्ष तीन कंपनियों की तो बात ही छोड़ें चौथे पायदान पर खड़ी सरकारी कंपनी ‘भारत संचार निगम लिमिटेड’ भी आइडिया की पहुंच से काफी दूर दिख रही है।

बीएसएनएल के जहां 3.7 करोड़ ग्राहक हैं वहीं आइडिया के ग्राहकों की संख्या महज 3 करोड़ 6 लाख ही है। वैसे आइडिया काफी पहले इस दौड़ में शामिल हो गई थी इसके बावजूद 6,720 करोड़ रुपये की यह कंपनी शीर्ष कंपनियों में अपनी जगह नहीं बना पाई। शुरुआती दौर में आइडिया को कई असफलताओं से भी दो चार होना पड़ा। शुरुआत में इसका नाम बिड़ला-एटीएंडटी-टाटा था जो कि बहुत आकर्षक नहीं था। और जब बीपीएल भी इसमें शामिल हो गई तब तो इसका नाम डरावना ही लगने लगा था, हालांकि यह गठजोड़ ज्यादा समय तक टिक भी नहीं पाया था।

और जब एटीएंडटी भी इसमें से अलग हो गई तब देसी कारोबार जगत के सबसे बड़े दो नाम टाटा और बिड़ला ही इसमें बचे रह गए। बाद में टाटा ने भी जीएसएम के बजाय सीडीएमए नेटवर्क पर ध्यान देना अधिक मुनासिब समझा और इससे अलग होने में ही भलाई समझी तब अप्रैल 2006 में टाटा ने अपनी हिस्सेदारी बिड़ला समूह को ही बेच दी थी। वैसे 2002 में ही कंपनी का नाम बदलकर ‘आइडिया’ किया गया था। नई दिल्ली की एक कॉन्फ्रेंस में कंपनी के बड़े अधिकारियों ने इसका नाम बदलने की कहानी भी बताई थी।

दरअसल आइडिया नाम के लिए कंपनी को फ्रांसीसी लेखक विक्टर मैरी ह्यूज द्वारा लिखी एक बात से प्रेरणा मिली। इस पंक्ति का मजमून भी कुछ इस तरह है कि जब किसी विचार (आइडिया) का अच्छा समय आ जाता है तो फिर उससे ऊपर कोई चीज नहीं रह जाती है। लेकिन यह पंक्ति नाम बदलने की कोशिश में अक्षरश: सही नहीं लगती हैं क्योंकि अभी तक तो ऐसा नहीं लगता कि यह दौर आइडिया के नाम रहने वाला है। कुल 22 सर्किलों में से आइडिया केवल 11 में मौजूद है और अभी स्पाइस के हालिया के अधिग्रहण को भी जोड़ लें तो यह संख्या 11 से बढ़कर 13 तक पहुंच जाती है।

इस तरह से अखिल भारतीय स्तर के दर्जे से कंपनी अभी भी दूर ही दिख रही है। लेकिन आदित्य विक्रम बिड़ला समूह के मुखिया कुमार मंगलम बिड़ला इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। उनका विश्वास है कि जल्द ही स्थिति बदलने वाली है। दूरसंचार क्षेत्र के प्रमुख दिग्गजों में से एक बी के मोदी की स्पाइस टेलीकॉम में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी खरीदने के बाद बाजार में आइडिया की हिस्सेदारी 9 फीसदी से बढ़कर 11 फीसदी हो गई।

इसके अलावा आइडिया को पंजाब और कर्नाटक जैसे मुनाफे वाले सर्किलों में पैठ बनाने का रास्ता भी मिल गया। कुछ साल में आइडिया की शीर्ष 3 कंपनियों में शामिल होने की संभावनाओं पर बिड़ला का कहना है कि हम बाजार से भी तेज बढ़ने की नीति पर काम कर रहे हैं। और इसी नीति के तहत हम अपने बाजार को बढ़ा रहे हैं।

मुश्किलें हैं राहों में

कुछ बातें कहने में बड़ी आसान लगती हैं लेकिन उनको पूरा करना बहुत टेढ़ी खीर साबित होता है। बिड़ला का कथन भी कुछ इसी तरह का लगता है। इसमें कोई शक नहीं कि पिछले कुछ वर्षों में आइडिया ने बहुत तेजी से तरक्की की है। लेकिन यह वृद्धि बहुत छोटे स्तर पर हुई है। इसकी प्रतिद्वंदी कंपनियां इससे बड़े स्तर पर तेजी से आगे बढ़ रही हैं।

उदाहरण के तौर पर मार्च 2008 में 1.4 करोड़ के बेस में आइडिया की हिस्सेदारी 71 फीसदी की रही जबकि 2.6 करोड़ के बेस में वोडाफोन की हिस्सेदारी 69 फीसदी की रही। वहीं दूसरी ओर यदि आइडिया की बाजार में हिस्सेदारी 100 बेसिस पॉइंट बढ़कर 9 फीसदी तक पहुंच गई तो भारती एयरटेल में इसमें दोगुने का इजाफा हुआ और उसकी हिस्सेदारी बढ़कर 24 फीसदी तक पहुंच गई है जो कि आइडिया की बाजार हिस्सेदारी के तीन गुने से कुछ ही कम है।

वहीं अप्रैल 2007 से जनवरी 2008 के बीच आइडिया की कवरेज बढ़कर लगभग दोगुने तक पहुंच गई। हालांकि सितंबर से नवंबर 2006 के बीच पूर्वी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल में आने के बाद इसने अपना दायरा और नहीं बढ़ाया वहीं इसकी प्रतिद्वंदी कंपनियां ऐसा करने में कामयाब रहीं। भारती एयरटेल जहां 5,000 कस्बों में मौजूद है वहीं आइडिया की पहुंच केवल 2,735 कस्बों में है। कई लोग ऐसा सोचते हैं कि यदि आइडिया ऐसा नहीं कर पा रही है तो उसको वोडाफोन के साथ हाथ मिला लेना चाहिए। लेकिन बिड़ला इससे सहमत नहीं हैं, उनका मानना है कि फिलहाल हम ऐसी किसी भी बात के बारे में नहीं सोच रहे हैं।

हां वह यह बात जरूर बताते हैं कि आइडिया की अपने दम पर आगे बढ़ने की योजना है। और स्पाइस के हालिया अधिग्रहण से बिड़ला की बात में दम भी नजर आता है। कंपनी के प्रबंध निदेशक संजीव आगा कहते हैं कि स्पाइस रणनीतिक तौर पर बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसको खरीदने से हमें पंजाब और कर्नाटक जैसे समृद्ध राज्यों में प्रवेश मिल गया है और इन प्रदेशों में कंपनी को मार्केटिंग के लिए फिर से शुरुआत नहीं करने पड़ेगी। लेकिन सब कुछ मिलाकर भी कंपनी की बाजार में हिस्सेदारी महज 11 फीसदी ही है। इस क्षेत्र में कुछ और बड़े खिलाड़ी भी मैदान में उतरने जा रहे हैं, जिनसे निपटना भी कंपनी के सामने बड़ी चुनौती है।

रिलायंस कम्युनिकेशंस जल्द ही जीएसएम मोबाइल के क्षेत्र में भी उतरने जा रही है, सिस्टेमा की 2010 तक 3.5 करोड़ ग्राहक बनाने की योजना है। वीडियोकोन और रियल एस्टेट की कंपनी यूनिटेक भी जल्द ही इस बाजार में उतरने की योजना बना रही हैं। इसको देखते हुए इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आइडिया जल्द से जल्द बाजार में अपनी हिस्सेदारी को बढ़ाना चाहती है। अगले 6 महीनों में कंपनी तमिलनाडु, उड़ीसा, बिहार और मुंबई में अपना नेटवर्क शुरू करने जा रही है। इसमें से बिहार और मुंबई में तो इसी साल की शुरुआत में ही नेटवर्क शुरू किया जाना था।

आगा बताते हैं कि अगले 2 महीनों में मुंबई में आइडिया का नेटवर्क काम करने लगेगा जबकि बाकी तीन जगहों में इसके लिए 6 महीने लगेंगे। इस सबके बावजूद सभी जगहों पर आइडिया का नेटवर्क होने में अभी काफी समय लगेगा। केपीएमजी में टेलीकॉम प्रेक्टिस के कार्यकारी निदेशक रोमल शेट्टी कहते हैं कि टेलीकॉम कंपनियों के लिए राष्ट्रीय नेटवर्क अब अनिवार्य हो गया है।

उनका कहना है कि जब टैरिफ कीमतें काफी कम हो चुकी हैं तो इन कंपनियों के पास रोमिंग में कमाई करना एक अच्छा विकल्प है और ऐसा ये तभी ठीक ढंग से कर सकती हैं जब इनका नेटवर्क अखिल भारतीय स्तर पर हो। अगर कोई कंपनी रोमिंग सुविधा के लिए किसी दूसरी कंपनी पर निर्भर रहती है तो ये निर्भर रहने वाली कंपनी को काफी महंगा पड़ता है।

First Published : July 8, 2008 | 3:14 AM IST