हरियाणा राज्य सीएमआईई की उपभोक्ता पिरामिड घरेलू सर्वेक्षण की रिपोर्ट में अपनी उच्च स्तर की बेरोजगारी दर के लिए अक्सर सुर्खियों में रहता है। इस राज्य की सबसे अधिक बेरोजगारी दर अगस्त 2022 में असाधारण तरीके से 37.3 प्रतिशत के उच्च स्तर पर है। जबकि इसकी तुलना में इसी महीने के दौरान भारत की बेरोजगारी दर 8.3 प्रतिशत थी।
हरियाणा भारत के सबसे समृद्ध राज्यों में से एक है। राज्य की आर्थिक समीक्षा के अनुसार वर्ष 2021-22 में, हरियाणा का प्रति व्यक्ति शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद 274,635 रुपये था जो 150,326 रुपये के राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुना था। आर्थिक समीक्षा में राज्य के श्रम बाजारों के बारे में बात नहीं की गई है लेकिन हम उपभोक्ता पिरामिड घरेलू सर्वेक्षण (सीपीएचएस) से जानते हैं कि हरियाणा आसानी से अपनी श्रम बल भागीदारी दर (एलपीआर) की तारीफों के पुल बांध सकता है जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है।
उदाहरण के लिए, अगस्त 2022 में, राज्य की श्रम बल भागीदारी दर 47.7 प्रतिशत थी, जो 39.2 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। हरियाणा में यह सबसे ज्यादा एलपीआर है और यह सामान्य 42.6 प्रतिशत एलपीआर की तुलना में भी बहुत अधिक है जो राज्य दर्ज करता है। हरियाणा हमेशा राष्ट्रीय औसत से अधिक एलपीआर दर्ज करता है लेकिन अगस्त का रिकॉर्ड असाधारण है।
अगस्त 2022 में उच्च स्तर का एलपीआर ही महीने में राज्य की उच्च स्तर की बेरोजगारी दर के लिए जिम्मेदार है। भारत के श्रम बाजार की चुनौती कम श्रम बल भागीदारी से जुड़ी हुई है। कम एलपीआर काम करने में लोगों की कम दिलचस्पी के संकेत देता है जिससे मजदूरी मिलती है। औसत से अधिक एलपीआर यह संकेत देता है कि हरियाणा के लोग देश के बाकी हिस्सों की तुलना में श्रम बाजारों में काम करने के लिए अधिक इच्छुक हैं। हरियाणा में अगस्त 2022 में एलपीआर की असाधारण वृद्धि का अर्थ यह है कि राज्य के लोग सामान्य से अधिक रोजगार की तलाश करने के लिए प्रेरित थे।
यह बात ध्यान देने योग्य है कि भारत की श्रम शक्ति में हरियाणा की हिस्सेदारी बढ़ती जा रही है। वर्ष 2016 में हरियाणा की भारत की श्रम शक्ति में लगभग 2 प्रतिशत की हिस्सेदारी थी। वर्ष 2022 तक यह बढ़कर 2.3 प्रतिशत हो गया था। हरियाणा का एलपीआर 2018 तक भारत की तुलना में कम था। इसके बाद से यह अधिक हो गया है। हरियाणा के एलपीआर पर कोविड-19 की वजह से लगाए गए लॉकडाउन का कम प्रभाव हुआ था।
वर्ष 2022 के दौरान हरियाणा में पुरुष एलपीआर पूरे देश के स्तर के पुरुष एलपीआर की तुलना में काफी अधिक रहा है। हालांकि महिलाओं के लिए हरियाणा और अखिल भारतीय स्तर की श्रम बल भागीदारी के बीच का अंतर काफी हद तक कम हो गया है। हम इसका अध्ययन करने के लिए सीपीएचएस वेव-स्तर डेटा का इस्तेमाल करते हैं क्योंकि नमूना अधिक प्रतिनिधित्व को दर्शाता है। एक सीपीएचएस वेव चार महीने की अवधि है जिस दौरान नमूने का विश्लेषण किया जाता है।
सितंबर-दिसंबर 2021 के दौरान हरियाणा और भारत दोनों ही जगहों में पुरुषों के लिए एलपीआर 67.4 प्रतिशत था। जनवरी-अप्रैल 2022 में, हरियाणा में पुरुषों के लिए एलपीआर बढ़कर 67.6 प्रतिशत हो गया लेकिन पूरे देश भर के लिए यह कम होकर 66.4 प्रतिशत के स्तर तक आ गया। मई-अगस्त 2022 के दौरान, यह अंतर बढ़ गया क्योंकि भारत के लिए पुरुष एलपीआर घटकर 65.7 प्रतिशत हो गया, लेकिन हरियाणा में यह बहुत मामूली रूप से कम होकर 67.5 प्रतिशत हो गया।
भारत और हरियाणा की महिलाओं के एलपीआर के बीच के अंतर को कम करने के दो समयावधि मई-अगस्त 2019 और मई-अगस्त 2022 से दर्शाया जा सकता है। इससे पहले की अवधि के दौरान, भारतीय महिला की एलपीआर 11 प्रतिशत थी और हरियाणा के लिए यह 7.8 प्रतिशत थी और इस तरह इसमें 3.2 प्रतिशत अंकों का अंतर था। बाद की अवधि के दौरान यह अंतर कम होकर 0.9 प्रतिशत तक हो गया। भारतीय महिला का एलपीआर घटकर 8.4 प्रतिशत रह गया लेकिन हरियाणा के लिए यह अपेक्षाकृत 7.6 प्रतिशत के स्तर पर स्थिर रहा।
परोक्ष रूप से, हरियाणा रोजगार खोजने के लिए भारतीय श्रमिकों के लिए एक पसंदीदा गंतव्य है। चुनौती यह है कि राज्य, रोजगार के अवसरों में इसी बढ़ोतरी के साथ रोजगार की बढ़ती मांग की बराबरी करने में असमर्थ है। महिलाओं के लिए चुनौती असमान रूप से अधिक है।
हरियाणा की समस्या की शुरुआत 2017 के अंत में शुरू होती दिख रही है। राज्य की बेरोजगारी दर मई-अगस्त 2017 के दौरान 4 प्रतिशत से भी कम स्तर से बढ़कर सितंबर-दिसंबर 2017 के दौरान 14.5 प्रतिशत और फिर 2018 में 20 प्रतिशत से अधिक हो गई और फिर उच्च स्तर पर पहुंच गई।
हरियाणा में पुरुष बेरोजगारी दर मई-अगस्त 2017 के दौरान 2.9 प्रतिशत से बढ़कर कोविड-19 प्रभावित मई-अगस्त 2020 की अवधि के दौरान 28.1 प्रतिशत के शीर्ष स्तर पर पहुंच गई। तब से, मई-अगस्त 2021 के दौरान कोविड-19 की दूसरी लहर में 25 प्रतिशत की वृद्धि को छोड़कर दर लगभग 22 प्रतिशत तक कम हो गई है। ये बेरोजगारी दर स्पष्ट रूप से अधिक है लेकिन वे श्रम भागीदारी दर में वृद्धि को दर्शाती हैं।
संभवतः रोजगार के संबंध में राज्य सरकार के सामने आने वाली चुनौतियों को देखते हुए उसने मार्च 2021 में निजी क्षेत्र में कुछ नौकरियों का 75 प्रतिशत स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित करने के लिए कानून पारित किया। लेकिन कानून को अदालतों में चुनौती दी गई ।
इस बीच राज्य में महिलाओं के लिए बेरोजगारी दर नाटकीय रूप से खराब स्तर पर चली गई। मई-अगस्त 2017 के दौरान महिलाओं को 12.3 प्रतिशत की बेरोजगारी दर का सामना करना पड़ा, जब राष्ट्रीय औसत 9.1 प्रतिशत था। लेकिन, 2020 के अंत में हरियाणा में महिला बेरोजगारी दर लगभग लगातार 70 प्रतिशत से ऊपर रही है जबकि राष्ट्रीय औसत 13 से 15 प्रतिशत के बीच था।
उच्च बेरोजगारी दर के बावजूद हरियाणा के प्रति श्रमिकों का आकर्षण जारी रहा। इसकी बढ़ती श्रम बल भागीदारी दर से भी बात स्पष्ट होती है। यह बात विशेष रूप से गौर करने लायक है कि उच्च बेरोजगारी दर के बावजूद हरियाणा की महिलाओं में राष्ट्रीय औसत से अधिक एलपीआर है। इसी वजह से हरियाणा में श्रमिक उतने निराश नहीं हैं, जितने कि वे देश के अन्य हिस्सों में हैं। वे रोजगार के अवसरों के तैयार होने का इंतजार कर रहे हैं क्योंकि वे बढ़ती ताकत के साथ श्रम बाजारों में उतरते रहते हैं।