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क्या है वायदा कारोबार का भविष्य

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 2:06 PM IST

कृषि से संबध्द स्थायी समिति ने कृषि उत्पादों के वायदा कारोबार को बढ़ावा नहीं देने के जो सुझाव दिए हैं उन पर कोई भी कदम उठाने से पहले बहुत सोच विचार की जरूरत है क्योंकि इस मामले में स्थिति बहुत साफ नहीं है।


समिति का इस बारे में तर्क था कि वायदा कारोबार की वजह से ही ऐसे उत्पादों के दाम काफी बढ़ जाते हैं और इस घटना को आलोचकों की कड़ी प्रतिक्रिया का सामना भी करना पड़ता है। हालांकि समिति को पता है कि भले ही वह इस मसले पर अपने सुझाव दे रही है पर उसकी अपनी सीमाएं भी हैं और उसे यह भी पता है कि वायदा करोबार से हेजिंग के लिए बेहतर मंच भी प्राप्त होता है।

जिस तरीके से भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने शेयर बाजारों के लिए कुछ खास दिशा निर्देश जारी किए हैं, कुछ उसी राह पर चलते हुए स्थायी समिति ने भी सुझाव दिया है कि वायदा बाजार में कमोडिटीज के कारोबार के लिए और सख्त नियामकों की जरूरत है। इन सब मसलों को मिलाकर विचार किया जाए तो पता चलता है कि वायदा कारोबार के अपने फायदे हैं तो उससे जुड़े कुछ नुकसान भी हैं।

उदाहरण के लिए आप विश्व बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए उफान को देख सकते हैं। कुछ हद तक तेल के वायदा कारोबार में निवेशकों के पैसा लगाने से ऐसा हुआ है, कहें तो शायद गलत नहीं होगा। हालांकि तेल के विषय पर भी कुछ विशेषज्ञों की राय है कि फ्यूचर मार्केट में जो कुछ घट रहा है उसका बहुत अधिक असर स्पॉट मार्केट पर नहीं पड़ा है।

हालांकि यह सब कह कर शायद हम खुद की हार स्वीकारने जैसा ही कर रहे हैं क्योंकि एक बड़ी सच्चाई तो यह भी है कि वायदा कारोबार से उत्पादों की सही कीमतों का पता लगाने में मदद मिलती है। कीमतों पर वायदा कारोबार के पड़ने वाले असर पर नजर रखने वाली अभिजीत सेन समिति ने यह फैसला सुनाने से पहले कि वायदा कारोबार और चढ़ती कीमतों में कोई सीधा संबंध नहीं है, जरूर सट्टेबाजों की गतिविधियों पर पूरा ध्यान दिया होगा।

सच्चाई तो यह है कि आठ कृषि उत्पादों जिसमें अनाज, दाल, खाद्य तेल, आलू, रबर भी शामिल हैं, के वायदा कारोबार पर रोक लगा दी गई है। उसके बावजूद इन उत्पादों की कीमतों में लगातार इजाफा जारी है। समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है तो यह मसला अपने पहले सिद्धांत से आगे बढ़ गया है। अब मुद्दा एक स्थायी कानून बनाने का है (मौजूदा विधेयक के समाप्त हो जाने से कमोडिटीज नियामकों को एक हथियार मिल गया है)। जो लोग वायदा कारोबार को जारी रखने के पक्ष में हैं उनका भी मानना है कि मौजूदा व्यवस्थाओं के बीच कमोडिटी वायदा कारोबार की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।

भले ही पिछले पांच सालों में यह बाजार 50 गुना बढ़ गया है, उसके बावजूद भी इसमें किसानों की हिस्सेदारी नहीं बढ़ी है। साथ ही कारगर रूप से हेजिंग, कीमतों का निर्धारण और कीमतों को एक दायरे में रख पाने का काम भी नहीं हो पा रहा है। जिस तेजी से वायदा कारोबार बढ़ा है उस तेजी से वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) की आधारभूत संरचना और क्षमताओं का विकास नहीं किया गया है। साथ ही एक्सचेंजों द्वारा जो कॉन्ट्रैक्ट तैयार किया जाता है उससे कारोबारी कम और सट्टेबाज ज्यादा आकर्षित होते हैं। इस वजह से जरूरत है कि नियामकों को मजबूत बनाया जाए और वायदा कारोबार के विस्तार के लिए मंच उपलब्ध कराया जाए।

First Published : July 31, 2008 | 10:11 PM IST