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जब कोचिंग का है जबरदस्त धंधा तो आखिर क्यों पड़ेगा यह मंदा

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 3:40 AM IST

कॉरपोरेट जॉब और आसमान छूते ख्वाब वाली लाइफस्टाइल युवाओं को काफी आकर्षित कर रही है और इसी का नतीजा है कि कोचिंग संस्थानों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हो रही है।


ये कोचिंग संस्थान न केवल एक बिजनेस है बल्कि कई सहायक गतिविधियों की अर्थव्यवस्था को सहारा देने वाला एक मजबूत स्तंभ है। एक आकलन के मुताबिक पूरे शहर में 3500 कोचिंग संस्थान हैं जिसमें 2000 पंजीकृत हैं।

इन संस्थानों में मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी करने वाले दो लाख से ज्यादा छात्र आते हैं और इससे 50 करोड़ रुपये से ज्यादा का व्यापार प्रतिवर्ष होता है। इन खर्च में रहने और अन्य खर्चों को शामिल नहीं किया गया है। इन कोचिंग संस्थानों में 10,000 रुपये से लेकर 1.5 लाख रुपये तक की फीस ली जाती है। फीस की यह रकम कोर्स की प्रकृति और अवधि के आधार पर तय की जाती है।

कोचिंग में छात्रों की बढ़ रही तादाद की वजह से मकान का किराया और टिफिन बिजनेस भी परवान चढ़ रहा है। स्टेशनरी की दुकानों की तो चांदी ही हो गई है। ये दुकानें न सिर्फ स्टडी मेटेरियल उपलब्ध कराती हैं बल्कि सारी परीक्षाओं के आवेदन पत्र भी बेचती हैं और उन्हें गंतव्य केंद्रों तक पहुंचाने की सुविधाएं भी मुहैया कराती हैं। इसके अलावा नए छात्रों को ये दुकानदार भी मुफ्त में सलाह देते हैं तथा छात्रों को कोचिंग और पाठयक्रम के चयन में मदद करते हैं।

कोचिंग अर्थव्यवस्था के संदर्भ में काकादेव, शारदा नगर और गीतानगर को मक्का माना जाता है। कोचिंग के फलने फूलने से स्थानीय मकान मालिकों की तो चांदी हो गई है और वे बढ़ रहे मकान किराये से काफी खुश नजर आते हैं। ऐसे मकान जहां बिजली और पानी की मूलभूत सुविधाएं भी नदारद हैं उसका किराया भी 3000 से 7000 रुपये के बीच होता है। छात्र अपने रूम पार्टनर बनाकर इस रकम को समायोजित करते हैं। वे दो से पांच की संख्या में एक कमरे में रहते हैं।

नए लड़कों के सुनहले सपनों को जमीनी ख्वाब में तब्दील कर ये कोचिंग संस्थान फायदा कमाने का कोई भी मौका नहीं चूकते हैं। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की तैयारी करने वाला छात्र अश्विनी कु मार जो इस बार की मुख्य परीक्षा पास नहीं कर सके, ने बताया कि ये कोचिंग संस्थान केवल अच्छे छात्रों के लिए बेहतर होते हैं। छात्रों की सफलता में इन कोचिंग संस्थानों का योगदान मात्र 10 प्रतिशत होता है।

सर्वोदय नगर के दिल्ली पब्लिक स्कूल के प्राचार्य ने कहा कि वे उन छात्रों के लिए विद्यालय परिसर में अलग से कोचिंग की व्यवस्था करते हैं जो या तो पढ़ने में अपेक्षाकृत कमजोर हैं या कक्षा में किसी कारणवश अनुपस्थित रह जाते हैं।

First Published : June 4, 2008 | 9:02 PM IST