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सबप्राइम संकट से कब मिलेगा छुटकारा?

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 9:42 AM IST

अर्थव्यवस्था के जटिल सिद्धांतों में एक मिसाल आम तौर पर दी जाती है। वह मिसाल यह है कि लैटिन अमेरिका में कहीं कोई तितली अपने पंखों को फड़फड़ाए और उसकी वजह से हजारों मीलों दूर दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में जबरदस्त तूफान आ जाए।


दुनिया में जो मौजूदा संकट है, वह भी इसी तरह की मिसाल का एक मार्मिक और विस्तारित रूप है। जुलाई, 2007 में अमेरिकी वित्तीय बाजारों में छोटी दिक्कत के रूप में जो संकट उभरा, उसका खमियाजा आज एशियाई देशों की अर्थव्यवस्थाओं को आसमान छूती महंगाई के रूप में चुकाना पड़ रहा है।

मेरे ख्याल से अर्थशास्त्रियों ने पहले चरण में ही अनुमान लगाने में कुछ गलतियां कर दीं। मसलन अमेरिकी संकट का असर अर्थव्यवस्था के बड़े स्तर पर ही दिखेगा। इस तरह की सोच कुछ यूं लोगों के दिमाग में आई थी। मकानों की घटती कीमत की वजह से आम लोगों की संपति में कमी आएगी और उपभोक्ता मांग में भारी गिरावट आएगी। लोगों के कर्ज न चुका पाने की वजह से बैंक लोगों को कर्ज देना कम कर देंगे। इस कारण उपभोक्ता मांग और निवेश पर और भी ज्यादा असर पड़ेगा।

जैसे-जैसे इस आर्थिक संकट की वजह अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल घिरने लगेंगे, दुनिया की अर्थव्यवस्था की विकास की रफ्तार पर भी इसका असर पड़ेगा। ऐसा इसलिए क्योकि अमेरिका से होने वाला व्यापार और उसकी तरफ से होने वाले निवेश की वजह से ही विश्व की अर्थव्यवस्था अपनी रफ्तार पर कायम रह पाती है। यह वाकई काफी अच्छी सोच थी, जिसमें बस एक छोटी सी दिक्कत थी। अगर वैसा होता तो दुनिया भर में चीजों की कीमतें भी कम होतीं क्योंकि वैश्विक मांग तो कम होती जा रही थी। इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में लगी 150 डॉलर प्रति बैरल की आग यही बताती है कि उस सोच के साथ कोई बड़ी दिक्कत थी।

तो आखिर बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों की इस सोच में गड़बड़ हो कहां गई? क्या अमेरिका ने अपने वित्तीय बाजार के संकट की तरफ से ज्यादा समय तक आंखें मूंदी रखीं? लगता तो नहीं है। हालांकि, इस बात के काफी सबूत हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की विकास दर में पिछले छह महीने में जबरदस्त गिरावट आई है, लेकिन तकनीकी रूप से वह अब भी मंदी के मकड़जाल में नहीं फंसी है। वहां उपभोक्ताओं की खर्च में भारी गिरावट आई है और कॉर्पोरेट सेल्स भी गोते खा रही है। अमेरिकी प्रॉपर्टी बाजार तो किसी चमत्कार का इंतजार कर रहा है।

अमेरिका सचमुच भारी संकट के दौर से गुजर रहा है, लेकिन क्या उसकी समस्याओं ने बाकी की दुनिया को भी अपने जाल में जकड़ लिया है। यहीं वह सोच टूटकर बिखरने लगती है कि इस संकट का असर केवल बड़े स्तर पर ही पड़ेगा। दुनिया इस संकट के मकड़जाल में उतने बड़े स्तर और उतनी जल्दी नहीं आई, जिसकी उम्मीद कई लोगों ने की थी। मिसाल के तौर पर यूरोप इस आर्थिक तूफान में अब भी अपना झंडा थामे हुए है। वहीं एशिया पर मजबूती से खड़ा हुआ है। 

तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि दुनिया पर इस अमेरिकी संकट का असर नहीं हुआ है? क्या वह अमेरिकी विकास के इंजन से अलग हो चुकी है? इस बात पर अब भी लोग सोच-विचार रहे हैं। हो सकता है कि इस अमेरिका संकट का असर दुनिया पर थोड़े समय बाद पड़े यानी साल के अंत तक पड़े, जब दुनिया की अर्थव्यवस्था की रफ्तार काफी धीमी पड़ जाएगी। हालांकि, मेरे लिए तो यह एक मामूली मुद्दा या सवाल है। इससे भी बड़ी बात यह है कि अमेरिकी संकट का झटका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़े स्तर पर नहीं, बल्कि जोखिम उठाने की लोगों की ख्वाहिश और उनके निवेश स्थल में आए बदलावों से झलकेगा। इसलिए इस संकट के खत्म होने के संकेत पर भी आर्थिक आंकड़ों में नहीं, बल्कि परिसंपति बाजार के बदलावों में मिलेंगे। नहीं समझ में आया, मैं बताता हूं।

अमेरिकी आर्थिक संकट के शुरुआत के छह महीनों के बाद यानी इस साल की शुरुआत में ज्यादातर विश्लेषकों ने यह देख लिया था कि निवेशकों ने जोखिम से बचना शुरू कर दिया था और एक सुरक्षित की तलाश में वे लग गए थे। उन्होंने यह कह दिया था कि इसी आधार पर इस साल परिसंपत्तियों की खरीद निर्धारित होगी।  बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाएं जल्द ही उनकी नजर से उतर गईं। विश्लेषकों की भविष्यवाणी थी कि निवेशक अब पुराने सबसे सुरक्षित जगह यानी अमेरिकी सरकार के बॉन्ड्स की तरफ रुख करेंगे। इससे वहां मंदी के बावजूद डॉलर की सेहत में सुधार आएगा। हालांकि ऐसा हुआ नहीं।

डॉलर से ज्यादा उनका ध्यान खींचा दो नए परिसंपत्तियों ने। उन्होंने इसका इस्तेमाल डॉलर के खिलाफ हेज के तौर पर इस्तेमाल किया। पहले से ही अमेरिकी संकट से परेशान निवेशकों ने अब जिंसों, खास तौर पर कच्चे तेल, के वायदा कारोबार में इस्तेमाल शुरू कर दिया। साथ ही, उन्होंने यूरोपीय सरकारों के बॉन्डों में भी निवेश कर शुरू कर दिया। जैसे-जैसे अमेरिका से बुरी खबरें ज्यादा तेजी से आने लगीं, उन्होंने इस दोनों परिसंपत्तियों के बाजार में खरीद तेजी से शुरू कर दीं।

नतीजतन, जिंसों की कीमत और यूरो के मूल्य दोनों में इजाफा होने लगा। इसके साथ-साथ दूसरे प्रभाव भी दिखाई देने लगे। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से खेतों में अनाज की जगह बॉयो-फ्यूल की खेती होने लगी, जिसके कारण अनाजों की कीमतें आसमान छूने लगीं। इसके वजह से दुनिया भर में अनोखे तरह का आर्थिक संकट आया, जिसमें एक दूसरे के खिलाफ रहने वाले दो ट्रेंड साथ-साथ चल रहे हैं। अगर पारंपरिक तरीके से सोचें तो वैश्विक आर्थिक संकट की वजह से मंदी आती है, जो महंगाई के बढ़ने के साथ-साथ चलती है। इसी वजह से तो इस रावण पर काबू पाना इतना मुश्किल हो रहा है।

सेंट्रल बैंकों को यह तय करने में मुश्किल हो रही है कि मंदी या महंगाई, दोनों में से किसे पहले साधा जाए। क्या वे मंदी पर काबू पाने के लिए ब्याज दरों को कम करें या वे महंगाई पर काबू करने के लिए उन्हें बढ़ाएं?  इस संकट के अंत की शुरुआत तभी शुरू हो जाएगी, जब सेंट्रल बैंक इस दुविधा से पार पा लेंगे। जैसे यह संकट परिसंपत्तियों के बाजार से फैला था, उसी तरह इसका हल भी परिसंपत्तियां ही देंगी। डॉलर में फिर से निवेशकों की विश्वास बहाली की वजह से जिंसों की कीमत में भी कमी आएगी और यूरो का अवमूल्यन भी होगा।

ऐसा हुआ तो महंगाई का दबाव भी कम होता जाएगा। अब सेंट्रल बैंकों के पास एक ही लक्ष्य रह जाएगा, विकास दर को फिर से ट्रैक पर लाने का। तो कब होगा ऐसा? जैसे ही निवेशकों को यह अहसास हो जाएगा कि अमेरिकी बाजार अब अपने न्यूनतम स्तर पर आ गया है। निवेशकों की पसंद उसी समय से बदलनी शुरू हो जाएगी। ज्यादा इंतजार की जरूरत नहीं, वह घड़ी बस कुछ हफ्तों में ही आने वाली है।

First Published : July 7, 2008 | 11:23 PM IST