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शहर छोटा हो या बड़ा, कोचिंग का व्यापार भरा-पूरा

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 3:41 AM IST

भारत में ढीली-ढाली शिक्षा प्रणाली के कारण पैदा हुई कोचिंग संस्कृति असंगठित क्षेत्र की सबसे बड़ी इंडस्ट्री बन गई है। इस समय देश में कोचिंग इंडस्ट्री का कारोबार सात से आठ हजार क रोड़ रुपये के बीच होने का अनुमान है।


यही नहीं, यह इंडस्ट्री प्रति वर्ष 20 फीसदी की दर से विकास भी कर रही है। अगर दिल्ली की ही बात की जाए, तो यहां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थानों की तादाद लगभग 5,000 के आस पास है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीसीएस) की परीक्षा में चयनित एक छात्र कवीन्द्र ने बताया कि, ‘वैसे तो इस तरह की कोचिंग के एक बैच में 100 से 150 बच्चे रहते हैं।

साथ ही एक दिन में कम से कम चार से पांच बैचों को पढ़ाया जाता है। अगर हर बैच में कम से कम 100 छात्रों का ही औसत रखा जाए तो प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयारी करने वाले छात्रों की तादाद अकेले दिल्ली में ही करीबन 5 लाख पहुंच जाती है। खास बात यह है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने के लिए कोचिंग संस्थानों की शरण में आने वाले इन छात्रों में से सफल केवल एक फीसदी ही होते हैं।’

आंकड़ों पर गौर करें तो दिल्ली के सभी कोचिंग संस्थान प्रति सेमेस्टर फीस के तौर पर 10 अरब रुपये की कमाई करते है। यही नहीं, इन संस्थानों के लिए आने वाले छात्रों की वजह से कोचिंग संस्थानों के आस-पास के इलाकों में मकान किराए पर देने वालों के भी वारे-न्यारे रहते हैं। जानकारों का मानना है कि दिल्ली में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले कुल छात्रों में से 80 फीसदी  दूसरे शहरों के होते हैं।

इस हिसाब से अगर मान लिया जाए कि दिल्ली में लगभग 4 लाख छात्र किराये के मकानों और होस्टलों में रहते है तो ये छात्र प्रतिवर्ष लगभग 10 अरब रुपये मकान के किराये के तौर पर अदा करते हैं। इस बाबत कवीन्द्र का कहना है, ‘हकीकत यह है कि  कई कोचिंग संस्थान अच्छी खासी फीस लेने के बावजूद लाइब्रेरी और अन्य सुविधाएं प्रदान नहीं कर रहे हैं।

इसके अलावा ये कोचिंग संस्थान प्रत्येक सेमेस्टर के बाद अपनी फीस में 1 से 2 हजार रुपये बढ़ा देते हैं।’ सिविल सर्विसेज की तैयारी कराने वाली ध्येय कोचिंग के शिक्षक कुमार गौरव का कहना है कि हमारे यहां छात्रों को न केवल प्रतियोगी परीक्षा के तौर पर तैयार किया जाता है बल्कि उन्हें कैरियर परामर्श, लाइब्रेरी और अन्य सुविधाएं भी मुहैया कराई जाती है।

सरकारी तंत्र ने तोड़ी शिक्षा प्रणाली की टांग

भारत में कोचिंग इंडस्ट्री की उत्पति का कारण कमजोर शिक्षा प्रणाली और शिक्षा का बाजारीकरण है। शिक्षाविदों का मानना है कि हमारे यहां दी जा रही शिक्षा में तर्क  और नेतृत्व की जगह रटने पर जोर दिया जाता है। शहरों में ज्यादातर कोचिंग संस्थान असंगठित तौर पर चल रहे हैं।

शिक्षाविदों का मानना है कि सरकारी स्कूलों के खस्ता हाल होने के कारण प्राइवेट स्कूलों और कोचिंग की दुकानें आसानी से चल रही है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जब सरकार ने स्कूलों के क्रिया-कलापों पर नियंत्रण रखने के लिए किसी तरह की नियामक संस्था का गठन नहीं किया है तो फिर कोचिंग की बात तो छोड़ ही दी जाए।

शिक्षा प्रणाली में ढीले सरकारी तंत्र के कारण ही निजी संस्थाएं अपनी मनमानी में उतर आई हैं। यही कारण है कि जब छात्र प्रतियोगिता के माहौल में आता है तो उसे कोचिंगों की शरण में जाना पड़ता है। पत्रकार अनिल चमड़िया मानते हैं कि आज छात्र विषय की गहराई में जाए बिना देश के बेहतरीन शिक्षा संस्थानों में प्रवेश लेना चाहते हैं। इसलिए वे कोचिंगों की शरण में जाते हैं।

लेकिन वास्तविकता तो यह है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में वही छात्र सफल होते हैं जिनकी बुनियाद सफल रही होती है। इसलिए आज की शिक्षा प्रणाली में रटने की अपेक्षा छात्र में तर्क शक्ति और चीजों को समझने की शक्ति पैदा करने में जोर दिया जाना चाहिए। इससे प्रतियोगिता के माहौल में आने पर छात्र को कोंचिग की शरण में जाना नहीं पड़ेगा। दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के प्रोफेसर बी एल पंडित का कहना है कि कोचिंग इंस्टीटयूट एक ट्रेनिंग सेंटर की तरह होते है।

वे कभी भी स्कूल और कालेज की तरह आपकी बुनियाद को मजबूत नहीं कर सकते। पंडित का मानना है कि आज हमारी अर्थव्यवस्था विकसित हो रही है, हर मां-बाप अपने बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर और प्रशासनिक अधिकारी बना देखना चाहता है। इसलिए अपने बच्चे के भविष्य के लिए वे अपने बच्चे के लिए कोचिंग में निवेश करना उचित समझते हैं।

क्योंकि उनको लगता है कि ऐसा करने से वे अपेछित परिणाम प्राप्त कर सकते हैं जो वे अपने बच्चे से उसकी विद्यालय शिक्षा के दौरान प्राप्त नहीं कर पाए हैं। इस बाबत चमड़िया का मानना है कि कोचिंग से आप छात्र को तकनीकी रूप से तो तैयार कर सकते हैं, लेकिन वास्तविक विकास नहीं कर सकते।

कमजोर शिक्षा प्रणाली है कोचिंग इंडस्ट्री के पीछे

कोटा बन चुका है कोचिंग हब

राजस्थान का शहर कोटा पूरे देश में मेडिकल और इंजीनियरिंग की कोचिंग के लिए विख्यात है। इस शहर में मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी कराने वाले लगभग 250 कोचिंग संस्थान हैं। इनमें से 150 तो केवल इंजीनियरिंग की परीक्षा की तैयारी कराते हैं। यहां लगभग 1 लाख छात्र इंजीनियरिंग और मेडिकल की तैयारी कर रहे हैं।

कोटा में इंजीनियरिंग की तैयारी करने वाले एक छात्र अभिषेक श्रीवास्तव ने बताया कि इंजीनियरिंग की तैयारी के हिसाब से कोटा छात्रों की मनपंसद जगह बन गया है। जानकारों का मानना है कि कोटा के कोचिंग हब के तौर पर विकसित होने के बाद यहां कई अन्य उद्योगों को आश्रय मिल गया है। इनमें स्टेशनरी, कंप्यूटर उद्योग, साइबर कैफे प्रमुख है।

यही नहीं, स्थानीय लोग अब उन धंधों को अपना रहे हैं जो छात्रों की रुचि वाले हो। यही नहीं, कई ब्रांडेड कंपनियों ने यहां अपने शोरूम खोल दिए हैं। अनुमान के हिसाब से कोचिंग हब बनने के कारण कोटा में प्रतिमाह 40 करोड़ रुपये का कारोबार होता है। इसके अलावा छात्रों द्वारा एक वर्ष में लगभग 2.5 करोड़ रुपये कोचिंग फीस के तौर पर अदा किये जाते है।

First Published : June 4, 2008 | 9:07 PM IST