कांग्रेस के हालिया इतिहास में सैद्धांतिक रूप से 17 अक्टूबर का दिन अहम होगा जब पार्टी का नया अध्यक्ष चुनने के लिए चुनाव (अगर आवश्यक हो) आयोजित किया जाएगा। लेकिन एक और तारीख इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। जो लोग पार्टी में शीर्ष पद के लिए चुनाव लड़ना चाहते हैं, उनके पास उम्मीदवारों की सूची से अपना नाम वापस लेने के लिए 8 अक्टूबर तक का समय है।
अब देखना यह है कि पार्टी के असंतुष्ट 23 नेताओं के समूह में बचे लोगों में से कोई इस चुनावी मैदान में उतरेगा या नहीं। जी-23 के नाम से मशहूर हुए सदस्य पार्टी अध्यक्ष के चुनाव से पहले कांग्रेस के सभी निकायों के चुनाव कराना चाहते थे।
जी-23 के दो प्रमुख नेता पहले ही कांग्रेस छोड़ चुके हैं जिनमें पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और अब समाजवादी पार्टी के समर्थन से राज्यसभा सदस्य बने कपिल सिब्बल और पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद का नाम शामिल है जिन्होंने हाल ही में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को पांच पन्नों का एक पत्र देने के बाद पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। इस पत्र में पार्टी मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर हेराफेरी का आरोप लगाया गया था।
जी-23 के एक अन्य सदस्य आनंद शर्मा हैं जिन्होंने अपने गृह राज्य हिमाचल प्रदेश में पार्टी की संचालन समिति से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि उनके कांग्रेस में बने रहने के लिए मनाए जाने की संभावना है। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और प्रचार समिति के अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा, ‘उन्हें (शर्मा को) कुछ शिकायतें थीं, जिनका उन्होंने पार्टी आलाकमान को लिखे एक पत्र में जिक्र किया था। पार्टी नेतृत्व उनके पत्र पर विचार कर रहा है। मुझे यकीन है कि कुछ सौहार्दपूर्ण समाधान मिल जाएगा।’
यह पूछे जाने पर कि क्या शर्मा का पार्टी के साथ बने रहना या पार्टी छोड़ना कोई मायने रखता है, इस पर सुक्खू ने कहा, ‘यह मायने रखता है। पार्टी से हर कार्यकर्ता का बाहर निकलना मायने रखता है। यह सिर्फ चुनावी मुद्दा नहीं है। इससे पार्टी की भावना को ठेस पहुंची है।’ पार्टी के शीर्ष नेता अपने समर्थकों के साथ निकलते हैं और इस बात पर कोई स्पष्टता नहीं है कि संगठन को चलाने के लिए कितने पीछे रह जाएंगे।
पिछली बार कांग्रेस को 1996 में इतने बड़े संकट का सामना करना पड़ा था। पीवी नरसिंह राव की सरकार सत्ता से बाहर हो गई थी। राजीव गांधी की हत्या की वजह से पार्टी नेतृत्व शून्य वाली स्थिति में पहुंच गया था। सोनिया गांधी ने राव से नाराज रहने वाले नेताओं अर्जुन सिंह, शीला दीक्षित और अन्य की तरफ से नेतृत्व संभालने के दबाव का विरोध किया और इसके बाद सीताराम केसरी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया ।
लेकिन 1997 की सर्दियों में सोनिया गांधी ने अपना इरादा बदल लिया। वह दिसंबर 1997 में कलकत्ता में पार्टी के तत्कालीन पूर्ण अधिवेशन में शामिल हुईं और उन्होंने यह घोषणा की कि वह मार्च 1998 में होने वाले लोकसभा चुनाव में पार्टी के लिए प्रचार करेंगी। उन्होंने तमिलनाडु में अपनी पहली चुनावी रैली संबोधित की जहां राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी। आने वाले महीनों में, केसरी ने गांधी के प्रभाव को देखते हुए सार्वजनिक रूप से इसका स्वागत भी किया।
लेकिन फिर कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) ने 14 मार्च, 1998 को एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें केसरी को पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ने के लिए कहा गया। सोनिया गांधी की पदोन्नति के रास्ते में कोई चुनाव आड़े नहीं आया। हालांकि, वह न तो चुनौती से पीछे हटीं और न ही जिम्मेदारी से बचीं।
लेकिन शुरुआत में पार्टी के भीतर से ही उन्हें चुनौती मिली थी। 1999 में शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर सहित पार्टी के कई वरिष्ठ सदस्यों ने कहा था कि सोनिया का इतालवी मूल का होना एक समस्या है। बागी नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया और उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) का गठन किया। इन नेताओं की अनुपस्थिति में, बागडोर राजेश पायलट और जितेंद्र प्रसाद को सौंप दी गई।
सोनिया के नेतृत्व को चुनौती देने के अभियान के शुरू होने के तुरंत बाद 55 वर्षीय पायलट की एक कार दुर्घटना में मौत हो गई। लेकिन उस समय जितेंद्र प्रसाद ने अपना संघर्ष जारी रखा। नवंबर 2000 में जब अगले पार्टी अध्यक्ष के चुनाव के लिए चुनाव हुए तो प्रसाद को शर्मनाक हार का मुंह देखना पड़ा। पार्टी के 7,542 वोटों में से उन्हें केवल 94 वोट मिले। 2001 में उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन उन्होंने दावा किया कि चुनाव शुरू होने से पहले नतीजा तय हो गया था।
गुलाम नबी आजाद ने भी अब अपने पत्र में यही कहा है। उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस के चुने हुए प्रतिनिधियों को 24 अकबर रोड में बैठकर पार्टी कार्यालय चलाने वाली मंडली द्वारा तैयार सूचियों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया। किसी बूथ, ब्लॉक, जिले या राज्य में किसी भी स्थान पर मतदाता सूची प्रकाशित नहीं की गई थी और न ही नामांकन आमंत्रित किए गए, न जांच की गई और, मतदान केंद्र स्थापित किए गए और चुनाव आयोजित कर दिए गए। उन्होंने अपने इस्तीफे वाले पत्र में लिखा, ‘भारत की आजादी के लिए लड़ाई लड़ने वाली और उसे हासिल करने वाली पार्टी कांग्रेस जो राष्ट्रीय आंदोलन थी उसकी बरबादी के लिए कांग्रेस नेतृत्व पूरी तरह से जिम्मेदार है।’
जी-23 के एक प्रमुख सदस्य रहे महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण का कहना है कि वह चुनाव का स्वागत करते हैं। उन्होंने कहा, ‘दो साल पहले हमने कांग्रेस अध्यक्ष (सोनिया गांधी) को पत्र लिखकर आंतरिक लोकतंत्र की मांग की थी। इसलिए हम इस फैसले का स्वागत करते हैं। आंतरिक लोकतंत्र पार्टी के भीतर जीवंतता की निशानी है। पार्टी को लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है। आंतरिक चुनाव नहीं होने के कारण सभी स्तरों पर मनोनीत पदाधिकारी निर्णय ले रहे हैं।’ सवाल यह है कि क्या चुनाव होंगे? 8 अक्टूबर को इसका जवाब मिलेगा।