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क्यों हुआ ऐसा, हम तहंकींक ही करते रहे…

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 10:04 AM IST

महंगाई की मार और चुनावी मौसम। सरकार कोशिश कर रही है कि महंगाई को रोका जाए। रिजर्व बैंक के सीआरआर और रेपो दर बढ़ाए जाने के बाद भी यह नियंत्रण में नहीं आई।


अब सबके मन में यही सवाल कौंध रहा है कि क्या हम उच्च महंगाई दर और निम्न विकास दर की ओर बढ़ रहे हैं? रिजर्व बैंक के गवर्नर वाई बी रेड्डी कहते हैं कि भारत में कभी भी ऐसी स्थिति नहीं हुई है और ऐसा होना संभव भी नहीं है। लेकिन क्या जमीनी हकीकत यही बयान कर रही है? रिजर्व बैंक ने साल के शुरू में कहा था कि महंगाई दर 6 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी, पर आज यह 12 प्रतिशत के आंकड़े को छूने को बेताब है। इसकी मार हर क्षेत्र पर नजर आ रही है।

सरकार की नीतियां

बजट में किसानों के कर्ज माफ कर दिए गए। जब वित्त मंत्री से सवाल पूछा गया कि 71 हजार करोड़ रुपये किस मद से आएंगे, तो उन्होंने कहा कि हम विभिन्न माध्यमों से इसे जुटा लेंगे। कच्चे तेल के दाम 150 डॉलर प्रति बैरल के करीब है। तेल और उर्वरक कंपनियों के  घाटे की भरपाई करने के लिए बॉन्ड जारी कर दिए गए। सवाल यह है कि यह पैसा कहां से आएगा? इसका बजट में प्रावधान नहीं है। ऐसे में बजट घाटा बढ़ेगा। स्वाभाविक है कि इसकी भरपाई के लिए सरकार को आधारभूत ढांचे के विकास पर हो रहे खर्चों में कटौती करनी पड़ेगी और विकास प्रभावित होगा। 

रिजर्व बैंक की नीतियां

बाजार में धन का प्रवाह रोकने के लिए रिजर्व बैंक ने नकद सुरक्षित अनुपात (सीआरआर) में पिछले डेढ़ साल में करीब 65 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। रेपो रेट बढ़ाया है। इसका असर बैंकिंग क्षेत्र पर तो पड़ा ही है, उद्योगों की विस्तार योजनाएं भी इससे रुक जाएंगी।  लोग भी अपने घरेलू बजट को नियंत्रित करने के लिए खरीद में भी कटौती कर रहे हैं, जिसका सीधा असर उद्योग जगत पर पड़ रहा है। बैंक छोटे और लंबी अवधि के लिए पीएलआर में बढ़ोतरी कर चुके हैं।

पूंजी की ऊंची लागत उद्योग, निर्माण और अन्य आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती है। जब ब्याज की दर में इजाफा होता है, तो खपत में कमी आती है और इसके परिणामस्वरूप निवेश खर्च पर भी बुरा असर पड़ता है। इस तरह सकल मांग बुरी तरह से प्रभावित हो जाती है। वैसे भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि महंगाई को रोकने के लिए रिजर्व बैंक जो कदम उठाती है, उसका असर थोडे अंतराल के बाद होता है। हम मंदी को रोकने के लिए विभिन्न तरीके अपनाते रहे लेकिन बीमारी बढ़ती ही गई। अकबर इलाहाबादी ने शायद इसी हालात पर लिखा था-

हादिसे अपने तरीकों से गुजरते ही रहे,
क्यों हुआ ऐसा, हम तहंकींक करते ही रहे।

First Published : July 9, 2008 | 11:30 PM IST