Categories: लेख

रैनबैक्सी के सौदे पर क्यों पसरा है इतना सन्नाटा?

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 8:43 AM IST

जापानी दवा कंपनी दाइची सांक्यो को हिंदुस्तान की सबसे बड़ी दवा कंपनी, रैनबैक्सी खरीदने की घोषणा किए हुए भी आज दो हफ्तों से ज्यादा वक्त बीत चुका है।


लेकिन इस बार में राजनैतिक दलों और ट्रेड यूनियन नेताओं ने हैरतंगेज तरीके से इस मामले को अनदेखा किया है। कांग्रेस और उसके नेताओं से इस मामले में लोगों को ज्यादा उम्मीद थी भी नहीं। दरअसल, वे पहले से ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से बुरी तरीके से घिरे हुए हैं।

उनके सामने महंगाई के रावण को साधने, भारत-अमेरिकी परमाणु करार को अमली जामा पहनाने और अपनी सरकार को बचाए रखने जैसी काफी बड़ी समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। हालांकि, दिक्कत भाजपा और वामपंथियों के कैंप में इस मामले में फैले सन्नाटे से हो रही है। इसे लेकर सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञ और पुरोधा भारत के विरोधी दलों के नेताओं की समझ पर हर तरह के सवाल खड़े कर रहे हैं।

इस मुद्दे पर लालकृष्ण आडवाणी को छोड़ दें तो न तो भाजपा और न ही वामदलों के किसी बड़े नेता ने उस सौदे पर किसी तरह का सवालिया निशान खड़ा किया, जिसकी वजह से एक जापानी कंपनी ने भारत की सबसे बड़ी दवा कंपनी का मालिकाना हक अपनी मुट्ठी में कर लिया था। आडवाणी ने यह कहा था कि उन्हें इस सौदे पर काफी दुख है। लेकिन क्या यह दुख 1990-91 के आर्थिक संकट की तरह का है, जब मुसीबत के वक्त विदेशों में बसे भारतीयों ने हिंदुस्तान बैंकों से पैसे निकालने शुरू कर दिए थे?

इस सौदे पर किसी तरह का सवाल नहीं खडा करने को भारतीय नेताओं की परिपक्वता की निशानी मानी गई। अपनी ‘खुली सोच’ और वैश्वीकरण (ग्लोबलाइजेशन) को स्वीकार करने की वजह से उनकी काफी पीठ भी ठोकी गई। जहां एक तरफ भारतीय कंपनियां तेजी से दुनिया भर की कंपनियों पर अपने झंडे गाड़ रही है, तो हमें देसी कंपनियों के विदेशी कंपनियों द्वारा किए गए अधिग्रहण के लिए तैयार रहना चाहिए। यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

भारतीय कंपनियों द्वारा दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों को खरीदे जाने की तारीफ करना और विदेशी कंपनियों द्वारा भारतीय कंपनियों को खरीदे जाने की निंदा करना गलत, अनैतिक और शर्मनाक होगा। इस ढोंग को किसी भी तरीके से सही नहीं ठहराया जा सकता है। हालांकि, विदेशों में ऐसा बिलकुल भी नहीं होता है। विकसित देशों के राजनेता तो अपने मुल्कों की बड़ी कंपनियों के विदेशी कंपनियों द्वारा अधिग्रहण पर अच्छा खासा बवाल मचा देते हैं। उन्हें लगता है कि उनके मुल्क की कंपनियां उन्हीं के मुल्क की जायदाद है। इसलिए वे उनके अधिग्रहण की किसी भी कोशिश का पुरजोर विरोध करते हैं।

फ्रांस और अमेरिकी राजनेता तो अपने मुल्क की किसी कंपनी के विदेशी अधिग्रहण के खिलाफ खुलकर बोलते हैं। साथ ही, उन्होंने अपने वतन से भारत जैसे विकासशील देशों में नौकरियों को भेजे जाने के खिलाफ भी अपनी बात खुलकर रखी है। उन्हें कतई पसंद नहीं है कि उनके देश की नौकरियों को विकासशील देशों में भेजा जाए। तो क्या इसका मतलब यह है कि भारतीय राजनेता अब खास तौर पर आर्थिक नीतियों के मामले में विकसित दुनिया के नेताओं की तुलना में ज्यादा परिपक्व हो चुके हैं और वे दिल से ग्लोबलाइजेशन को अपना चुके हैं।

ऐसे किसी फैसले पर पहुंच जाना काफी आसान है, लेकिन अगर भारतीय राजनेताओं की सोच पर गहरी नजर डालें तो एक बिल्कुल ही अलग तस्वीर नजर आती है।  इस मामले के केंद्र में भी वही जान-पहचानी बात है जो किसी भी दूसरे लोकतंत्र के साथ होती है। वह बात यह है कि राजनेता हमेशा अपने वोटरों को खुश रखना चाहते हैं। भारत में राजनेता उस कदम के बारे में ज्यादा सोचते हैं, जिससे खेतीबाड़ी पर बड़ा असर पड़ता हो। दरअसल, इसकी वजह यह है कि यहां दो तिहाई से ज्यादा आबादी आज की तारीख में भी अपना जीवन चलाने के लिए खेतीबाड़ी पर निर्भर है।

इसी तरह, अमेरिका में भी ऑउटसोर्सिंग की वजह से काफी हंगामा मचा हुआ है। वहां के राजनेताओं को इस बात की चिंता इसलिए है क्योंकि इसकी वजह से उनके वोटरों की नौकरी जा रही है। कोई राजनेता अपने वोट नहीं गंवाना चाहता और इसकी उससे उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए। इसलिए रैनबैक्सी के सौदे पर भारतीय राजनेताओं के बीच फैली चुप्पी को उनकी वैश्वीकरण के बारे में बढ़ती समझ के तौर कतई नहीं देखा जाना चाहिए। उनके बीच वैश्वीकरण की समझ बढ़ रही है या नहीं, यह मायने नहीं रखता।

साथ ही, यह एक बिलकुल जुदा मामला है। उनकी रैनबैक्सी के सौदे पर चुप्पी की असल वजह यह है कि इससे उनके वोटरों पर असर नहीं पड़ा है। किसानों की तो छोड़ ही दीजिए, इस सौदे को लेकर तो शहरी वोटर को भी ज्यादा मतलब नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस सौदे का उल्टा असर उन पर नहीं पड़ेगा। लेकिन कामगारों के हिमायती वामदलों का क्या? उन्हें भी इस सौदे की नहीं पड़ी है। इस सौदे में तो एक प्राइवेट कंपनी की मालिक की कुर्सी पर बैठा हुआ शख्स भर बदला है।

लेकिन अगर रैनबैक्सी एक सरकारी कंपनी होती और उनके ज्यादातर कर्मचारी वामदलों से संबंधित किसी ट्रेड यूनियन के सदस्य होते तो वामपंथी इस मसले को काफी तूल देते। लेकिन ऐसी कोई बात भी नहीं है। इसलिए दाइची के लिए रैनबैक्सी के कर्मचारियों के सरोकारों को नजरअंदाज कर पाना काफी आसान हो जाएगा। यह एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर वामदल काफी हो-हल्ला मचाते रहे हैं। इसी मुद्दे को हथियार बनाकर तो वामदल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में विनिवेश का  इतना कड़ा विरोध कर रहे हैं।

यह कहना कि भारतीय राजनेताओं के बीच ग्लोबलाइजेशन या वैश्वीकरण की प्रक्रिया की अच्छी समझ विकसित हो चुकी है, कतई सही नहीं होगा। वे इस समझ की वजह रैनबैक्सी सौदे पर चुप नहीं हैं। दरअसल, इस सौदे का राजनेताओं के वोटबैंक पर कोई असर नहीं पड़ने वाला, ये राजनेता इसी वजह से चुप हैं।

First Published : July 1, 2008 | 10:00 PM IST