भारत के गंभीरता के साथ वैश्विक दुनिया में कदम रखते ही आर्थिक बहस ने ऐसा स्वरूप ले लिया जो अंतरराष्ट्रीय आयामों से जुड़ा है।
कारोबारी चक्र और महंगाई से कैसे निपटा जाए जैसे विषयों पर चर्चाएं की जाने लगीं। यह बदलाव स्वागत योग्य भी है क्योंकि कुछ साल पहले तक नीतियां सिर्फ इस बात को ध्यान में रखकर तैयार की जाती थीं कि देश में मुद्रा प्रवाह को नियंत्रण में रखा जाए।
आर्थिक बहस का मुद्दा तो बदला है पर इसका साथ देने के लिए गहन विश्लेषणों का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था में जरूरत से ज्यादा तेजी यानी ओवरहीटिंग की चर्चा की जा रही है और इसे बड़ी आसानी से समझाया भी जा सकता है। अर्थव्यवस्था में ओवरहीटिंग का मतलब है कि आर्थिक विकास दर का ऐसे उच्च दर पर पहुंचना जहां इसका आगे तक बना रहना मुमकिन नहीं हो।
अगर ओवरहीटिंग जारी रहती है तो इससे महंगाई पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसको देखते हुए जरूरी है कि अर्थव्यवस्था में अत्यधिक तेजी को शुरुआती दौर में ही रोका जाए और इसके लिए ठोस कदम उठाए जाएं ताकि महंगाई से ठीक तरीके से निपटा जा सके।
इन दोनों के बीच दो संबंध हैं और दोनों ही तर्कसंगत हैं: पहला तो यह कि विश्लेषणों के जरिए यह स्पष्ट किया जाए कि देश की अर्थव्यवस्था अत्यधिक तेजी के दौर से गुजर रही है और दूसरा यह कि ओवरहीटिंग की मात्रा और अत्यधिक महंगाई की मात्रा के बीच क्या संबंध है, इसे विश्लेषक सामने ला सकें। इसे पूरा करने की कवायद के दौरान हमें बड़ी सच्चाई के साथ यह मानना होगा कि इन दोनों के बीच एकरूपता तो होनी ही है।
अगर पूरी वफादारी के साथ इसे पता करने की कोशिश की जाए और तब यह परिणाम सामने निकलकर आए कि अर्थव्यवस्था अपनी क्षमता से कम के साथ विकास कर रही है तो यह कहना गलत नहीं होगा कि मौद्रिक नीतियां कमजोर हैं। वर्ष 1980 से 2002 के बीच यानी 23 सालों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था हर साल औसतन 5.6 फीसदी की दर से बढ़ी है।
साल 2002 के बाद अगले 6 सालों के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) विकास दर में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है और यह ऊंची छलांग लगा कर 8.5 फीसदी की दर पर पहुंच गई है। क्या अचानक से 3 फीसदी की विकास ओवरहीटिंग का संकेत नहीं है? अगर इस दौरान बचत और निवेश भी उसी हिसाब से नहीं बढ़ा है तो निश्चित तौर पर यह ओवरहीटिंग का संकेत है।
अगर इसी नियम को माना जाए तब तो ओवरहीटिंग के कोई संकेत नहीं हैं क्योंकि इस अवधि में बचत और निवेश दर दोनों में ही 10 फीसदी अंकों की बढ़ोतरी हुई है। यह औसतन 23-24 फीसदी से बढ़कर औसतन 33-34 फीसदी पर पहुंच गई है। विकास दर के बढ़ने के साथ ही आश्चर्यजनक रूप से रोजगार के अवसर भी सालाना 1.8 से 2.8 फीसदी की दर से बढ़े हैं।
अगर ऐसा मान लें कि उत्पादकता में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है (हालांकि ऐसा होना काफी मुश्किल है), तो पूंजी और श्रम के विकास से जीडीपी विकास में सालाना अतिरिक्त 3 फीसदी जुड़ने का अनुमान है। इसका मतलब है कि सालाना 8.6 फीसदी की विकास दर- पिछले 6 सालों के दौरान वास्तविक विकास दर (इसमें 2008-09 की अनुमानित 8 फीसदी की विकास दर को भी शामिल किया गया है) 8.5 फीसदी रही है।
यानी कि पिछले 6 सालों में ओवरहीटिंग का कोई संकेत नहीं मिलता है, पर फिर भी नीतिनिर्माता और निवेश बैंकर्स लगातार इस बात को लेकर बहस करते रहे हैं कि जीडीपी विकास ओवरहीटिंग का परिणाम है और इसके साइड इफेक्ट यानी महंगाई को नियंत्रित करने की जरुरत है।
हाल ही में जारी किए गए जीडीपी के आंकड़ों से मुद्रास्फीति के आंकड़ों का पता चलता है जो 7.6 फीसदी है जो पिछले साल की समान अवधि में 6.1 फीसदी है। क्या यह ओवरहीटिंग का संकेत है या फिर आयातित महंगाई का संकेत है। अगर आप महंगाई को रोकने के लिए भेड़चाल पर नहीं चलते हैं तो भी इससे आपको कोई नुकसान नहीं होने वाला है।
आज तक किसी भविष्यवक्ता, अर्थशास्त्री या फिर बैंकर की नौकरी इस वजह से नहीं गई है क्योंकि उसने दूसरों से अलग हटकर कोई कदम उठाया हो। इस अखबार के 3 सितंबर के संपादकीय में कहा गया था, ‘जब तक महंगाई दर उस सीमा के ऊपर है जहां तक हम सहज महसूस करते हैं तब तक पॉलिसी दरों को बढ़ाते रहने में कोई दिक्कत नहीं है’।
विशेषज्ञों ने जो तर्क दिए हैं हम उन पर निगाह डालने की कोशिश करते हैं: अर्थव्यवस्था में जरूरत से ज्यादा तेजी है, जबकि इसके कोई स्पष्ट संकेत हमें नहीं मिलते (इस बात से हालांकि इनकार नहीं किया जा सकता कि अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में ओवरहीटिंग है पर कुछ क्षेत्रों में विकास अब भी कमतर है)।
अगर अर्थव्यवस्था में अत्यधिक तेजी नहीं है तो यह कहना भी गलत होगा कि उम्मीद से अधिक आर्थिक विकास की वजह से महंगाई का ग्राफ ऊपर चढ़ा है। हम सभी मानते हैं कि महंगाई बढ़ी है और कुछ समझदार विश्लेषक मानते हैं कि यह महंगाई आयातित है, खासतौर पर ईंधन की कीमतें बढ़ने के कारण ऐसा हुआ है।
हालांकि कुछ लोगों का यह तर्क हो सकता है कि कच्चे तेल की कीमतों में 30 फीसदी (40 डॉलर) की गिरावट होने से महंगाई में कोई खास कमी नहीं आएगी क्योंकि जब कीमतें बढ़ी थीं तो भी उसका सारा बोझ हम पर नहीं डाला गया था। कच्चे तेल की कीमतों में प्रति बैरल 10 डॉलर की कमी आने से राजकोषीय घाटा जीडीपी का 0.5 फीसदी तक कम होता है।
जिंसों की कीमतें महंगाई के कुछ आंकड़े सच्चाई बयान करते हैं। एक समय जब ऊर्जा, धातु और कृषि की कीमतें चोटी पर थीं तब से अब तक उनमें करीब 25 से 30 फीसदी की गिरावट आई है (दो महीने पहले प्राकृतिक गैस की कीमत जितनी थी आज उसकी आधी रह गई है)।
अधिक खरीद की वजह से कमोडिटी की कीमतों में जो बढ़ोतरी देखने को मिली थी, उसके कम होने से तय है कि कुछ समय में आयातित महंगाई भी कम होगी। देश के साथ साथ विदेशी विश्लेषकों के पास भी विश्लेषण के जो मामले आते हैं उनके पीछे वे यह तर्क देते हैं: महंगाई बढ़ने का कारण ओवरहीटिंग है।
जब तक महंगाई का आंकड़ा घटकर 5 फीसदी तक के सहज स्तर पर नहीं पहुंच जाता तब तक ब्याज दरों को बढ़ाया जाना चाहिए। हालांकि सच्चाई तो यह है कि भारत में ब्याज दरें पहले से ही काफी हैं।
वित्त वर्ष 2008-09 की पहली तिमाही में जीडीपी डिफ्लेटर 7.6 फीसदी के करीब था और रेपो दर 9 फीसदी के करीब। वास्तविक दर 1.4 फीसदी थी। देश में वास्तविक दरें सबसे अधिक हैं जबकि कीमतों को काबू में रखने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।