Categories: लेख

क्या पिघल पाएगी दोहा की बर्फ

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 12:42 PM IST

जिनेवा में विश्व व्यापार संगठन के दोहा दौर के बारे में चल रही मंत्रियों की वार्ता में जबरदस्त बहस होने की पूरी संभावना दिखाई दे रही है। हालांकि, इससे किसी नतीजे की उम्मीद किसी को नहीं है।


संगठन के प्रमुख सदस्य मुल्कों के वाणिज्य मंत्रियों को इस अहम वार्ता से पहले एक अनौपचारिक बातचीत के लिए बुलाया गया था। इसमें कृषि और गैर कृषि बाजार में पहुंच देने जैसे अहम मुद्दों के बारे में नया मसौदा पेश किया गया। लेकिन इस मुद्दे पर किसी तरह की प्रगति के कोई निशान नहीं दिखे। 

इस मसौदे के बारे में विश्व व्यापार संगठन का सचिवालय मई से ही यह दावा करता आ रहा था कि यह पहले के प्रस्तावों से काफी बेहतर है। फिर भी विकासशील मुल्कों को यह मसौदा नहीं भाया। इसकी वजह है इसमंक कई नए प्रस्ताव, जिनमें विकासशील देशों का कुछेक खास उत्पादों पर आयात शुल्क में छूट देने के खिलाफ लाया गया प्रस्ताव भी है। दूसरी तरफ, इसमें विकसित देशों को अपने किसानों को दी जा रही मोटी-ताजी सब्सिडी में किसी तरह की कटौती करने के लिए नहीं कहा जा रहा है।

हकीकत तो यह है कि अमेरिका ने अभी हाल ही में एक ऐसा कानून पास किया, जिससे वहां किसानों की दी जा रही सब्सिडी में मोटा इजाफा हो जाएगा। वैसे, विकासशील मुल्कों के विरोध का असल मुद्दा कुछेक खास उत्पादों पर आयात शुल्क में छूट देने के खिलाफ लाया गया प्रस्ताव ही है। इससे इन देशों को कुछ खास संवेदनशील उत्पादों पर आयात शुल्क में कटौती करने का अधिकार नहीं रह जाएगा। भारत समेत सभी विकासशील देशों को लगता है कि इस कदम से वे अपने छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योगों का संरक्षण नहीं कर पाएंगे।

इससे दोहा दौर में संगठन के सभी सदस्यों की वह प्रतिज्ञा पूरी नहीं हो पाएगी, जिसके मुताबिक हर मुल्क को कमाई करने और विकास की राह पर आगे बढ़ने का हक है। साथ ही, यह मसौदा विकसित देशों की तरफ भी काफी हद तक झुका हुआ है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस मसौदे में विकासशील देशों के मुकाबले विकसित देशों को ज्यादा सहूलियतें दी गई हैं। हमारे लिए इस मसौदे का विरोध यह केवल हमारे छोटे और मध्यम उद्योगों को बचाने का रास्ता नहीं है, जिससे लाखों परिवारों का चूल्हा जलता है। इसके साथ-साथ यह कृषि और फल, सब्जी, डेयरी उत्पाद और चीनी जैसे कृषि आधारित निर्यात के लिए भी जरूरी है।

यह कदम हमारे सेवा सेक्टर के हितों के संरक्षण के लिए भी जरूरी है, जिसे विकसित देशों से खूब सारे ऑफर मिल रहे हैं। हालांकि, इस बात को अमेरिका और विकसित देशों को पचाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। यह सारी बातें उस वक्त भारत के दिमाग में रही ही होंगी, जब उसे अमेरिका और दूसरे आसामियों ने बड़े मुद्दों पर सहमति के लिए बुलाया था।

हालांकि, शुरू में ब्राजील ने विकसित देशों का दामन थाम लिया था, लेकिन भारत और चीन के कड़े रवैये के वजह से उसे वापस आना पड़ा। हालांकि कैसे तस्वीर बदलेगी, यह तो इस वार्ता के शुरू होने बाद ही पता चलेगा। वैसे, तस्वीर का बदलना एक नहीं, बल्कि कई मुद्दों पर निर्भर होगा। इसमें से एक, दोहा दौर की वार्ता को बचाने की भावना भी हो सकती है। आखिरकार वार्ताकार 2006 का वह दौर थोड़े ही भूले होंगे, जब दोहा दौर पर पूरे छह महीने के लिए सन्नाटा छा गया था।

First Published : July 21, 2008 | 10:02 PM IST