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रिजर्व बैंक के मुद्रा आपूर्ति रोकने के कदम से क्या रुक पाएगी महंगाई

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 7:42 AM IST

काबू में आएगी महंगाई
धर्मकीर्ति जोशी, निदेशक और प्रमुख अर्थशास्त्री, क्रिसिल


वैसे तो मुद्रा आपूर्ति का महंगाई से सीधा ताल्लुक होता है। जब मुद्रा आपूर्ति तेजी से बढ़ती है, तो नकदी प्रवाह में अधिकता आ जाती है।

पिछले तीन-चार सालों में भारतीय रिजर्व बैंक मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए काफी कोशिशें कर रहा है। अगर महंगाई की पड़ताल काफी सूक्ष्म तरीके से की जाए, तो एक बात स्पष्ट तौर पर उभर कर आती है कि इसका मुख्य कारण आपूर्ति में कमी है। अगर मुद्रा आपूर्ति कम होगी, तो ब्याज दर बढ़ेगी।

आज हम देख रहे हैं कि पेट्रोल, डीजल, गैस, इस्पात, सामान्य तौर पर हर कच्चा माल महंगा होता जा रहा है। अगर उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं की ही बात करें, तो इसकी कीमतें काफी बढ़ रही है। तेल के दाम बढ़ने से आवागमन खर्च में भी बढ़ोतरी हो रही है। इससे लगभग हर सामग्री पर महंगाई का असर देखने को मिल रहा है। अर्थव्यवस्था में जब इस तरह की स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो द्वितीय चरण प्रभाव काम करना शुरु करता है।

अभी भारतीय रिजर्व बैंक जिस प्रकार के भी कदम उठा रही है, उससे मांग कम होगी। अगर मांग कम होगी, तो स्वत: द्वितीय चरणीय प्रभाव से बचा जा सकता है। मुद्रास्फीति का असर जल्दी कम होने वाला नहीं होता है। एक बात सही है कि अगर उच्च विकास दर होगी तो मुद्रास्फीति भी ज्यादा होगी। मांग को कम करने के लिए रिजर्व बैंक के कदम से विकास दर की प्रक्रिया धीमी जरुर होगी, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है।

लेकिन अभी वक्त की मांग है कि मुद्रास्फीति की दर को नियंत्रित किया जाए। इसे नियंत्रित करने के मौद्रिक उपायों पर अगर गौर करें, तो रिजर्व बैंक द्वारा उठाए जा रहे कदम प्रासंगिक भी लगते हैं। इसके अलावा रिजर्व बैंक और कर भी क्या सकती है? वैसे रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति का असर तुरंत नहीं दिखता है। इसमें छह महीने या उससे ज्यादा का वक्त लग जाता है।

अगर रिजर्व बैंक के हाल के पिछले कदम को देखा जाए जिसके तहत सीआरआर और रेपो रेट में वृद्धि की गई थी, उसका त्वरित प्रभाव भले ही नजर न आए, लेकिन हाउसिंग क्षेत्र और रियल सेक्टर में बढ़ रही महंगाई को अंकुश लगाने में आंशिक सफलता तो जरुर मिल पाई है। अगर महंगाई की दर को जल्द से जल्द नियंत्रित नही किया गया, तो रिजर्व बैंक के पास कोई चारा नहीं बचेगा।

रिजर्व बैंक अभी की महंगाई दर 11.05 प्रतिशत से ज्यादा चिंतित नही है। इसके हर कदम के पीछे उद्देश्य होता है कि भविष्य में महंगाई को खतरनाक स्तर पर पहुंचने से रोका जाए। अब अगर यह बात करें कि महंगाई की बेतहाशा बढ़ोतरी को रोकने के लिए सरकार को क्या करना चाहिए। अभी मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के सरकारी उपायों पर गौर करें तो यह प्रतीत होता है कि ज्यों ज्यों दवा की मर्ज बढ़ता ही गया।

लिहाजा सरकार ने इस दिशा में कदम भी उठाए, लेकिन उसका कोई ज्यादा असर होता नहीं दिख रहा है। सरकार ने सीमा शुल्क और अन्य कर संरचनाओं में बदलाव कर इसे कम किया था। खाद्य तेल की कीमतों में इस कदम से पहले कमी भी आई थी, लेकिन इसके दाम बाद में फिर बढ़ गए। महंगाई के दानव को खत्म करने के लिए सरकार का हर तीर अपना निशाना चूकता गया और महंगाई अपना विकराल रुप धारण करती गई।

महंगाई की दरों में बेतहाशा में वृद्धि होने के कारण यह भी कयास लगाने शुरु कर दिए गए कि कहीं भारत आर्थिक मंदी की ओर अग्रसर तो नहीं है। इस तरह इस पर नियंत्रण लगाने के लिए तरकश के हर तीर निकाले गए और उसी में से एक रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति है। इस तरह हम कह सकते हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक ने मुद्रा आपूर्ति के लिए जो भी कदम उठा रही है, वह प्रासंगिक भी है और जरूरी भी।
(कुमार नरोत्तम से बातचीत पर आधारित)

विकास को धक्का लगेगा
एम. डी. माल्या, प्रबंध निदेशक, बैंक आफ बड़ौदा

भारतीय रिजर्व बैंक ने महंगाई रोकने के लिए एक बार फिर से रेपो दर और सीआरआर में बढ़ोतरी की है। रेपो दर 8 फीसदी से बढ़ाकर 8.50 फीसदी और नकद सुरक्षित अनुपात मौजूदा 8.25 फीसदी से बढ़ाकर दो चरणों में 8.75 फीसदी करने की घोषणा की है।

आरबीआई की इस घोषणा को मानने के अलावा बैंकों के पास कोई और चारा भी नहीं है। इन बढ़ी हुई दरों से बैंकिंग क्षेत्र के विकास में एक बहुत बड़ा धक्का जरुर लगने वाला है क्योकि पहले से ही देश में रेपो दर और सीआरआर की दर कम नहीं थी। सीआरआर में 0.50 फीसदी की बढ़ोतरी किये जाने से अकेले बैंक ऑफ बडाैदा को 650 करोड़ रुपये रिजर्व बैंक के पास बगैर किसी ब्याज के रखना पड़ेगा।

अगर पूरे बैंकिंग क्षेत्र की बात करें तो इस निर्णय के कार्यान्वयन से देश में बैंकिंग व्यवस्था से करीब 18,500 करोड़ रुपये आरबीआई के पास चले जाएंगे। इससे महंगाई पर काबू करने में सरकार कुछ हद तक सफल भी हो सकती है, क्योकि इससे देश में मुद्रा प्रसार में कमी जरुर आएगी। पर इसके दूसरे पहलुओं पर भी सरकार और रिजर्व बैंक को गौर करना चाहिए। पिछले एक साल में सीआरआर में 1.25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

अगर दो साल में देखा जाए तो सीआरआर में 3.75 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। अप्रैल 2006 में सीआरआर की दर पांच फीसदी थी और तब से सरकार के महंगाई में लगाम लगाने की कोशिश में साथ देते हुए आरबीआई ने इस बढ़ाकर 8.75 फीसदी तक पहुंचा दिया है। जिससे बैंको की एक बहुत बडी रकम आरबीआई के पास जमा हो चुकी है।

इन बड़ी हुई दरों के कारण ब्याज दरों में बढ़ोतरी तो करनी ही पड़ेगी, लेकिन कितनी और कब इस पर बैंकिंग क्षेत्र वेट ऐंड वॉच की रणनीति अपना रहा है। इसका निर्णय दूसरे बैंकों के साथ होने वाली बैठक और बढ़ी हुई दरों का कितना फर्क आने वाला है इसकी पूरा-पूरा आकलन करने के बाद किया जाएगा। स्वाभाविक है कि ब्याज दरों के बढ़ने से उद्योग जगत पर इसका प्रभाव पड़ेगा ही।

बैंक इन दरों से निपटने के लिए अपने प्राइम लेंडिग रेट (पीएलआर) में बढ़ोतरी करने को सोच रहे हैं जो इस समय 12.75 फीसदी है, पर यह दर कितनी होगी इसके लिए थोड़ा सा इंतजार करना होगा।
(सुशील मिश्र से बातचीत पर आधारित)

First Published : June 25, 2008 | 10:59 PM IST