अब यूपीए सरकार वामदलों की दया पर आश्रित नहीं है। इस वजह से आशावादियों को उम्मीद है कि मनमोहन सिंह आर्थिक सुधारों की रुकी हुए गाड़ी को तेजी से आगे बढ़ाएंगे।
लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या उनकी उम्मीद पूरी हो पाएगी? अगर संसद में लटके हुए विधेयकों पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि सरकार के पास काम की कमी कतई नहीं है। अब पेंशन फंड रेगुलेटररी और विकास प्राधिकरण विधेयकों को ही ले लीजिए।
अगर ये दोनों विधेयक पास हो गए तो पेंशन फंड के कारोबार पर से कर्मचारी भविष्य निधि संगठन का एकाधिकार खत्म हो जाएगा। ये दोनों बिल पिछले तीन साल से लटके पड़े थे क्योंकि वामदल इनके सख्त खिलाफ थे। इस तरह का एक विधेयक है, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बिल। इसके पास हो जाने से स्टेट बैंक में सरकार की हिस्सेदारी 55 फीसदी से घटकर 51 फीसदी रह जाएगी।
इस तरह रिटेल चेन कंपनियों में विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति देने वाले एक विधेयक के भी जल्द ही पास होने की उम्मीद है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह देसी रिटेल सेक्टर में विदेशी कंपनियों को धीरे-धीरे लाने का वह तरीका है, जो कांग्रेस को सही लगता है। ऐसे कई विधेयक लटके पड़े हैं, इसलिए मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों की अटकी गाड़ी को रफ्तार देने के पूरे होंगे।
अब तो साफ दिखने लगा है कि सरकार टेलीकॉम और बीमा जैसे सेक्टर में विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाने को बेताब है। हालांकि शेयर बाजार का मूड कुछ अच्छा नहीं चल रहा है, फिर भी सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियों और बैंकों के शेयरों को बाजार में उतारने की जुगत में है। एक वाक्य में यही मौका है यूपीए सरकार के पास अपने सुधारवादी रवैये को दिखाने का। सरकार के पास यही मौका है, जब वह जनता को यह दिखा सकती है कि उसकी झोली में कामयाबियों के नाम पर भारत-अमेरिकी परमाणु करार से ज्यादा भी कुछ है।
अगर सरकार इस एक साल में सारे लटक हुए विधेयकों को पास करवा पाने में कामयाब हो जाती है, तो यह साफ हो जाएगा कि वामदलों ने चार साल तक आर्थिक सुधारों की राह में रोड़े अटकाए रखे। लेकिन अगर तरक्की की रफ्तार धीमी ही रही तो साबित हो जाएगा कि दिक्कत वामदलों के साथ नहीं, बल्कि सरकार यानी कांग्रेस के साथ ही है। इस बाबत यह याद रखें कि नेवली लिग्नाइट कॉरपोरेशन का आईपीओ भी रूका पड़ा है क्योंकि डीएमके इसके खिलाफ है।
अब जब इन विधेयकों को पास करने की बात चल रही है, तो संसदीय कार्य के लिए मौजूद समय का भी ध्यान रखना जरूरी है। मानसून सत्र पहले ही अपने सही समय से काफी देर हो चुका है। खतरा यह भी है कि अगर सरकार विश्वास मत हासिल करने के लिए लोकसभा का विशेष सत्र इस माह के आखिर में बुलाती है, तो मानसून सत्र रद्द भी हो सकता है। संसद का शीत सत्र वैसे भी काफी छोटा होता है, ऊपर से यह भी साफ नहीं है कि अगले साल चुनाव की वजह से बजट सत्र होगा भी या नहीं।