कौन काटेगा आलू किसानों की चुनावी फसल

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 12:56 AM IST

उत्तर प्रदेश में आलू की कीमतों में रिकॉर्ड गिरावट का ठीकरा समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख मुलायम सिंह यादव के सिर पर भी फूट रहा है।
सपा का लगभग दो दशकों से इस क्षेत्र की ज्यादातर सीटों पर कब्जा रहा है।  इटावा, मैनपुरी, एटा, फर्रूखाबाद, फिरोजाबाद और कन्नौज जैसे जिले सपा के पारंपरिक गढ़ रहे हैं और ये जिले आलू के प्रमुख उत्पादक भी हैं।
यहां की लगभग 80 फीसदी आबादी कृषि से जुड़ी हुई है, लेकिन यहां राजनेता भी ताजा ‘आलू’ और ‘लहसुन’ आपदाओं को लेकर राजनीति करने में लगे हुए हैं। 10 लाख से अधिक आलू किसान अपनी फसल को सड़ने देने के लिए बाध्य हुए या फिर उन्होंने इसे बेहद कम कीमत 100 रुपये प्रति क्विंटल पर नुकसान के साथ बेचा।
इस वजह से अधिकांश आलू किसानों की जीविका खतरे में पड़ गई। आत्महत्या के दो मामले भी यादव के गृह शहर इटावा और फर्रूखाबाद में सामने आए जहां कर्ज चुकाने में विफल रहने की वजह से किसानों ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। 
आलू की दुर्गति के बाद मैनपुरी और एटा जिलों में लगभग 70 हजार किसानों ने लहसुन की खेती को तवज्जो दी जो सामान्यतया 4000-5000 रुपये प्रति क्विंटल का पारिश्रमिक दिलाती है, लेकिन लहसुन की कीमतें भी जमींदोज होकर 400 रुपये प्रति क्विंटल से नीचे चली गईं। 
हालांकि सपा और भाजपा नेता इस मुसीबत के लिए सत्तारूढ़ बसपा सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उन्होंने स्वयं उर्वरक अभाव और कीमतों में भारी गिरावट के मुद्दों को उठाए जाने में कम दिलचस्पी दिखाई है। स्थानीय मीडिया ने भी किसानों की दुर्गति को लेकर जबरदस्त रिपोर्टिंग की है। यह पहली बार नहीं है जब ऐसी आपदा ने इस क्षेत्र को प्रभावित किया है।
शुरू में किसानों ने ठेका खेती को लेकर बड़ी उम्मीदें पाल रखी थीं और पेप्सिको ने उचित कीमतों पर आलू की खरीद के लिए यहां का दौरा भी किया था, लेकिन पहल रंग नहीं दिखा पाई और किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर गया था। भले ही किसानों को अपनी नाराजगी प्रकट करने के लिए एक विशेष मंच नहीं मिल सका है, लेकिन निष्पक्ष चुनावों के मामले में वे नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।

First Published : April 16, 2009 | 10:01 PM IST