मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने उस आपत्ति को खारिज कर दिया है जिसमें कहा गया था कि और अधिक इंजीनियरिंग संस्थानों को आईआईटी का नाम देने से इस उत्कृष्ट संस्थान की छवि खराब होगी।
मंत्रालय ने निर्णय लिया है कि नए इंजीनियरिंग संस्थानों को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) का नाम दिया जाएगा और उसने इस फैसले पर काम करने के लिए आईआईटी एक्ट, 1961 में बदलाव करना भी शुरू कर दिया है।
सरकार की योजना राजस्थान, बिहार, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, गुजरात और पंजाब में आठ इंजीनियरिंग संस्थानों की स्थापना करना है और साथ ही बनारस हिंदू विश्वविद्यालय को आईआईटी में तब्दील करना है। मंत्रालय के इस फैसले के बाद देश में कुल आईआईटी की संख्या बढ़कर 16 हो जाएगी।
सूत्रों के अनुसार मंत्रालय आईआईटी की स्थापना के लिए मौजूदा ‘सामाजिक’ ढांचे में परिवर्तन लाने पर विचार कर रही है। अब तक जितने आईआईटी और आईआईएम की स्थापना की गई है, वे पहले सामाजिक ढांचे के तहत तैयार किए गए थे और उन्हें बाद में संसद के एक विशेष कानून के जरिए डिप्लोमा प्रदान करने का अधिकार दिया गया था।
इन संस्थानों को आगे चलकर राष्ट्रीय महत्व का करार देते हुए आईआईटी का नाम दे दिया गया। पर इस बार सरकार इन नए प्रस्तावित संस्थानों को सीधे आईआईटी एक्ट के दायरे में लाते हुए डिग्री प्रदान करने का अधिकार देने का मन बना रही है। केपीएमजी के कार्यकारी निदेशक के के रमन ने कहा, ‘नए आईआईटी को सीधे आईआईटी में शामिल करना एक समझदारी भरा कदम होगा।
अगर इन्हें पहले सोसाइटी में शामिल किया जाए तो आईआईटी में तब्दील करने की प्रक्रिया में काफी समय लगेगा।’ हालांकि, यह फैसला मौजूदा आईआईटी के पक्ष में नहीं गया है। मार्च महीने में आईआईटी के निदेशकों ने एक पत्र लिखकर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया से कहा था कि नए इंजीनियरिंग संस्थानों को आईआईटी के बजाय कुछ और नाम दिया जाए।
उनका मानना था कि नए संस्थानों को आईआईटी का नाम दिए जाने से इस प्रतिष्ठित संस्थान के ब्रांड इमेज को खतरा पहुंच सकता है। आईआईटी दुनिया भर के 100 उत्कृष्ट प्रौद्योगिक संस्थानों में शुमार है।