बिजली (संशोधन) अधिनियम 2022, सोमवार को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया और उसे तत्काल और अधिक छानबीन तथा चर्चा के लिए ऊर्जा संबंधी स्थायी समिति के पास भेज दिया गया। यह ऐसे समय पर हुआ है जब केंद्र सरकार संकटग्रस्त सरकारी बिजली कंपनियों को उबारने के लिए एक और योजना शुरू करने जा रही है। इसके बावजूद आशंका यह है कि विधेयक समिति के पास ही दम तोड़ देगा क्योंकि विपक्षी दलों और गैर भाजपा शासित राज्यों ने संशोधनों को लेकर गहरी चिंता प्रकट की है। उनका मानना है कि ये संशोधन बिजली की आपूर्ति तथा मूल्य निर्धारित करने के उनके अधिकार में घुसपैठ करता है।
विधेयक में ऐसे कई प्रावधान हैं जिन्होंने विपक्ष के मन में तथा सरकारी क्षेत्र की बिजली कंपनियों के कर्मचारियों को नाराज किया होगा। इन प्रावधानों में से अधिकांश खुली पहुंच के सिद्धांत के इर्दगिर्द हैं। यानी उपभोक्ताओं को अपना बिजली प्रदाता चुनने का अधिकार, भले ही उनके इलाके अथवा राज्य में अधोसंरचना पर किसी का भी नियंत्रण हो। सन 2003 के बाद लगातार सरकारों ने देश में इस सिद्धांत को लागू करने की कोशिश की है लेकिन हर बार कड़े विरोध तथा खराब मसौदे के कारण इसे उचित तरीके से लागू नहीं किया जा सका। संशोधन विधेयक पारित करने का यह प्रयास भी उसी तरह नाकाम नहीं होना चाहिए।
दुर्भाग्य की बात है कि सरकार ने अतीत से सबक नहीं लिया है। न तो उसने हालिया अतीत से कुछ सीखा है और न ही देश में बिजली पहुंच से जुड़े विवादों के लंबे इतिहास से। अगर उसने हालिया सुधार के अपने प्रयासों तथा कृषि कानून जैसी नाकामियों से कुछ सीखा होता तो उसने पहले ही बड़ी तादाद में राज्यों को साथ लेने की कोशिश की होती। ऐसा करने से राजनीतिक विरोध कम होता। बिना मशविरे के कानून बनाने और फिर उन्हें पारित कराने तथा उनके क्रियान्वयन में दिक्कत जैसी समस्याएं अब तक समाप्त हो जानी चाहिए थी।
कुछ सबक ऐसे भी हैं जो खासतौर पर इस विशिष्ट मुद्दे से ही सीखे जाने चाहिए थे। उदाहरण के लिए अतीत में खुली पहुंच के प्रावधान अपवादों तथा कानूनी जटिलताओं में उलझ जाते थे। मसलन, पहले केवल बड़े उपभोक्ता ही अपना सेवा प्रदाता चुन पाते थे। इससे सरकारी कंपनियों पर खुली पहुंच का वह प्रतिस्पर्धी दबाव नहीं बन पाता था जो अन्यथा बन सकता था। सरकार को पहले ही यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए था कि इस संशोधन के क्रियान्वयन में कोई खामी या मसौदे में कोई चूक न हो। अगर केंद्र सरकार द्वारा राज्यों के नियामकीय और विधिक दायरे में किए जा रहे अतिक्रमण को ध्यान में रखा जाए तो विपक्ष संशोधनों को लेकर जो आपत्ति जता रहा है, उसे समझा जा सकता है।
बिजली संविधान की समवर्ती सूची में है और इस बात को लेकर शायद ही कोई विवाद है कि राष्ट्रीय ग्रिड की मौजूदगी में उपभोक्ताओं के अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए और खुली पहुंच जैसा सिद्धांत अपनाया जाना चाहिए। एक व्यापक चिंता यह है कि अगर उपभोक्ताओं को चयन का अधिकार मिल गया तो खराब प्रदर्शन करने वाली सरकारी बिजली कंपनियों को बेहतर प्रदर्शन करने वाले सेवा प्रदाताओं के लिए रास्ता खाली करना होगा। परंतु इसे किसी समस्या के रूप में नहीं बल्कि विशेषता के रूप में देखा जाना चाहिए। जैसा कि केंद्रीय मंत्री आर के सिंह स्पष्ट किया, बिजली के लिए सब्सिडी पारदर्शी ढंग से दी जानी चाहिए और इसे औपचारिक बजट का हिस्सा होना चाहिए। इसके लिए सरकारी बिजली कंपनी के साथ क्रॉस सब्सिडी का तरीका नहीं अपनाया जाना चाहिए। क्योंकि क्रॉस सब्सिडी से प्रतिस्पर्धी क्षमता प्रभावित होती है।
विधेयक शुल्क दरों के चरणबद्ध संशोधन की इजाजत देता है। इससे भी राज्यों की दलील कमजोर पड़ती है क्योंकि इसे अपनाने के लिए समय दिया जा रहा है। यह सही है कि केंद्र सरकार ने इन सुधारों को पेश किए जाने का अच्छी तरह प्रबंधन किया है परंतु इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि खुली पहुंच के सिद्धांत को लागू करना बहुत लंबे समय से लंबित है तथा इस दिशा में नये प्रयास स्वागतयोग्य हैं।