अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ अपने ताजातरीन वैश्विक आर्थिक पूर्वानुमान में विश्व अर्थव्यवस्था की धुंधली और उदासीन तस्वीर पेश करता है। ताजा अनुमानों के मुताबिक 2021 में 6 फीसदी की वृद्धि दर हासिल करने के बाद चालू वर्ष में वैश्विक वृद्धि घटकर 3.2 फीसदी रह सकती है और 2023 में तो यह 2.7 फीसदी तक गिर सकती है।
2022 में आए धीमेपन को जहां जुलाई के पूर्वानुमानों में स्थान दिया गया, वहीं 2023 के अनुमानों को भी संशोधित करके 0.2 फीसदी कम कर दिया गया है। यदि वैश्विक वृद्धि आईएमएफ के पूर्वानुमान के अनुरूप रहती है तो यह रुझान से काफी कम रहेगी।
उदाहरण के लिए वैश्विक आर्थिक वृद्धि की बात करें तो 2000 और 2021 के बीच यह औसतन 3.6 फीसदी रही है। ये अनुमान बताते हैं कि 2023 में 143 अर्थव्यवस्थाओं के लिए परिदृश्य बिगड़ा है। ये वैश्विक उत्पादन के 92 फीसदी के लिए जवाबदेह हैं। भारत के लिए वृद्धि अनुमान को 0.6 फीसदी कम किया गया। जुलाई में प्रस्तुत पूर्वानुमानों में कहा गया था कि चालू वित्त वर्ष में भारत 6.8 फीसदी की वृद्धि हासिल करेगा।
वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। जैसा कि आईएमएफ ने भी कहा, यूक्रेन युद्ध, दुनिया भर में बढ़ी हुई मुद्रास्फीति तथा चीन में मंदी की स्थिति ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। यूक्रेन युद्ध हाल के दिनों में और अधिक भीषण हुआ है।
इस युद्ध के परिणामस्वरूप न केवल जनहानि हो रही है बल्कि दुनिया भर को आर्थिक कठिनाई भी झेलनी पड़ रही है। उदाहरण के लिए यूरोप में गैस की कीमत 2021 के बाद से चार गुना से अधिक हो गई है।
जीवन लागत में बढ़ोतरी अस्थायी नहीं है क्योंकि ऐसा लगता नहीं है कि रूसी गैस निकट भविष्य में पहले की तरह उपलब्ध होगी। आमतौर पर भी ईंधन की कीमतों में इजाफा हुआ है और तेल उत्पादक देशों का समूह भी कीमतों को कम करने के पक्ष में नहीं है।
इस बीच बढ़ी हुई वैश्विक मुद्रास्फीति केंद्रीय बैंकों पर यह दबाव डाल रही है कि वे ब्याज दरों में इजाफा करें। ऐसे हालात में मौद्रिक नीति के कम या ज्यादा सख्त होने का जोखिम भी बना हुआ है। कम सख्ती की स्थिति में मुद्रास्फीति अधिक बनी रहेगी और अधिक सख्ती करने पर यह खतरा होगा कि कहीं उत्पादन और वृद्धि प्रभावित न हो जाएं। अनुमानों के अनुसार वैश्विक मुद्रास्फीति की दर 2022 के 8.8 फीसदी से कम होकर 2024 तक 4.1 फीसदी हो जाएगी।
इसका अर्थ यह हुआ कि ब्याज दरें कुछ समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहेंगी। ऊंची ब्याज दरें तथा सख्त वित्तीय हालात पूंजी प्रवाह को प्रभावित करेंगे और उभरते बाजारों के लिए वित्तीय समस्याओं में इजाफा करेंगे। ब्याज दरों का निरंतर बढ़ना वित्तीय बाजारों को अस्थिर करेगा और वृद्धि पर असर डालेगा।
वैश्विक आर्थिक हालात भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगे और आईएमएफ द्वारा वृद्धि पूर्वानुमान में तीव्र कमी का पूर्वानुमान हमें हकीकत से दो-चार होने का अवसर देता है। उदाहरण के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने वर्ष की पहली छमाही में आंकड़ों के अनुमान से काफी कम रहने के बाद दूसरी छमाही में वृद्धि के पूर्वानुमान में तेज इजाफा किया है। चूंकि 2023 में वैश्विक अर्थव्यवस्था में और गिरावट आने का अनुमान है इसलिए अनुमानों को समायोजित करने की आवश्यकता है।
यह संभव है कि वृद्धि दर अगले वर्ष 6 फीसदी के नीचे आ जाए। इन हालात में भारतीय नीति निर्माताओं के लिए बेहतर होगा कि वे वृहद आर्थिक स्थिरता को बरकरार रखने पर ध्यान दें। चूंकि विदेशी विनिमय बाजारों में भी कुछ समय अस्थिरता रह सकती है इसलिए रिजर्व बैंक को अपने मुद्रा भंडार का समझदारी से इस्तेमाल करना चाहिए।
उसे मुद्रास्फीति से निपटने की मजबूत प्रतिबद्धता जतानी चाहिए। इस बीच सरकार को चाहिए कि वह राजकोषीय घाटे को कम करने की प्रतिबद्धता दिखाए। विपरीत वैश्विक हालात में वृद्धि को गति देने के लिए नीतिगत गुंजाइश की आवश्यकता है।