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सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) ने वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 77,821 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया। हालांकि सरकारी और इंडस्ट्री से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, यह कमाई किसी संकट के दौरान हुए असाधारण मुनाफे की बजाय सामान्य रिफाइनिंग मार्जिन है। पश्चिम एशिया संघर्ष के बाद ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर उठ रही आलोचनाओं के बीच यह जानकारी सामने आई है।
इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) का कुल संयुक्त टर्नओवर करीब 20 लाख करोड़ रुपये रहा। इसके मुकाबले उनका शुद्ध लाभ मार्जिन लगभग 3-4 प्रतिशत रहा, जो वैश्विक कमोडिटी रिफाइनिंग इंडस्ट्री के सामान्य मानकों के अनुरूप माना जाता है।
विपक्षी दलों ने OMCs के मुनाफे में FY2024-25 की तुलना में 130 प्रतिशत की बढ़ोतरी पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, FY2024-25 में इन कंपनियों का लाभ घटकर 33,602 करोड़ रुपये रह गया था। ऐसा इसलिए क्योंकि घरेलू LPG सिलेंडर की कीमतें नियंत्रित रखने के लिए कंपनियों ने 40,434 करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी अपने ऊपर ली थी।
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अगर इस एकमुश्त बोझ को अलग कर दिया जाए, तो FY2025-26 का मुनाफा FY2023-24 के 80,986 करोड़ रुपये के संयुक्त लाभ के करीब ही माना जा रहा है, न कि किसी असाधारण उछाल के रूप में।
उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि मुनाफे को कंपनियों के कारोबार के आकार के हिसाब से देखा जाना चाहिए। भारत की तीनों OMCs का कुल सालाना कारोबार करीब 20 लाख करोड़ रुपये है, जबकि अकेले IOC का टर्नओवर करीब 10 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचता है।
विश्लेषकों के मुताबिक बड़े कमोडिटी रिफाइनर्स के लिए 1-3 प्रतिशत का ऑपरेटिंग मार्जिन सामान्य माना जाता है और पूंजीगत खर्च, रिफाइनरी अपग्रेड तथा कार्यशील पूंजी की जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी होता है।
एक बड़ी रिफाइनरी विस्तार परियोजना की लागत 50,000 करोड़ से 60,000 करोड़ रुपये तक हो सकती है। भारत 2030 तक अपनी रिफाइनिंग क्षमता को 310 मिलियन टन प्रतिवर्ष से आगे बढ़ाने का लक्ष्य लेकर चल रहा है।
कंपनियों का यह भी कहना है कि FY2025-26 की कमाई पर होर्मुज संकट का सीधा असर नहीं पड़ा क्योंकि रिफाइनरियां पश्चिम एशिया संकट बढ़ने से पहले खरीदे गए 50-60 दिनों के कच्चे तेल के भंडार को प्रोसेस कर रही थीं।
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इस वजह से कच्चे तेल की ऊंची खरीद लागत, माल ढुलाई प्रीमियम और बीमा शुल्क का असर मुख्य रूप से FY2026-27 की पहली तिमाही के नतीजों में दिखाई देगा, जो अगस्त में जारी होंगे। होर्मुज से दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का कच्चा तेल गुजरता है। इस मार्ग में व्यवधान के कारण एशिया में तेल कीमतों और शिपिंग लागत में तेज बढ़ोतरी हुई।
सरकार ने पेट्रोल और डीजल की हालिया कीमत बढ़ोतरी का बचाव करते हुए कहा कि आपूर्ति संकट के बावजूद भारत में ईंधन कीमतों में संशोधन पड़ोसी देशों की तुलना में सीमित रहा है।
फरवरी के अंत में संकट शुरू होने के बाद भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में लगभग 8-9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जबकि कई पड़ोसी देशों में यह वृद्धि 20 प्रतिशत से 67 प्रतिशत तक रही।
सरकार ने 27 मार्च 2026 से पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती भी की थी। इससे पहले 2021 और 2022 में भी एक्साइज ड्यूटी घटाई गई थी। अधिकारियों के अनुसार 2021 से अब तक पेट्रोल पर कुल 23 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 26 रुपये प्रति लीटर की राहत दी जा चुकी है।
सरकार का यह भी कहना है कि OMCs के मुनाफे का लगभग आधा हिस्सा डिविडेंड और टैक्स के जरिए सरकारी खजाने में वापस जाता है। इसका इस्तेमाल हाईवे, रेलवे और मेट्रो जैसी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए किया जाता है, जबकि बची हुई कमाई ऊर्जा सुरक्षा और रिफाइनरी विस्तार में निवेश की जाती है।
ईरान से जुड़े आपूर्ति संकट और खाड़ी क्षेत्र के शिपिंग मार्गों में लंबे समय तक अस्थिरता की आशंका के कारण कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। इसी के चलते OMCs के मुनाफे को लेकर बहस तेज हो गई है।