पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव गहराने से दुबई का लक्जरी आवासीय बाजार थोड़ा सुस्त हो गया है और निवेशक थोड़ा चिंतित नजर आ रहे हैं। ऐसे में भारतीय लोग खाड़ी अमीरात में मौजूद अपनी प्रमुख संपत्तियों को लेकर सतर्क जरूर हैं, लेकिन वे यहां अपने महंगे घरों को बेचकर निकलने के बारे में जल्दबाजी में नजर नहीं आ रहे हैं।
भारतीय और एशियाई बाजारों में फैले अमीर रियल एस्टेट निवेशकों को सेवाएं प्रदान करने वाले दुबई स्थित रियल एस्टेट कंसल्टेंसी प्रोएक्ट लक्जरी रियल एस्टेट के मुख्य कार्यकारी रितु कांत ओझा ने कहा, ‘दुबई में अमीर भारतीयों द्वारा पाम जुमेराह या एमिरेट्स हिल्स में अपनी आलीशान संपत्तियों को बेचकर खाड़ी से बाहर निकलने के कोई संकेत नहीं हैं।’ उन्होंने कहा कि बाजार में इस समय दिखाई दे रहे छिटपुट सौदे किसी भू-राजनीतिक संकट की वजह से नहीं हो रहे हैं, बल्कि ये बड़े पैमाने पर निवेशकों की खरीद-बिक्री के लचीलेपन को दर्शा रहे हैं।
दुबई के आवास बाजार पर अभी भी विदेशी निवेशक हावी हैं। वीर ऐंड संत रियल एस्टेट के अनुसार 2025 के पहले 9 महीनों में 150 से अधिक देशों के निवेशकों ने यहां संपत्ति खरीदी है, जिसमें विदेशी खरीदारों की कुल आवासीय स्वामित्व में 40 प्रतिशत से अधिक की हिस्सेदारी रही। भारतीय अमीर घराने इस बाजार में सबसे बड़े विदेशी खरीदार बने हुए हैं, जिनका योगदान लगभग 22 प्रतिशत है।
एक और खास बात यह है कि इस समय हर अल्ट्रा-हैंडसम भारतीय चाहता है कि दुबई या खाड़ी क्षेत्र में उसकी अपनी संपत्ति हो। नाइट फ्रैंक की ‘द वेल्थ रिपोर्ट 2025’ के अनुसार, भारत में अरबपतियों की आबादी 2023 और 2024 के दौरान 12 प्रतिशत बढ़कर 191 हो गई है, जबकि 2019 में केवल सात नए अरबपति जुड़े थे।
दुबई का लक्जरी आवास बाजार निवेशकों के दम पर ही रफ्तार भरता है, जहां मुनाफा कमाने के लिहाज से पैसा लगाने वाले खरीदार अक्सर डेवलपर भुगतान योजनाओं के माध्यम से परियोजनाओं में पूंजी लगाते और निकालते हैं। ओझा ने कहा, ‘जब कोई बड़ा भुगतान करना होता है और मांग कम हो जाती है, तो कुछ निवेशक जल्दी से संपत्तियों को बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इसे अक्सर भू-राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़ी परेशानी समझ लिया जाता जबकि आमतौर पर ऐसा होता नहीं है।’
एनाराक ग्रुप के अध्यक्ष अनुज पुरी ने कहा कि बाजार में इस समय बुकिंग प्रक्रिया धीमी है और लोग सौदों के बारे में बातचीत कर रहे हैं लेकिन फैसला बाद के लिए छोड़ रहे हैं। यह रुझान अस्थायी है। इसे बड़े पैमाने पर निवेशकों के बाहर निकलने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘मौजूदा समय में पाम जुमेराह, एमिरट्स हिल्स और डाउनटाउन दुबई जैसे महंगे इलाकों में भारतीय अमीरों की शानदार संपत्तियां हैं। निवेशक हालात को भांप रहे हैं और नए सौदों के बारे में बेहद सतर्कता से काम ले रहे हैं।’
दुबई का रियल एस्टेट बाजार काफी मजबूत बना हुआ है। एनाराक के अनुसार दुबई में 2025 के दौरान लगभग 917 अरब दिरहम के रियल एस्टेट सौदे हुए थे, जो अब तक के सबसे अधिक हैं। इनमें अकेले आवासीय लेनदेन लगभग 538 अरब दिरहम के थे, जो लगभग 200,000 सौदों में हुआ। यहां वर्ष 2021 के बाद से आवासीय संपत्ति की कीमतों में लगभग 60-75 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो महामारी के बाद वैश्विक स्तर पर सबसे मजबूत स्थिति को दर्शाता है।
उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि दुबई की कर-अनुकूल व्यवस्था, डॉलर आधारित संपत्ति खरीद-बिक्री, गोल्डन वीजा जैसी निवास सहूलियत और किराय से होने वाली 6-9 प्रतिशत की मजबूत आमदनी आदि ऐसे कारक हैं, जो भारतीय निवेशकों को लुभा रहे हैं।
ओझा ने कहा, ‘निवेशक ऐसे सौदे देख रहे हैं, जिन्हें कोई मजबूरी में सस्ते दामों में बेचने की फिराक में हैं।’ पुरी ने कहा कि भारतीय अमीर लोग वर्तमान बाजार की स्थितियों को देखते हुए नए निवेश के लिए ऐसी संपत्ति तलाश रहे हैं, जिसमें रिस्क कम हो या उसकी भरपाई मोटे मुनाफ से हो जाए।
रियल्टी उद्योग निकाय क्रेडाई के अध्यक्ष शेखर पटेल ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘निवेश और रहने के लिहाज से दुबई एवं अबू धाबी को सुरक्षित ठिकाना माना जाता था, लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़े संघर्ष का असर इस क्षेत्र पर भी पड़ेगा।’ अब स्थिति बदलती दिख रही है। पटेल ने कहा, ‘संघर्ष के कारण आई सुस्ती को देखते हुए निवेशक दुबई में अगले 2 से 3 साल तक अपनी संपत्तियों को रोक सकते हैं।’