देश के Real Estate सेक्टर के लिए 2026 काफी अहम साल माना जा रहा है। इस साल लाखों लोगों को अपने नए घर का कब्जा मिलने की उम्मीद है, लेकिन पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष की वजह से यह इंतजार बढ़ सकता है। वैश्विक व्यापार मार्गों, सप्लाई चेन और कमोडिटी बाजारों पर पड़ रहे असर का प्रभाव अब भारत के हाउसिंग सेक्टर पर भी दिखने लगा है। अगर हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहते हैं, तो कई रिहायशी प्रोजेक्ट तय समय पर पूरे नहीं हो पाएंगे।
देश के सात बड़े शहरों में इस साल करीब 5.4 लाख घरों की डिलीवरी होने की उम्मीद है। इनमें दिल्ली-एनसीआर, मुंबई महानगर क्षेत्र (एमएमआर), पुणे, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और कोलकाता शामिल हैं। यह अब तक की सबसे बड़ी हाउसिंग डिलीवरी पाइपलाइन मानी जा रही है। दरअसल, 2021 से 2023 के बीच लॉन्च किए गए कई प्रोजेक्ट अब निर्माण के आखिरी चरण में पहुंच चुके हैं और डेवलपर्स इन्हें खरीदारों को सौंपने की तैयारी कर रहे हैं।
हालांकि, प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी कंपनी एनारॉक का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष इस पूरी प्रक्रिया के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। भले ही घरों की मांग बनी हुई है और डेवलपर्स की वित्तीय स्थिति पहले की तुलना में बेहतर है, लेकिन बाहरी परिस्थितियां डिलीवरी शेड्यूल को प्रभावित कर सकती हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम भारत के दो बड़े हाउसिंग बाजार मुंबई महानगर क्षेत्र और पुणे सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। इन दोनों शहरों में इस साल कुल 3 लाख से ज्यादा घरों की डिलीवरी होनी है। अकेले मुंबई महानगर क्षेत्र में लगभग 2.07 लाख घर खरीदारों को सौंपे जाने हैं, जबकि पुणे में करीब 1 लाख घरों की डिलीवरी का टारगेट रखा गया है। कुल प्रस्तावित डिलीवरी में इन दोनों शहरों की हिस्सेदारी 57 प्रतिशत है।
यही वजह है कि अगर निर्माण सामग्री की सप्लाई प्रभावित होती है या उसकी लागत बढ़ती है, तो इन शहरों के प्रोजेक्ट्स पर सबसे पहले और सबसे ज्यादा असर देखने को मिल सकता है।
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पश्चिम भारत के अलावा दक्षिण भारत के प्रमुख हाउसिंग बाजारों में भी देरी की आशंका जताई गई है। बेंगलुरु में करीब 69,000 घरों की डिलीवरी होनी है, जबकि हैदराबाद में 63,700 और चेन्नई में 35,600 घर पूरे किए जाने हैं। इन तीनों शहरों में कुल मिलाकर 1.68 लाख से ज्यादा घरों की डिलीवरी प्रस्तावित है।
अगर सप्लाई चेन में रुकावटें बनी रहती हैं या निर्माण सामग्री की उपलब्धता प्रभावित होती है, तो इन प्रोजेक्ट्स की गति भी धीमी पड़ सकती है। इसका सीधा असर घर खरीदारों पर पड़ेगा, जिन्हें तय समय से ज्यादा इंतजार करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक चलने वाला भू-राजनीतिक तनाव रियल एस्टेट सेक्टर के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है। पश्चिम एशिया ऊर्जा सप्लाई का बड़ा केंद्र है। ऐसे में वहां संघर्ष बढ़ने से तेल और गैस की कीमतों में तेजी आ सकती है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय शिपिंग मार्ग प्रभावित होने से माल ढुलाई की लागत भी बढ़ सकती है।
इसका असर स्टील, एल्युमीनियम और अन्य निर्माण सामग्री की कीमतों पर पड़ सकता है। जब निर्माण लागत बढ़ती है तो डेवलपर्स के लिए प्रोजेक्ट तय बजट और समयसीमा में पूरा करना मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि मौजूदा हालात को लेकर रियल एस्टेट सेक्टर में चिंता बढ़ रही है।
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रियल एस्टेट सेक्टर पहले भी बाहरी झटकों का असर झेल चुका है। कोविड-19 महामारी के दौरान 2020 में सात बड़े शहरों में करीब 4.66 लाख घरों की डिलीवरी का टारगेट रखा गया था। लेकिन लॉकडाउन, मजदूरों के पलायन और सप्लाई चेन में रुकावटों के कारण केवल 2.14 लाख घर ही पूरे हो पाए थे। यानी तय टारगेट का सिर्फ 46 प्रतिशत हिस्सा ही पूरा हो सका था।
हालांकि मौजूदा स्थिति महामारी जैसी नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर प्रोजेक्ट्स की लागत, निर्माण की गति और डिलीवरी टाइमलाइन पर पड़ सकता है।
एनारॉक के रिसर्च और एडवाइजरी प्रमुख प्रशांत ठाकुर का कहना है कि आज डेवलपर्स की बैलेंस शीट पहले के मुकाबले मजबूत है और तकनीक के इस्तेमाल से प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग भी बेहतर हुई है। इसके बावजूद ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी, लॉजिस्टिक्स लागत में इजाफा और निर्माण सामग्री के महंगे होने से चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं होतीं।
उन्होंने कहा कि रेरा के तहत डेवलपर्स को तय समयसीमा में घरों की डिलीवरी करनी होती है। ऐसे में किसी भी तरह की देरी उनके लिए अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकती है।