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इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को मिल सकेगा ज्यादा लोन

Last Updated- December 06, 2022 | 1:04 AM IST

बुनियादी ढांचा बनाने वाली कंपनियों के लिए एक अच्छी खबर है। यह कंपनियां अब वाणिज्यिक बैंकों से ज्यादा लोन ले सकेंगी।


बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं में आमतौर पर होने वाली देरी क ो देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने कुछ नरम रुख अपनाते हुए नियमों में ढील बरती है।


अब एक बुनियादी ढ़ांचा निर्माण परियोजना को पूरा होने के दो साल तक सब-स्टैंडर्ड असेट माना जाएगा। अब तक यह सीमा एक साल ही थी। गौरतलब है कि अगर बैंक द्वारा वित्त पोषित कोई औद्योगिक परियोजना उत्पादन के लिए निर्धारित समय से छह महीने देर कर देती है तो बैंक उसे एक सब-स्टैंडर्ड असेट की श्रेणी में रखता है।


बुनियादी ढांचा बनाने वाली कंपनियों के लिए यह सीमा 31 मार्च 2007 को एक साल निर्धारित की गई थी। इसमें और ज्यादा ढिलाई बरतते हुए बढ़ाकर 2 साल कर दिया गया है। एक कंसलटेंसी फर्म फीडबैक वेन्चर्स के सीईओ विनायक चटर्जी कहते हैं कि यह रिजर्व बैंक की दयालु दृष्टि है कि उसने इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में होने वाली उस देरी को समझा जिनपर उनका बस नहीं है। इस तरह के किसी भी मामले में लेनदारों को सजा देने का कोई मतलब नहीं है।


नए नियम लागू होने से अब कंपनियों को उधार लेने में मदद मिलेगी। यहां एक सड़क परियोजना का उदाहरण देखा जा सकता है। मान लीजिए एक डेवलपर ने सड़क बनाने के लिए पैसा उधार लिया है और उसे उम्मीद है कि वह 1 जुलाई से टोल वसूलना शुरू कर देगा और 31 जुलाई से लिए गए लोन पर ब्याज का भुगतान करना शुरू कर देगा।


लेकिन किसी वजह से अगर परियोजना में देरी हो जाती है और  पैसा नहीं आने की वजह से वह लोन नहीं चुका पाता है क्योंकि परियोजना को एक विशेष उद्देश्य वाली कंपनी के जरिए पूरा किया जा रहा था और वह बैलेंस शीट का हिस्सा नहीं है।


इन कारणों से बैंक इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को लोन देने से कतराते हैं। लेकिन यह कारण उनके नियंत्रण से बाहर है। लेकिन देरी होने के कारण इस तरह के लोन को नॉन प्रोडक्टिव असेट की श्रेणी में नहीं डाला जाएगा। केवल सीमा को विस्तार दिया गया है।

First Published - May 1, 2008 | 11:23 PM IST

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