प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
आईटी कंपनी में काम करने वाले 25 साल के उत्कर्ष मेहरा आजकल परेशान हैं। नोएडा में किराये के फ्लैट में अकेले रहने वाले उत्कर्ष खाने-पीने के लिए पास के बाजार पर और टिफिन सर्विस पर निर्भर थे। मगर गैस सिलिंडरों की जबरदस्त किल्लत के कारण आजकल चाय, नाश्ते और खाने की 90 फीसदी दुकानों के शटर गिरे हुए हैं। उत्कर्ष दुखी स्वर में कहते हैं कि लड़ाई अमेरिका और ईरान की है मगर खाना-पीना उनका बंद हो गया है।
पश्चिम एशिया में चल रही जंग के कारण दिल्ली-एनसीआर और दूसरे छोटे-बड़े शहरों में ढाबे-होटल बंद हो रहे हैं और केटरर ठेके लेने से बच रहे हैं। नोएडा में ही श्री श्याम भोग ऐंड केटरर्स चला रहे राहुल गुप्ता बताते हैं कि शादी-ब्याह पर ब्रेक के बीच नवरात्र का समय भंडारों और दूसरे बड़े आयोजनों के लिहाज से केटरर्स को अच्छा कारोबार दिला जाता है। लेकिन इस बार भंडारों के ठेके लेने से पहले भी सोचना पड़ रहा है।
वह कहते हैं, ‘भंडारे तो भक्त जरूर कराएंगे मगर सिलिंडरों की किल्लत के बीच केटरर्स ऑर्डर लेने से हिचक रहे हैं। सिलिंडर महंगे तो हैं ही, उनका इंतजाम करना भी दूभर हो रहा है। इसलिए खानपान के ठेके कम ही लिए जा रहे हैं।’ गुप्ता बता रहे हैं कि गैस की किल्लत के बीच केटरिंग के ठेके 10 से 15 फीसदी ज्यादा रकम पर ही उठाए जा रहे हैं।
गुप्ता अकेले नहीं हैं। पिछले दो हफ्तों में कई केटरर्स ने बुकिंग लेने से इनकार किया है। पूर्वी दिल्ली में मल्होत्रा जी केटरर चला रहे सुमित मल्होत्रा बता रहे हैं कि गैस की कमी उनके कारोबार पर सीधा असर डाल रही है। उन्होंने बताया कि पिछले 10-15 दिन में उन्होंने 5-6 ऑर्डर कैंसल किए हैं क्योंकि सिलिंडर का इंतजाम करना बहुत मुश्किल हो गया है। हालांकि कई केटरर लकड़ी और कोयले का इस्तेमाल करने लगे हैं मगर अचानक मांग बढ़ने से इनके दाम भी बेतहाशा बढ़ गए हैं।
मल्होत्रा ने कहा,’पहले 20 रुपये प्रति किलोग्राम मिलने वाली लकड़ी अब 30-40 रुपये पहुंच गई है। कोयला भी 40 रुपये किलो से बढ़कर कम से कम 60 रुपये किलो मिल रहा है।’
दिल्ली में ही फूड लक्स केटरिंग के रोशी खुराना के मुताबिक बड़े कार्यक्रम करना बहुत मुश्किल हो गया है क्योंकि उनमें 20-25 सिलिंडरों की जरूरत पड़ती है और आज इतने सिलिंडर जुटाना आसान नहीं है। वह कहते हैं, ‘100-200 लोगों का खाना तो इंडक्शन स्टोव या कोयला भट्ठी से हो जाता है। लेकिन 1000-2000 मेहमानों वाले बड़े समारोह में खाना गैस के बगैर तैयार नहीं हो सकता।’
गैस की किल्लत देखकर केटरर्स ज्यादा गैस खपाने वाले चाट-पकौड़ी के आइटम मेन्यू से हटा रहे हैं। लखनऊ के मशहूर बुद्धालाल और कमल केटरर्स का कहना है कि शादी के ऑर्डर अब ईंटों के चूल्हे पर लकड़ी व कोयले की मदद से निपटाए जा रहे हैं। हिन्द केटरर्स के प्रतीक यादव का कहना है कि लागत में 50 फीसदी का इजाफा हो गया है और लाइव किचन वाले आइटम हटाने पड़े हैं।
इंडियन होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन (आहार) के अनुसार मुंबई में एलपीजी की कमी से प्रभावित 40 फीसदी रेस्तरां में से करीब 20 फीसदी रेस्टोरेंट पूरी तरह से बंद हो गए हैं। बाकी 20 फीसदी रेस्तरां ने मेन्यू में व्यंजनों की संख्या घटा दी है। घाटकोपर का होटल आनंद बंद हो गया है। माटुंगा के रामआश्रय ने अपना मेन्यू आधा कर दिया है और बांद्रा के सोल फ्राई में लंच नहीं मिल रहा है। सोल फ्राई में सैंडविच, सलाद और स्टीम्ड व्यंजन ही मिल रहे हैं। कई होटलों में बोर्ड लग गए हैं कि कम व्यंजन मिलेंगे और गैस की किल्लत के कारण तुरंत गर्म खाना बनाकर नहीं दिया जाएगा।
परेशानहाल केटरर्स और होटल-रेस्तरां मालिकों को इलेक्ट्रिक चूल्हों, डीजल भट्ठियों और कोयला-लकड़ी भट्ठियों पर भी रकम खर्च करनी पड़ रही है। फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया केटरर्स के मध्य प्रदेश जोन के चेयरमैन और जेएमबी केटरर के मालिक अजय जैन ने कहा कि सिलिंडर की जगह इन सब पर खाना बनाया जा सकता है मगर लागत केटरर के साथ ग्राहक को भी सहनी पड़ेगी। कमर्शियल इलेक्ट्रिक चूल्हे 6,000 से 50,000 रुपये तक के पड़ते हैं और ऐसे कई चूल्हे खरीदने होंगे।
दिल्ली में कादिमी केटरर के मालिक पीयूष जैन ने कहा कि केटरिंग के लिए बड़े चूल्हे चाहिए, जिनकी कीमत 1 लाख रुपये से अधिक है। इतने महंगे चूल्हे खरीदने पर बोझ ग्राहकों पर डालना ही पड़ेगा।
दिल्ली-एनसीआर और आसपास के शहरों में छोटे रेस्तरां और ढाबे भी महंगे सिलिंडरों से परेशान हैं। चिराग दिल्ली में ढाबा मालिक और केटरर रवींद्र सिंह रावत ने बताया, ‘दक्षिण दिल्ली में कई गोदाम बंद होने से सिलिंडर मिलना मुश्किल हो गया है। ब्लैक मार्केट से 4,000 से 5,000 रुपये में सिलिंडर खरीदना पड़ रहा है। इसलिए कई केटरर काम बंद कर चुके हैं।’ उनके इलाके में 15 कर्मचारियों वाले कम से कम 3 रेस्तरां बंद हो गए हैं।
छोटे चूल्हे से चलने वाले रेहड़ी पटरी वाले भी आफत में हैं। इसलिए 10 रुपये की चाय और समोसे 15-15 रुपये में मिल रहे हैं। छोले-कुलचे की प्लेट भी 10 रुपये महंगी हो गई है। मुश्किल से 500-1000 रुपये रोजाना कमाने वाले इन रेहड़ी-खोमचे वालों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। मुंबई में वड़ा पाव के 40 फीसदी ठेले गायब हो गए हैं। रेलवे स्टेशन के भीतर स्टॉल इंडक्शन चूल्हे के सहारे चल रहे हैं। अंधेरी में वड़ा पाव का ठेला लगाने वाले जय सिंह कहते हैं कि मुंबई में कोयला और केरोसिन इस्तेमाल नहीं कर सकते और गैस मिल नहीं रही है। ऐसे में काम कहां से किया जाए।
मुंबई में दफ्तरों तक लंच पहुंचाने वाले डब्बा वालों को भी कारोबार चौपट होने का डर सता रहा है। मुंबई डब्बावाला एसोसिएशन के महासचिव सुभाष तलेकर ने बताया कि घरों से टिफिन दफ्तर पहुंचाने के काम पर तो असर नहीं है मगर करीब 30 फीसदी टिफिन कैंटीन या मेस से आते हैं और ये बंद हुईं तो डब्बा वालों का काम भी कम हो जाएगा।
बॉम्बे केटरर्स एसोसिएशन के सचिव सतीश कामत ने बताया कि केटरिंग करने वाले गैस का स्टॉक नहीं रख पाते और जरूरत के मुताबिक ही गैस मंगाते हैं। मुंबई में कोयला भट्ठी पर प्रतिबंध है और महज 2 फीसदी मैरिज और पार्टी हॉल में ही गैस पाइपलाइन है, इसलिए एसोसिएशन के सदस्यों ने 12 मार्च से बुकिंग लेना बंद कर दिया है।
उत्तर प्रदेश में तो हालात इतने विकट हैं कि धार्मिक शहरों अयोध्या, वाराणसी और चित्रकूट में चलने वाले अन्न क्षेत्रों व मंदिरों की रसोई तक में कटौती की जाने लगी है। अयोध्या में राम मंदिर से सटे अमावा मंदिर परिसर में दशकों से चल रही राम रसोई पर भी गैस नहीं होने का असर पड़ रहा है। शुक्रवार से रसोई लकड़ी और कोयले की मदद से चल रही है। वाराणसी में भी अन्न क्षेत्र लकड़ी और कयोले से चल रहे हैं, जिसके कारण नाश्ते आदि की सुविधा में कटौती भी करनी पड़ी है।
किल्लत में सिलिंडरों का नया बाजार भी खड़ा हो गया है। आरएस फार्म, नोएडा में शादी-समारोह संभालने वाली निधि शर्मा कहती हैं, ‘पर्याप्त गैस रखने के लिए केटरर्स को पहले से ज्यादा सिलिंडर खरीदने पड़ रहे हैं और ऊंचे दाम पर लेने पड़ रहे हैं। पहले कमर्शियल गैस सिलिंडर 1,800 रुपये में आ जाता था, लेकिन अब उसके लिए 4,500 से 5,000 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं।’