भारत में दीवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) को 28 मई, 2016 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली, जो देश में बढ़ते फंसे कर्ज संकट से निपटने और अंतहीन कॉर्पोरेट ऋण समाधान के युग को समाप्त करने के मकसद से पेश की गई थी। करीब एक साल बाद 2 अगस्त, 2017 को हैदराबाद की सिनेर्जिस-डोरॉय ऑटोमोटिव लिमिटेड के मामले का समाधान हुआ और यह इस कानून से समाधान पाने वाली पहली कंपनी बन गई। शुरुआत से लेकर राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) द्वारा समाधान योजना की मंजूरी तक की इस कंपनी की पूरी प्रक्रिया 191 दिनों में पूरी हुई।
दस साल बाद डर्टी डजन के साथ ऐतिहासिक सुधार की शुरुआत हुई। इसमें 3.45 लाख करोड़ रुपये के बकाया दावों के साथ 12 सबसे बड़े गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के मामले में 7,102 केस बंद हुए। इनमें से 1,419 केस समाधान योजनाओं के माध्यम से बंद किए गए, जबकि शेष का निपटान वापसी या समीक्षा के साथ हुआ।
एस एंड ए लॉ ऑफिसेज के सीनियर पार्टनर विजय सिंह ने कहा, ‘दस साल पहले भारत की ऋण वसूली व्यवस्था बुनियादी रूप से खराब थी। अदालतें मामलों से पटी पड़ी थीं। प्रक्रियाएं दशकों तक चलती थीं और इन मामलों में ऋणदाताओं ने बहुत कम उम्मीद करना सीख लिया था। उधारकर्ताओं ने स्वेच्छा से व्यवस्था का फायदा उठाया। फिर आईबीसी आया और कुछ समय के लिए इसने बेहतर परिणाम दिए।’
बहरहाल 2017 में हुए पहले समाधान के बाद हर साल समाधान में लगने वाला वक्त बढ़ रहा है। इस प्रक्रिया को अनिवार्य रूप से 330 दिन में पूरा किए जाने की समय सीमा तय की गई है, लेकिन मार्च 2026 तक समय सीमा 744 दिन तक पहुंच गई है।
हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने प्रकाश डाला कि विभिन्न एनसीएलटी पीठों पर 363 आवेदन मंजूरी की प्रतीक्षा में पड़े हैं, जिनमें देरी 48 से 738 दिनों तक है।कुछ मामले तो 4 साल से प्रतीक्षा सूची में हैं। आईबीसी प्रक्रिया में देरी की वजह से संपत्ति के मूल्य में कमी आई है और बाजार की रुचि कम हुई है। यह आईबीसी को लेकर मुख्य शिकायत है। स्वीकार किए गए दावों या परिसमापन मूल्य के हिसाब से समाधान योजनाओं के तहत वसूली में गिरावट आई है।
भारतीय दीवाला और ऋण शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) के पूर्व प्रमुख और दिल्ली के राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के पूर्व मानद प्रोफेसर एमएस साहू ने कहा, ‘परिसमापन मूल्य के सापेक्ष प्राप्ति में लगभग 30 प्रतिशत की गिरावट आई है। कार्यवाही समाप्त करने में देरी की वजह से भारी आर्थिक बोझ बढ़ा है। ऋणदाता सामूहिक रूप से हर साल सिर्फ इसलिए हजारों करोड़ रुपये गंवा रहे हैं क्योंकि प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो रही है।’आईबीबीआई आंकड़ों के अनुसार स्वीकृत दावों के प्रतिशत के रूप में मार्च 2026 तक आईबीसी के तहत प्राप्ति 30.56 प्रतिशत थी, जबकि पिछले साल यह 32.8 प्रतिशत थी। परिसमापन मूल्य के प्रतिशत के रूप में मार्च 2025 तक 170 प्रतिशत से घटकर मार्च 2026 तक 167 प्रतिशत हो गई।
कॉर्पोरेट मामलों का मंत्रालय देरी खत्म करने के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के पीठों में अधिक क्षमता बनाने के लिए जोर दे रहा है। आईबीसी विशेषज्ञ महसूस करते हैं कि आईबीसी को बढ़ावा देने के लिए न्याय प्राधिकरण की क्षमता को मजबूत करना सबसे जरूरी सुधार है। स्थायी समिति की रिपोर्ट के मुताबिक एक अध्यक्ष और 62 सदस्यों के स्वीकृत पदों के मुकाबले 14 फरवरी, 2026 तक एनसीएलटी में सिर्फ 53 लोग पदासीन थे।
एनसीएलटी का गठन मूल रूप से कंपनी अधिनियम के मामलों से निपटने के लिए हुआ था, जो क्षमता वृद्धि के बगैर काम का अतिरिक्त बोझ संभाल रहा है। साहू ने कहा, ‘हमें बेहतर क्षमता वाले सदस्यों की आवश्यकता है, जो अनावश्यक न्यायिक बंधनों से मुक्त हों और जो सांविधिक समय सीमा के भीतर परिणाम देने के लिए प्रतिबद्ध हों। यदि वे कुछ मामलों में समाधान अवधि की समाप्ति पर तुरंत परिसमापन का आदेश देते हैं, तो अनुशासन का वातावरण बन जाएगा।’
आईबीसी की सफलता केवल समाधान किए गए मामलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बड़ी संख्या में मामले आईबीसी तक पहुंचने के पहले ही निपटान किया जाना भी इसकी सफलता है। आईबीसी में आने के पहले 32,179 कंपनियों के 14.61 लाख करोड़ रुपये की कुल राशि समाधान हुआ। भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा विभिन्न माध्यम से कुल 1.04 लाख करोड़ रुपये वसूली में से लगभग 54,528 करोड़ रुपये आईबीसी के माध्यम से आए।