भारत में कनाडा के उच्चायुक्त क्रिस कूटर
भारत में कनाडा के उच्चायुक्त क्रिस कूटर पिछले अगस्त में नई दिल्ली आए थे, जब दोनों देशों के रिश्ते कूटनीतिक तनाव, व्यापार वार्ता रुकने और वाणिज्यिक सेवाओं के ठप होने जैसी समस्याओं से उबर रहे थे। नौ महीनों में स्थिति बदली है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर संकट की आशंकाओं के बीच, कूटर का कहना है कि कनाडा के नए बाजारों की तलाश और भारत की ऊर्जा, पूंजी व तकनीक की जरूरतों ने दोनों देशों के हितों को करीब लाया है। पीरजादा अबरार को दिए गए साक्षात्कार में उन्होंने ऊर्जा बुनियादी ढांचा, यूरेनियम समझौते की स्थिरता, पेंशन निवेश, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और अंतरिक्ष सहयोग जैसे विषयों पर चर्चा की।
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की मार्च 2026 की भारत यात्रा के दौरान 2.6 अरब डॉलर का यूरेनियम समझौता और व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते की रूपरेखा सामने आई। उस वक्त के बाद से भारत-कनाडा संबंधों में क्या बदलाव आया है? क्या यह प्रगति प्रधानमंत्री की यात्राओं पर निर्भर है?
भारत और कनाडा के बीच बहुत संभावनाएं हैं। प्रधानमंत्री कार्नी ने कहा है कि अमेरिका के साथ व्यापारिक अनिश्चितता के कारण कनाडा नए साझेदार खोज रहा है। कनाडा यूरेनियम का दूसरा या तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है और हमारे पास इसका समर्थन करने की तकनीक भी है। इसके अलावा कनाडा में दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल भंडार, एलएनजी और एलपीजी में यह पांचवें पायदान पर है। भारत के साथ इन क्षेत्रों में हमारी कोई साझेदारी नहीं है। इससे भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग पूरी करने में मदद मिल सकती है।
कनाडा अब अमेरिका के बजाय, एशिया और खासकर भारत को ऊर्जा निर्यात बढ़ाने के लिए अपने पश्चिमी तट पर नया बुनियादी ढांचा तैयार कर रहा है। हम रक्षा क्षेत्र में 2025 तक 500 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च करने की योजना बना रहे हैं। हमें सहयोग, खरीद और संयुक्त उद्यम के लिए भारत जैसे साझेदार की जरूरत है। कनाडा की पांच फीसदी आबादी भारतीय मूल की है और वहां लगभग 4 लाख भारतीय छात्र पढ़ते हैं। इसलिए यह रिश्ता केवल प्रधानमंत्रियों की मुलाकातों पर निर्भर नहीं है, बल्कि लंबे समय की मजबूत साझेदारी बन रहा है।
होर्मुज स्ट्रेट को लेकर फिर चिंता बढ़ गई है। ऐसे में कनाडा भारत को कितनी ऊर्जा आपूर्ति और किस समय-सीमा में दे सकता है?
कनाडा के पास पहले से ही पश्चिमी तट तक पाइपलाइन मौजूद है। आने वाले कुछ महीनों में इसके विस्तार के बाद यह रोजाना लगभग 10 लाख बैरल तेल पहुंचाने में सक्षम होगी। कनाडा रोज करीब 60 लाख बैरल तेल उत्पादन करता है, जबकि भारत भी लगभग 60 लाख बैरल तेल प्रतिदिन आयात करता है। कनाडा का लक्ष्य 2030 तक सालाना 5 करोड़ टन एलएनजी निर्यात क्षमता तक पहुंचना है, जिसे आगे बढ़ाकर सालाना 10 करोड़ टन तक किया जा सकता है। भारत अभी हर साल लगभग 5 करोड़ टन एलएनजी आयात करता है। ऐसे में आर्थिक रूप से संभव होने पर इसका बड़ा हिस्सा कनाडा से आ सकता है। इससे भारत को सुरक्षित और भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति का विकल्प मिलेगा।
सीईपीए वार्ता के दूसरे दौर के बाद क्या डेरी, सेवाओं और कृषि क्षेत्र जैसे पुराने विवाद अब भी बड़ी बाधा बने हुए हैं?
नई दिल्ली में हुई दूसरे दौर की वार्ता काफी सकारात्मक रही और ऐसा कोई बड़ा मुद्दा सामने नहीं आया जिसे सुलझाया न जा सके। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने 2026 तक समझौता पूरा करने की प्रतिबद्धता जताई है। उनका मानना है कि तकनीकी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बातचीत सही दिशा में आगे बढ़ रही है और इससे व्यापार, निवेश और लोगों की आवाजाही को बढ़ावा मिलेगा।
क्या 2.6 अरब डॉलर का यूरेनियम समझौता लंबे समय तक टिकाऊ रहेगा? क्या कनाडा भारत की परमाणु क्षमता बढ़ाने में भी सहयोग करेगा?
1974 के पोकरण परीक्षण के बाद का दौर अब पीछे छूट चुका है। कनाडा भारत की स्वच्छ ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए परमाणु सहयोग बढ़ाने के पक्ष में है। कनाडा के पास अनुभवी परमाणु तकनीकी कंपनियों का पूरा तंत्र है। 2015 का द्विपक्षीय समझौता पहले से मौजूद है और अब दोनों देश तकनीकी सहयोग के नए अवसरों पर काम कर सकते हैं।