प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
देश भर में इस बार भीषण गर्मी पड़ने की आशंका है। जाहिर है इससे घर-दफ्तर और सामान को ठंडा रखने की जरूरत भी बढ़ जाएगी, जिसके लिए बड़ी मात्रा में बिजली की जरूरत होगी। इस वजह से देश में बिजली की चरम मांग इस साल 270 गीगावॉट का नया रिकॉर्ड बना सकती है। इससे पहले मई 2024 में सबसे ज्यादा 250 गीगावॉट बिजली की जरूरत पड़ी थी। उस महीने मांग के मुताबिक बिजली मिल गई थी और इस बार बिजली की बढ़ी मांग कोयले के भारी भंडार तथा नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ती हिस्सेदारी को देखते हुए और भी आसानी से पूरी हो सकती है।
सरकारी कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड की खदानों में कोयले का भंडार 18 मार्च, 2026 को बढ़कर लगभग 12.55 करोड़ टन हो गया, जो 1 अप्रैल, 2025 को यह 10.68 करोड़ टन था। दूसरी सरकारी कंपनी सिंगरेनी कोलियरीज कंपनी के पास अभी लगभग 57.5 लाख टन कोयले का भंडार है। इसके अतिरिक्त वाणिज्यिक खदानों में 1.57 करोड़ टन कोयला पड़ा है। लगभग 1.2 करोड़ टन कोयला ढोया जा रहा है और 54.9 लाख टन बंदरगाहों पर है। बिजली संयंत्रों के पास भी 29 मार्च 2026 को 5 करोड़ टन से अधिक कोयला मौजूद था, जो खपत की वर्तमान दर पर लगभग 23 दिन के लिए पर्याप्त है।
सुरक्षा पर मंत्रिमंडलीय समिति ने पिछले महीने ही ऐलान किया कि सभी बिजली संयंत्रों में कोयले की पर्याप्त आपूर्ति होने के कारण देश में बिजली की कमी नहीं होगी। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली यह समिति बिजली और उर्वरक क्षेत्रों की स्थिति के साथ-साथ कच्चे तेल, गैस और अन्य ईंधनों की उपलब्धता की समीक्षा कर रही थी। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण आजकल अधिकतर एशियाई देश तेल और गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए जूझ रहे हैं।
इस बीच केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) के अध्यक्ष घनश्याम प्रसाद को भरोसा है कि पश्चिम एशिया संकट के बावजूद बिजली की बढ़ती मांग पूरी हो जाएगी। उन्होंने कहा, ‘गैस से बिजली बनाने वाले संयंत्रों का इस्तेमाल बहुत कम होता है, इसलिए पश्चिम एशिया संघर्ष का ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। क्षमता में नए इजाफे से इसकी भरपाई हो जाएगी। इस साल 50,000 मेगावॉट से अधिक क्षमता वाले कई बिजली संयंत्र जोड़े गए हैं।’
भारत ने 1 अप्रैल, 2025 से 31 जनवरी, 2026 तक सभी स्रोतों से रिकॉर्ड 52.5 गीगावॉट बिजली उत्पादन क्षमता जोड़ी, जिसमें 39 गीगावॉट से अधिक योगदान नवीकरणीय ऊर्जा का रहा। देश में 520 गीगावॉट की कुल स्थापित क्षमता में अब 50 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी गैर-जीवाश्म स्रोतों की है। सीईए और राष्ट्रीय विद्युत पोर्टल से जुटाए गए आंकडे बताते हैं कि जनवरी 2026 तक बनी कुल बिजली में सौर, पवन, लघु जलविद्युत और जैवविद्युत सहित नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का योगदान 16.64 फीसदी था। परमाणु और वृहद जलविद्युत को शामिल करने पर यह हिस्सा बढ़कर 29.4 फीसदी हो जाता है।
मूडीज से संबद्ध इक्रा ईएसजी रेटिंग्स के एक हालिया अध्ययन के अनुसार ऊर्जा की खपत करने वाली बिजली की मशीनें इस्तेमाल कर भारत से होने वाले निर्यात में खासा योगदान करने वाले देश के परिधान कारखाने बिजली की अपनी 28 फीसदी जरूरत अब नवीकरणीय स्रोतों से पूरी करते हैं।
डेलॉयट इंडिया के पार्टनर अनुजेश द्विवेदी ने कहा, ‘देश 2026 की गर्मियों में अनुमानित चरम मांग को पूरा करने के लिए अच्छी स्थिति में है।’ उन्होंने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा की बड़ी क्षमता के अलावा स्थापित उत्पादन क्षमता में 10,241 मेगावॉट बिजली कोयले से तैयार करने वाले ताप विद्युत संयंत्र हैं। इसी तरह 600 मेगावॉट परमाणु विद्युत संयंत्र और 4,236 मेगावॉट की बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं शामिल हैं, जो उन घंटों में चरम मांग पूरी करेंगी, जब सौर ऊर्जा नहीं मिलती है।
इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकनॉमिक्स ऐंड फाइनैंशियल एनालिसिस (रीफा) की ऊर्जा विश्लेषक (दक्षिण एशिया) तान्या राणा ने कहा, ‘भारत की बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता, विश्वसनीय पारंपरिक उत्पादन और तेजी से सक्रिय हो रहे अल्पकालिक बिजली बाजार से देश को चरम मांग अच्छी तरह संभालने में मदद मिलती है।’
बाजार और विनियमन अल्पकालिक बिजली बाजार के कारण मांग में अचानक बढ़ोतरी को पूरा करने में मदद मिल जाती है। विचलन निपटान तंत्र सहित कुल अल्पकालिक सौदे वित्त वर्ष 2010 में 66 अरब यूनिट के थे, जो वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 238 अरब यूनिट हो गए। इस दौरान कुल तैयार बिजली की 8.9 फीसदी से 13.03 फीसदी तक मात्रा अल्पकालिक सौदों में शामिल रही।
सरकार ने बिजली की ज्यादा मांग वाला मौसम शुरू होने से पहले ही शाम के समय का पीक लोड संभालने के लिए आयातित कोयला मिलाने गैस से बिजली उत्पादन शुरू करने के आदेश दिए हैं। रॉयटर्स की एक खबर के मुताबिक पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण गैस आपूर्ति प्रभावित होने के कारण भारत आपातकालीन प्रावधान लागू करने पर भी विचार कर रहा है, जिनके बाद आयातित कोयला इस्तेमाल करने वाले ताप बिजली संयंत्रों को गर्मी से पहले अधिकतम उत्पादन करना पड़ेगा।
यह बात अलग है कि मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों में जीवाश्म ईंधन की आपूर्ति चरमराने का खतरा है। तान्या ने आगाह करते हुए कहा, ‘भू-राजनीतिक तनाव या परिचालन संबंधी बाधाओं के कारण कोयला, तेल या गैस की आपूर्ति में व्यवधान हो सकता है, जिसका असर पारंपरिक बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है।’ विशेषज्ञों का कहना है कि उपलब्ध ताप ऊर्जा संयंत्रों का अधिकतम उपयोग किया जाए तो गैस से बिजली बनाने वाले कारखानों की कमी से कोई चिंता नहीं होगी।
पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (पीएचडीसीसीआई) के अध्यक्ष राजीव जुनेजा ने कहा, ‘आगामी सीजन के लिए देश की ऊर्जा आपूर्ति आयात पर निर्भरता से काफी हद तक मुक्त है। भारत के पास आगामी महीनों की बिजली आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त कोयले का भंडार है।’
लेकिन गर्मी के मौसम में बिजली की चरम मांग को पूरा करने में अन्य चुनौतियां भी बनी हुई हैं। उदाहरण के लिए इस साल कोयला आयात घटा है। बी2बी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म एमजंक्शन सर्विसेज पर मौजूद आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2026 में अप्रैल से जनवरी के बीच कोकिंग कोयले को छोड़कर कोयले की दूसरी किस्मों का आयात 12.78 करोड़ टन ही रहा, जो उससे पिछले साल के अप्रैल-जनवरी में 14.19 करोड़ टन था।
इस दौरान कोयले का कुल आयात 4.2 फीसदी घटकर 21.31 करोड़ टन रह गया। एमजंक्शन का कहना है कि ढुलाई की बढ़ती कीमतों के कारण आयात कम ही बना रह सकता है। भारत को गैर-जीवाश्म स्रोतों के लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क से संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन घट रहा है। इससे अधिक मांग वाले क्षेत्रों में बिजली की असली उपलब्धता कम हो जाती है।
मांग के पैटर्न और बिजली की उपलब्धता के बीच बढ़ता असंतुलन भी समस्या है। आम तौर पर दोपहर और शाम को ही बिजली की ज्यादा मांग होती है, जिसे पूरा करना मुश्किल होता है क्योंकि दोपहर के बाद सौर ऊर्जा उत्पादन एकदम घट जाता है। तान्या ने कहा, ‘भारत में दो वक्त की चरम मांग तेजी से बढ़ रही है। शाम को खास तौर पर चुनौती हो जाती है क्योंकि सौर ऊर्जा उत्पादन एकाएक गिर जाता है और उसी वक्त कूलिंग के लिए बिजली की ज्यादा जरूरत होती है। इस कारण कोयला और पानी से बन रही बिजली पर दबाव बढ़ जाता है।’
ऐसे में स्मार्ट मीटरिंग और ऊर्जा भंडारण की कम क्षमता के कारण ग्रिड की अचानक बढ़ती मांग फौरन पूरी करना मुश्किल हो जाता है। भीषण गर्मी हुई तो मांग अप्रत्याशित रूप से और बढ़ सकती है, जिसके कुछ देर के लिए ग्रिड पर बोझ बहुत बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है। इस वर्ष अल नीनो प्रभाव के कारण गर्मी अधिक रहने की संभावना है। अल नीनो मई और जुलाई के बीच तीव्र हो सकता है और भारत को ठंडा रखने के लिए जरूरी मॉनसून में इससे खलल पड़ सकता है। मॉनसून कमजोर रहा तो जलविद्युत उत्पादन भी प्रभावित होगा।
हालांकि भारत के पास राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त क्षमता है, लेकिन मांग प्रबंधन, वितरण और ग्रिड की तैयारी का जिम्मा राज्यों का है। इसलिए राज्य चरम मांग को कारगर तरीके से पूरा करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। तान्या ने कहा, ‘चरम मांग को संभालने के लिए राज्यों को ऊर्जा भंडारण और हरित हाइड्रोजन का इस्तेमाल तेज करना होगा। साथ ही उन्हें मांग को ठीक से संभालने और खपत का तालमेल नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन के साथ अच्छी तरह करने की जरूरत होगी ताकि शाम के समय और अधिक गर्मी के समय मांग पूरी हो सके।’
एक समस्या तेजी से खुलते नए कारखाने भी हैं, जिनके कारण बिजली की मांग बढ़ सकती है। साथ ही बिजली की अधिक खपत करने वाले डेटा केंद्र बढ़ने और सड़कों पर इलेक्ट्रिक वाहनों की तादाद बढ़ने से मांग और भी ज्यादा हो सकती है। देखना होगा कि मौजूदा उत्पादन क्षमता के साथ इन सबकी मांग पूरी हो पाएगी या नहीं।