ईरान युद्ध के तीसरे सप्ताह में पहुंचने के साथ ही भारतीय उद्योग जगत पर उसके आर्थिक प्रभाव दिखने लगे हैं। निर्यात में व्यवधान, आपूर्ति श्रृंखला में समस्या और गैस आपूर्ति में कमी का असर विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में महसूस किया जा रहा है। उत्पादन के मोर्चे पर उद्योग जगत 5 और 9 मार्च को जारी पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के आदेशों से जूझ रहा है। इसके तहत मंत्रालय ने रिफाइनरियों को एलपीजी का उत्पादन अधिक से अधिक करने और परिवारों एवं आवश्यक सेवाओं को आपूर्ति में प्राथमिकता देने का निर्देश दिया है। इससे वाणिज्यिक एवं औद्योगिक उपयोग के लिए आपूर्ति प्राथमिकता सूची में नीचे चले गए हैं। इससे सभी क्षेत्रों में कामकाज प्रभावित होने का खतरा पैदा हो गया है।
भारत का वाहन उद्योग पिछले साल माल एवं सेवा कर (जीएसटी) की दरों में बदलाव के बाद दमदार मांग की लहर पर सवार था। मगर अधिकारियों ने कहा कि वाहन उद्योग अब रुकावटों के लिए तैयार हो रहा है।
वाहन विनिर्माता और वाहन कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियां एलपीजी, पीएनजी और प्रोपेन की उपलब्धता के बारे में चिंतित हैं। इनका इस्तेमाल वाहन एवं कलपुर्जे बनाने वाले कारखानों में फोर्जिंग, कास्टिंग, हीट ट्रीटमेंट, वेल्डिंग और पेंट क्योरिंग जैसी प्रक्रियाओं के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है।
वाहन विनिर्माताओं के संगठन सायम ने 9 मार्च को पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय को एक पत्र लिखकर एलपीजी, पीएनजी और प्रोपेन की उपलब्धता एवं आपूर्ति की स्थिति के बारे में स्पष्टता मांगी थी ताकि वाहन निर्माता उत्पादन की योजना बनाने और संभावित व्यवधान से निपटने में मदद मिल सके।
भारी उद्योग मंत्रालय को लिखे एक अन्य पत्र में वाहन कलपुर्जा विनिर्माताओं के संगठन एक्मा ने आगाह किया था कि एलपीजी और पीएनजी की उपलब्धता में आ रही रुकावटें उत्पादन कार्यक्रमों पर असर डाल सकती हैं। उन्होंने कहा था कि खास तौर पर फोर्जिंग और फाउंड्री जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली एमएसएमई इकाइयां इससे अधिक प्रभावित होंगी क्योंकि उनके पास तत्काल किसी अन्य ईंधन के इस्तेमाल की गुंजाइश काफी कम होती है।
धातु क्षेत्र में व्यवधान के शुरुआती संकेत अभी से दिखने लगे हैं। जिंदल स्टेनलेस के प्रबंध निदेशक अभ्युदय जिंदल ने शुक्रवार को एक बयान में कहा था, ‘स्टेनलेस स्टील का उत्पादन प्रोपेन/एलपीजी और प्राकृतिक गैस जैसे औद्योगिक ईंधन पर काफी निर्भर है। इसलिए आपूर्ति किल्लत का हमारे कारखानों पर बुरा असर पड़ा है।’ उन्होंने कहा कि ईंधन की उपलब्धता में आ रही रुकावटों के मद्देनजर उनकी कंपनी के कारखाने कम क्षमता पर काम कर रहे हैं।
इंडियन स्टेनलेस स्टील डेवलपमेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष राजामणि कृष्णमूर्ति ने कहा, ‘स्टेनलेस स्टील उद्योग को अस्तित्व के संकट जैसी ऊर्जा समस्या का सामना कर रहा है, क्योंकि प्रोपेन और एलपीजी की आपूर्ति में व्यवधान ने उत्तरी और पूर्वी भारत में मौजूद स्टेनलेस स्टील कारखानों को बुरी तरह प्रभावित किया है।’
कृष्णमूर्ति ने कहा, ‘हमारे सदस्य लगातार चलने वाले कारखानों का संचालन करते हैं। ऐसे में ईंधन आपूर्ति में किसी भी व्यवधान से न केवल उत्पादन रुक जाता है बल्कि भट्ठियों को हमेशा के लिए नुकसान होने और घरेलू आपूर्ति श्रृंखला के महीनों तक ठप पड़ जाने का भी खतरा बना रहता है।’ एसोसिएशन ने सरकार से अनुरोध किया है कि वह ईंधन आवंटन के मामले में स्टेनलेस स्टील को प्राथमिकता वाला क्षेत्र माना जाए। व्यापक इस्पात उद्योग में भी उत्पादकों ने ईंधन की आपूर्ति में व्यवधान के बारे में चिंता जताई है।
एक इस्पात कंपनी के अधिकारी ने अपनी पहचान जाहिर न करने की शर्त पर कहा, ‘कंपनियों को अपने मुख्य कारखाने से बाहर वाली इकाइयों में डाउनस्ट्रीम संचालन में विभिन्न स्तरों पर रुकावटों का सामना करना पड़ रहा है।’ जानकारों के मुताबिक, इस्पात क्षेत्र की कंपनियों पर इसका प्रभाव अलग-अलग दिखेगा जो इस्पात बनाने की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। छोटी कंपनियों पर इसका अधिक प्रभाव दिख सकता है। प्राथमिक इस्पात बनाने वाली एक कंपनी ने बताया कि एलएनजी एवं एलपीजी की उपलब्धता से लेकर चूना पत्थर की सोर्सिंग तक कई मोर्चों पर चुनौतियां सामने आ रही हैं। उन्होंने कहा, ‘हम घरेलू आपूर्ति और चूना पत्थर के अन्य स्रोतों से काम चलाने की कोशिश कर रहे हैं।’
हालांकि शुक्रवार को गुजरात ने औद्योगिक गैस के इस्तेमाल की सीमा 50 फीसदी से बढ़ाकर 80 फीसदी कर दी जिससे उद्योग को कुछ राहत मिली। एक कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने अपनी पहचान जाहिर न करने की शर्त पर कहा कि गुजरात में खाने-पीने की चीजों का उत्पादन थोड़ा आसान हो गया है, क्योंकि सरकार ने शुक्रवार को एक नया परिपत्र जारी कर औद्योगिक गैस के इस्तेमाल की सीमा बढ़ा दी है। रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुएं (एफएमसीजी) बनाने वाली प्रमुख कंपनी ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज ने स्टॉक एक्सचेंज को बताया है कि औद्योगिक गैस की आपूर्ति कम होने से उसके कारखानों में कोई बड़ी रुकावट नहीं आई है।
युद्ध की कीमत को कई तरह से महसूस की जा रही है। भारतीय विनिर्माता पश्चिम एशिया से प्रमुख कच्चा माल भी मंगाते हैं। उदाहरण के लिए, 2024-25 में खाड़ी क्षेत्र से लगभग 1.25 अरब डॉलर मूल्य के पॉलिएथिलीन पॉलीमर आए थे। पश्चिम एशिया सीमेंट और इस्पात विनिर्माताओं के लिए चूना पत्थर, धातुओं और तांबे के तार भी आपूर्ति करता है। होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के कारण मार्ग में बदलाव होने से कच्चे माल के आयात में देरी हो रही है। ऐसे में कई विनिर्माण कंपनियां चुनौतियों से जूझ रही हैं। इससे उनके मुनाफे पर असर पड़ने की आशंका है।
एक्मा ने कहा कि शिपिंग के मार्ग में बदलाव और भीड़भाड़ के कारण वाहन कलपुर्जा निर्यातकों के लिए लॉजिस्टिक्स लागत 20 से 40 फीसदी तक बढ़ गई है। साथ ही निर्यात में लगने वाला समय भी दो से चार सप्ताह बढ़ गया है। इसके अलावा वाहन कलपुर्जे में इस्तेमाल होने वाले रसायन, सिंथेटिक रबर और पेट्रोकेमिकल इनपुट जैसे प्रमुख कच्चे माल के आयात में भी देरी हो रही है। हैदराबाद की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी कंपनी ईटीओ मोटर्स के कार्यकारी निदेशक सुरेंद्र नाथ ने कहा कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और व्यापक वाहन क्षेत्र में पेट्रोकेमिकल एवं एल्युमीनियम की बढ़ती कीमतें इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) के पुर्जों और सामग्रियों की लागत बढ़ा सकती हैं।
इससे निपटने के लिए कंपनियां घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने और मॉड्यूलर वाहन प्लेटफॉर्म को अपनाने पर अधिक ध्यान दे रही हैं। इससे लागत को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। चीनी क्षेत्र पर पश्चिम एशिया संकट का सीधा असर नहीं पड़ा है, लेकिन कई कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी होने के कारण उत्पादन लागत बढ़ गई है। सल्फर इस क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाला एक प्रमुख रसायन है। कच्चे चीनी को खाने योग्य सफेद चीनी में बदलने की सल्फराइजेशन प्रक्रिया में इसका इस्तेमाल होता है।
इसके अलावा चीनी की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाले लो-डेंसिटी पॉलिएथिलीन (एलडीपीई) और हाई-डेंसिटी पॉलिएथिलीन (एचडीपीई) बैग की लागत संकट शुरू होने के बाद 4 रुपये प्रति किलोग्राम से अधिक बढ़ गई है। एलडीपीई और एचडीपीई दोनों तरह के बैग में कच्चे माल के तौर पर पेट्रोकेमिकल्स का इस्तेमाल होता है। युद्ध के कारण गैस आपूर्ति में किल्लत के मद्देनजर घरेलू उर्वरक क्षेत्र को अपने वार्षिक रखरखाव कार्यक्रम को पहले ही पूरा करना पड़ा है। सरकारी अनुमानों के अनुसार, भारत के पास फिलहाल करीब 36 फीसदी जरूरत को पूरा करने लायक उर्वरक का भंडार है। खरीफ बोआई का मुख्य मौसम अभी कुछ सप्ताह दूर है। ऐसे में यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो आपूर्ति किल्लत के कारण परेशानी शुरू हो सकतीहै।
एक निर्यातक ने बताया कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण भारत को सीधे तौर पर होने वाले निर्यात में रोजाना 19 से 20 करोड़ डॉलर का नुकसान हो सकता है। इससे पश्चिम एशिया उत्तरी अफ्रीका (डब्ल्यूएएनए) क्षेत्र के देशों के साथ व्यापार में कुल नुकसान 3 अरब डॉलर तक पहुंचने की आशंका है। साल 2024-25 में भारत के कुल 433.56 अरब डॉलर के वस्तु निर्यात में डब्ल्यूएएनए का योगदान 71.24 अरब डॉलर था।
इंजीनियरिंग वस्तु जैसे प्रमुख विनिर्माण क्षेत्र में इसका काफी असर महसूस किया जा रहा है। देश के निर्यात में इस क्षेत्र का रोजाना योगदान करीब 5.3 करोड़ डॉलर का है। इसके अलावा छोटी इकाइयों, रिफाइनिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, रत्न एवं आभूषण और रेडीमेड परिधान पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है।
तिरुपुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष केएम सुब्रमण्यन के अनुसार, यह नुकसान सीधे निर्यात से कहीं ज्यादा है क्योंकि अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका को माल भेजने के लिए दुबई एक महत्त्वपूर्ण केंद्र के रूप में का काम करता है। उन्होंने कहा, ‘कार्गो को अन्य रास्तों पर मोड़ने के कारण लागत में करीब चार गुना वृद्धि दिख रही है। प्रति कंटेनर लागत पहले करीब 1,500 डॉलर होती थी जो अब तीन से चार गुना बढ़ गई है। इसके अलावा पूरे पश्चिम एशिया और अफ्रीका क्षेत्र में निर्यात पूरी तरह ठप हो चुका है।’
सुब्रमण्यन ने कहा, ‘हमारे लिए यूएई तीसरा सबसे बड़ा बाजार है जिसका कुल बिक्री में करीब 9 फीसदी हिस्सेदारी है। पूरे क्षेत्र में निर्यात के रुक जाने से हमारी विनिर्माण इकाइयों के भविष्य पर असर पड़ने लगा है।’