भारत

7 साल बाद ईरान से क्रूड ऑयल लेकर भारत आ रहा तेल टैंकर ऐन वक्त पर चीन की ओर क्यों मुड़ा?

शिप-ट्रैकिंग डेटा और केपलर (Kpler) की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2002 में बने इस अफ्रामैक्स (Aframax) तेल टैंकर पर करीब 6 लाख बैरल ईरानी कच्चा तेल लदा है

Published by
ऋषभ राज   
Last Updated- April 03, 2026 | 5:21 PM IST

ईरान से भारत आ रहे एक तेल टैंकर के अचानक रास्ता बदलने से ऊर्जा जगत में हलचल मच गई है। अमेरिकी प्रतिबंधों की सूची में शामिल ‘पिंग शुन’ (Ping Shun) नाम का यह जहाज पहले गुजरात के वाडिनार बंदरगाह की ओर बढ़ रहा था, लेकिन एन वक्त पर इसने अपनी दिशा बदल दी। अब यह जहाज चीन के डोंगयिंग की ओर जा रहा है। अगर यह जहाज गुजरात पहुंचता, तो यह लगभग सात साल में ईरान से भारत आने वाली कच्चे तेल की पहली खेप होती।

शिप-ट्रैकिंग डेटा और केपलर (Kpler) की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2002 में बने इस अफ्रामैक्स (Aframax) जहाज पर करीब 6 लाख बैरल ईरानी कच्चा तेल लदा है। अमेरिका ने इसी साल यानी 2025 में इस टैंकर पर प्रतिबंध लगाए थे। दिलचस्प बात यह है कि पिछले तीन दिनों से यह जहाज वाडिनार को ही अपनी मंजिल बता रहा था, लेकिन भारतीय तट के करीब पहुंचते ही इसके सिग्नल बदल गए।

पैसों के लेनदेन पर फंसा मामला?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस अचानक हुए बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह भुगतान की शर्तें हो सकती हैं। न्यूज वेबसाइट इंडिया टूडे की रिपोर्ट के मुताबिक, केपलर के प्रमुख शोध विश्लेषक सुमित रितोलिया कहते हैं कि ईरानी तेल के व्यापार में अब खेल बदल रहा है। पहले जहां खरीदारों को 30 से 60 दिनों की उधारी (क्रेडिट विंडो) मिल जाती थी, अब बेचने वाले तुरंत पेमेंट या बहुत कम समय में सेटलमेंट की मांग कर रहे हैं। मुमकिन है कि पेमेंट को लेकर बात न बनने की वजह से ही कार्गो का रुख चीन की ओर मोड़ दिया गया हो।

Also Read: पश्चिम एशिया तनाव के बीच भारत पर बढ़ी जिम्मेदारी, मालदीव ने मांगा तेल; सरकार कर रही विचार

हालांकि, समुद्री नियमों के तहत जहाजों के लिए इस्तेमाल होने वाला ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) हमेशा अंतिम सच नहीं होता। कैप्टन सफर के दौरान किसी भी समय गंतव्य की जानकारी बदल सकता है। ऐसे में जानकारों का यह भी कहना है कि अगर खरीदार और विक्रेता के बीच पैसों का मामला सुलझ जाता है, तो यह जहाज वापस भारत की ओर भी मुड़ सकता है।

भारत के लिए क्यों अहम है यह खेप?

भारत ने साल 2019 से ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया था। उस वक्त ट्रंप प्रशासन ने कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे, जिसके बाद भारत ने अमेरिका, मिडिल ईस्ट और अन्य देशों से अपनी जरूरतें पूरी करनी शुरू कीं। एक समय ऐसा था जब भारत की कुल तेल जरूरतों का 11.5 प्रतिशत हिस्सा ईरान से आता था। 2018 में भारत रोजाना 5.18 लाख बैरल ईरानी तेल खरीद रहा था।

हाल ही में, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और तेल की आसमान छूती कीमतों को देखते हुए वाशिंगटन ने ईरानी तेल की खरीद पर 30 दिनों की विशेष छूट दी थी। यह छूट 19 अप्रैल को खत्म होने वाली है। इसी मौके का फायदा उठाकर भारतीय रिफाइनरियां समुद्र में मौजूद ईरानी तेल के कार्गो खरीदने की संभावनाएं तलाश रही हैं। यह जहाज पहले वाडिनार बंदरगाह आने वाला था, वहां रोसनेफ्ट समर्थित नायरा एनर्जी की बड़ी रिफाइनरी है।

भारत सरकार का रुख साफ है कि ईरान से तेल खरीदने का फैसला पूरी तरह ‘टेक्नो-कमर्शियल’ पहलुओं पर निर्भर करेगा। यानी अगर डील सस्ती और फायदेमंद होगी और जोखिम भी कम रहेगा, तभी आगे बढ़ा जाएगा। फिलहाल, पिंग शुन जहाज के रास्ता बदलने से यह साफ हो गया है कि ईरान के साथ तेल का व्यापार अब सिर्फ लॉजिस्टिक्स का मामला नहीं रह गया है, बल्कि इसमें पैसों की शर्तें और अंतरराष्ट्रीय जोखिम भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

First Published : April 3, 2026 | 5:21 PM IST