Monsoon 2026: इस साल प्रशांत महासागर में एल नीनो के असर के मजबूत होने के संकेत मिल रहे हैं, जिससे भारत के मानसून को लेकर चिंता बढ़ गई है। मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक अगर अप्रैल का अनुमान सही रहता है, तो 2026 में देश में सामान्य से कम बारिश हो सकती है। अनुमान है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून लंबी अवधि के औसत यानी LPA का करीब 92 फीसदी रह सकता है। अगर ऐसा होता है तो यह 2023 के बाद पहला मौका होगा जब मानसून सामान्य से नीचे रहेगा।
मौसम विभाग ने यह भी कहा है कि देश के ज्यादातर हिस्सों में कम बारिश हो सकती है। हालांकि पूर्वोत्तर, उत्तर-पश्चिम और दक्षिणी प्रायद्वीप के कुछ इलाकों में हालात थोड़े बेहतर रह सकते हैं।
निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट ने भी इसी तरह का अनुमान जताया है। स्काईमेट के मुताबिक जून से सितंबर के बीच होने वाली बारिश LPA का करीब 94 फीसदी रह सकती है, जिसमें 5 फीसदी का अंतर संभव है।
भले ही यह कमी आंकड़ों में बहुत बड़ी न दिखे, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि थोड़ी सी कमी भी बड़ा असर डाल सकती है, खासकर तब जब बारिश का वितरण असमान हो। कहीं ज्यादा और कहीं कम बारिश होने से हालात और बिगड़ सकते हैं।
भारत पहले से ही पानी की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में अगर मानसून कमजोर रहता है, तो इसका सीधा असर खेती पर पड़ेगा और पीने के पानी की समस्या भी बढ़ सकती है। इससे देश की जल सुरक्षा पर दबाव और बढ़ने की आशंका है।
Monsoon बना जीवनरेखा, लेकिन बढ़ती चुनौतियां चिंता बढ़ा रहीं
भारत में खेती का बड़ा हिस्सा अब भी मानसून पर निर्भर है। देश की करीब 45 फीसदी वर्षा आधारित कृषि पूरी तरह बारिश के समय और उसकी मात्रा पर टिकी है। अगर मानसून सही समय पर और पर्याप्त नहीं होता, तो फसलों पर सीधा असर पड़ता है।
नीति आयोग के 2019 के कॉम्पोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स के मुताबिक, देश के लगभग 74 फीसदी गेहूं उगाने वाले इलाके और 65 फीसदी धान उत्पादन क्षेत्र पहले से ही पानी की कमी का सामना कर रहे हैं। आने वाले समय में यह संकट और गहरा सकता है। अनुमान है कि 2030 तक खेती के लिए पानी की मांग और उपलब्धता के बीच 570 अरब घन मीटर का अंतर हो सकता है।
सिंचाई के लिए देश में सबसे ज्यादा भरोसा भूजल पर है, जो कुल जरूरत का करीब 62 फीसदी पूरा करता है। लेकिन आधे से ज्यादा इलाकों में भूजल का स्तर लगातार गिर रहा है, जो एक गंभीर असंतुलन की ओर इशारा करता है।
जल संरक्षण विशेषज्ञ राजेंद्र सिंह का कहना है कि मानसून हमारे जल तंत्र की जान है। अगर मानसून कमजोर रहता है तो इसका सीधा असर फसलों और लोगों की जिंदगी पर पड़ता है। उनका मानना है कि व्यावसायिक फसलों और उद्योगों की ओर बढ़ते रुझान ने देश को मानसून पर और ज्यादा निर्भर बना दिया है।
वहीं, दक्षिण एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल से जुड़े हिमांशु ठक्कर का कहना है कि अगर बारिश कम हुई और तापमान ज्यादा रहा, तो हालात और मुश्किल हो सकते हैं। ज्यादा गर्मी से पानी का वाष्पीकरण बढ़ेगा और कम बारिश के साथ यह स्थिति खेती पर अतिरिक्त दबाव डालेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ कुल बारिश ही नहीं, बल्कि उसका सही समय पर और सही तरीके से होना ज्यादा जरूरी है। अगर फसलों के अहम चरणों जैसे शुरुआती बढ़त या फूल आने के समय बारिश कम होती है, तो नुकसान ज्यादा होता है।
फिलहाल देश के जलाशयों में पानी की स्थिति कुछ राहत देती दिख रही है, लेकिन यह भी तेजी से घट रही है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, 9 अप्रैल 2026 तक देश के 166 बड़े जलाशयों में 82.07 अरब घन मीटर पानी था, जो कुल क्षमता का करीब 44.7 फीसदी है। यह पिछले साल और 10 साल के औसत से ज्यादा जरूर है, लेकिन बीते कुछ महीनों में इसमें तेज गिरावट आई है।
जनवरी के अंत में जहां जलाशयों में करीब 68.8 फीसदी पानी था, वहीं अप्रैल की शुरुआत तक यह घटकर 46 फीसदी के आसपास आ गया और अब और कम हो रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि 2025 के अच्छे मानसून की वजह से अभी पानी का स्तर ठीक है, लेकिन अगर प्री-मानसून बारिश कमजोर रहती है और इस साल मानसून भी उम्मीद से कम रहा, तो यह राहत ज्यादा दिन नहीं टिकेगी।
बारिश में बदलाव से भूजल पर बढ़ा संकट, कई राज्यों में स्थिति चिंताजनक
देश में पानी का संकट सिर्फ कम बारिश की वजह से नहीं, बल्कि जमीन के नीचे पानी भरने की प्राकृतिक प्रक्रिया कमजोर होने से भी गहराता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब बारिश का पैटर्न बदल गया है। पहले जहां हल्की और लगातार बारिश होती थी, अब उसकी जगह कम समय में तेज बारिश हो रही है। इससे पानी जमीन में समाने के बजाय बह जाता है और भूजल का स्तर नहीं बढ़ पाता।
विशेषज्ञ सिंह के मुताबिक, पहले हर गांव में तालाब और झील जैसे जल स्रोत होते थे, जो पानी को जमा करके जमीन के भीतर पहुंचाने में मदद करते थे। लेकिन बढ़ती जरूरतों के हिसाब से ऐसे जल भंडारण ढांचे नहीं बनाए गए। इसका नतीजा यह है कि एक तरफ सूखे की स्थिति बनती है, तो दूसरी तरफ बाढ़ का खतरा भी बढ़ जाता है।
कम बारिश के चलते अब खेती और घरेलू जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भरता और बढ़ रही है। जबकि पानी का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। विशेषज्ञ थक्कार कहते हैं कि देश में ज्यादातर इस्तेमाल होने वाला पानी भूजल ही है और यही हमारी सबसे बड़ी जीवनरेखा है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, देश में निकाले जाने वाले कुल भूजल का करीब 87 प्रतिशत खेती में इस्तेमाल होता है, जबकि करीब 11 प्रतिशत घरेलू जरूरतों में जाता है।
2025 के आकलन के मुताबिक, देश में हर साल 448.52 अरब घन मीटर भूजल रिचार्ज होता है, जिसमें से 407.75 अरब घन मीटर उपयोग के लिए उपलब्ध है। इसी दौरान कुल 247.22 अरब घन मीटर पानी निकाला गया, जो कुल क्षमता का करीब 60.63 प्रतिशत है।
हालांकि कुल आंकड़े संतुलित दिखते हैं, लेकिन जमीन पर स्थिति काफी असमान है। देश के 6,762 आकलन क्षेत्रों में से 730 क्षेत्र ऐसे हैं जहां पानी का दोहन रिचार्ज से ज्यादा हो चुका है। 201 क्षेत्र ‘क्रिटिकल’ और 758 ‘सेमी-क्रिटिकल’ श्रेणी में हैं। वहीं 4,946 क्षेत्र अभी सुरक्षित माने गए हैं। इसके अलावा 127 क्षेत्रों में पानी खारा हो चुका है।
दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्यों में हालात ज्यादा गंभीर हैं, जहां एक चौथाई से ज्यादा इलाके ओवरएक्सप्लॉइटेड या क्रिटिकल श्रेणी में आ चुके हैं। इससे आने वाले समय में पानी का संकट और गहराने की आशंका है।
देश में अच्छी बारिश होना राहत की बात है, लेकिन सिर्फ बारिश से काम नहीं चलता. असली सवाल यह है कि कितना पानी जमीन के नीचे पहुंचकर भूजल को बढ़ा पा रहा है।
भारत में सालाना बारिश का 75 फीसदी हिस्सा सिर्फ चार महीनों यानी जून से सितंबर के बीच होता है. इससे पानी का संतुलन बिगड़ जाता है। बारिश के दिनों में पानी ज्यादा होता है, लेकिन बाकी समय में कमी महसूस होती है. यही वजह है कि बारिश के पानी को सहेजना बेहद जरूरी हो जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बड़ी मात्रा में बारिश का पानी बिना इस्तेमाल के बह जाता है. इसे देश का बड़ा नुकसान माना जा रहा है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक, कुल भूजल रिचार्ज में करीब 60 फीसदी हिस्सा सिर्फ बारिश से आता है. इसमें भी 54.7 फीसदी रिचार्ज मानसून के दौरान होता है, जबकि सिर्फ 5.3 फीसदी गैर-मानसून समय में होता है। बाकी 40 फीसदी रिचार्ज नहरों से रिसाव, सिंचाई के बाद बचे पानी और तालाब, झील जैसे जल स्रोतों से होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ बारिश नहीं, बल्कि उसे जमीन में पहुंचाने वाले सिस्टम ज्यादा अहम हैं। तालाब, झील, वेटलैंड, जंगल, नदियां और छोटे जल स्रोत भूजल बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. इनका संरक्षण और सुधार जरूरी है।
उनका कहना है कि तालाबों की सफाई और गाद हटाने जैसे छोटे कदम भी पानी को रोकने और जमीन में पहुंचाने में काफी मदद कर सकते हैं। लेकिन अभी इस दिशा में उतना काम नहीं हो रहा, जितनी जरूरत है।
समाधान के तौर पर दो अहम बातें सामने रखी गई हैं. पहली, भूजल के इस्तेमाल को नियंत्रित किया जाए. दूसरी, रिचार्ज के लिए बड़े स्तर पर काम किया जाए।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर समय रहते एक्विफर को रिचार्ज नहीं किया गया, तो आने वाले समय में पानी की भारी किल्लत हो सकती है। अगर देश को सूखा और बाढ़ जैसी स्थितियों से बचाना है, तो बारिश के पानी को बचाना और सही तरीके से इस्तेमाल करना ही सबसे बड़ा उपाय है।
फिलहाल जलाशयों का स्तर कुछ राहत जरूर दे रहा है, लेकिन बदलते मौसम के बीच यह साफ है कि भारत को मजबूत और टिकाऊ जल प्रबंधन की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने होंगे।
First Published : April 15, 2026 | 8:00 AM IST