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रिन्यूएबल एनर्जी में ट्रांसमिशन की समस्या का समाधान जरूरी: संतोष कुमार सारंगी

दीर्घकालिक समाधान यह है कि मौजूदा ट्रांसमिशन लाइनों को इस तरह से अपग्रेड किया जाए कि वे अधिक बिजली निकाल सकें

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सुधीर पाल सिंह   
नंदिनी केशरी   
Last Updated- April 14, 2026 | 12:14 AM IST

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी ने सुधीर पाल सिंह और नंदिनी केसरी के साथ बातचीत में सरकार की नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र के लिए प्राथमिकताओं के बारे में जानकारी दी। इसमें ट्रांसमिशन समस्याओं को हल करने, वितरित खंड में स्वच्छ ऊर्जा की पैठ बढ़ाने, अपतटीय पवन परियोजनाओं को शुरू करने पर चर्चा की। बातचीत के संपादित अंश:

आप वर्तमान में किन दो प्रमुख प्राथमिकताओं पर काम कर रहे हैं?

पहली प्राथमिकता यह है कि हम यह देख सकें कि ट्रांसमिशन बुनियादी ढांचे को किस तरह से योजनाबद्ध और अपग्रेड किया जा सकता है, ताकि यह हमारी अक्षय ऊर्जा से जुड़ी महत्वाकांक्षा का समर्थन कर सके। अगर अक्षय ऊर्जा का विस्तार करना है तब ट्रांसमिशन क्षमता को उसी रफ्तार से बढ़ानी होगी। दूसरी प्राथमिकता यह है कि हम यह देख सकें कि कैसे वितरित अक्षय ऊर्जा और अधिक राज्यों में मिल सके। सारांश में, अक्षय ऊर्जा का ग्रिड के साथ एकीकरण, विकेन्द्रीकृत अक्षय ऊर्जा और बिजली वितरण कंपनियों की क्षमता हमारी प्राथमिकता होगी।

ट्रांसमिशन क्षमता की सीमाओं के कारण होने वाली बिजली कटौती के मुद्दे का समाधान क्या है?

इसका मुख्य समाधान उच्च ट्रांसमिशन क्षमता का होना है। अक्षय ऊर्जा केंद्र काफी तेजी से बढ़ी हैं। अब इन्हें लगाना 1 से 1.5 साल में संभव है क्योंकि उनकी संरचना मॉड्यूलर है जबकि लंबी दूरी की ट्रांसमिशन लाइनों के निर्माण में 3.5 से 5 साल तक का समय लगता है। इसके अलावा, पवन और सौर ऊर्जा की मुख्य तैनाती केवल पांच राज्यों, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक में हुई है। यही स्थिति पवन ऊर्जा के साथ भी है। ऐसे में, उन अक्षय ऊर्जा संपन्न राज्यों में ट्रांसमिशन के लिए जरूरी जगह भी बढ़ जाती है। राज्य सरकारें और केंद्रीय एजेंसियां भूमि अधिग्रहण जैसी समस्या के समाधान पर काम कर रही हैं। दीर्घकालिक समाधान यह है कि मौजूदा ट्रांसमिशन लाइनों को इस तरह से अपग्रेड किया जाए कि वे अधिक बिजली निकाल सकें।

आधिकारिक पवन परियोजनाओं की निविदा की स्थिति क्या है?

गुजरात के लिए एक निविदा आयोजित की गई थी, लेकिन इसके लिए कोई डेवलपर सामने नहीं आए। अब, तमिलनाडु परियोजना के लिए एलआईडीएआर सर्वे पूरा हो चुका है। हालांकि, मौजूदा दौर में वैश्विक पवन ऊर्जा परिदृश्य बहुत सकारात्मक नहीं रहा है। हम यह आकलन कर रहे हैं कि क्या यह निविदा देने का सही समय है क्योंकि स्टील की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण, अपतटीय पवन ऊर्जा की लागत में काफी वृद्धि हो गई है।

क्या यह समस्या व्यवहार्यता अंतर फंडिंग (वीजीएफ) प्रावधान से हल नहीं हो जाएगी?

अगर शुल्क 7.5 से 8 रुपये प्रति यूनिट के बीच होता, तो वीजीएफ इसे करीब 4 रुपये प्रति यूनिट तक ले आता, जो उस स्तर पर होता, जहां वितरण कंपनियां बिजली खरीदने के लिए तैयार होतीं। लागत बढ़ने के कारण, अपतटीय पवन ऊर्जा अनुमानित तौर पर 9-11 रुपये प्रति यूनिट के बीच है, जो एक समस्या बन गया है। समुद्र के नीचे केबल बिछाने की लागत भी बढ़ी है। अगर टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धात्मक निविदा लागू होती है तब लागत और बढ़ सकती है।

First Published : April 14, 2026 | 12:14 AM IST