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Ground Report: युद्ध वहां, बर्बादी यहां! पश्चिम एशिया की जंग ने ओडिशा के प्लास्टिक उद्योग की तोड़ी कमर, कारखानों में सन्नाटा

पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण कच्चे माल की कीमतों में 75% उछाल आने से बालासोर का प्लास्टिक हब ठप हो गया है, जिससे हजारों मजदूर बेरोजगार हो रहे हैं

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हेमंत कुमार राउत   
Last Updated- April 04, 2026 | 2:06 PM IST

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से करीब 205 किलोमीटर दूर बालासोर में गणेश्वरपुर औद्योगिक क्षेत्र में प्लास्टिक उत्पाद बनाने वाले कारखाने में ठेके पर काम करने वाले 35 वर्षीय मजदूर रतन सिंह को इन दिनों बेरोजगारी जैसी हालात से जूझना पड़ रहा है। उन्होंने कहा, ‘महज एक महीना पहले हमारे पास थोड़ा भी आराम करने का समय नहीं था। मगर अब मशीनें काफी समय तक बंद रहती हैं। फैक्टरी सुपरवाइजर बताते हैं कि कच्चा माल न होने के कारण काम नहीं है। हमें स्थिति में सुधार होने तक इंतजार करने के लिए कहा गया है। अब लगभग 15 दिन हो चुके हैं और मैं बेरोजगार हूं।’

करीब 70 एकड़ क्षेत्र में फैला गनेश्वरपुर औद्योगिक क्षेत्र तटीय जिले के सात प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों और विकास केंद्रों में शामिल है। यहां प्लास्टिक, पॉलिमर और इससे संबद्ध क्लस्टर में लगभग 20 एमएसएमई इकाइयां परिचालन में हैं। इन इकाइयों में पॉलिप्रोपिलीन आधारित घरेलू उत्पादों, बैग, पाइप और फिटिंग्स के सामानों का उत्पादन होता है।

हजारों मील दूर अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष के कारण होर्मुज स्ट्रेट के अवरुद्ध होने का प्रभाव इस औद्योगिक पट्टी के कारखानों में सन्नाटों के रूप में दिखने लगा है। भले ही यहां के मजदूरों ने कभी कच्चे तेल का बैरल तक न देखा हो लेकिन इसकी वजह से उन्हें रोजगार का नुसान हो रहा है। इस औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या सामान्य दिनों में 1,500 से अधिक होती थी जो अब घटकर 800 से भी कम रह गई है।

रतन जैसे श्रमिकों को रोजाना अथवा पाली के आधार पर भुगतान किया जाता है। उनके लिए पश्चिम एशिया संकट का मतलब तत्काल मजदूरी का नुकसान है। अपने कारखाने के समीप एक चाय की दुकान पर बैठे रवींद्र साहू ने कहा, ‘अगर मैं काम नहीं करूंगा तो मेरी कमाई भी नहीं होगी। मगर पारिवारिक खर्च तो करने ही पड़ेंगे। ऐसा कब तक चलेगा? अगर यही ​स्थिति एक सप्ताह और रही तो मेरे बच्चे भूखे मर जाएंगे।’

औद्योगिक क्लस्टर के मध्य में स्थित प्लास्टिक हाउसवेयर विनिर्माण इकाई जगदम्बा पॉलिमर्स लिमिटेड के भीतर संकट का प्रभाव स्पष्ट तौर पर दिख रहा है। वहां की इंजेक्शन मोल्डिंग मशीनें एक-एक करके बंद हो रही हैं। वहां की बा​ल्टियां, मग आदि सामान्य तौर पर ताजा उत्पादों से भरे होते थे लेकिन फिलहाल वे खाली नजर आ रहे हैं। बाथ सेट, कैसरोल, बच्चों के उत्पाद आदि के आधे-अधूरे तैयार माल बंद पड़े कन्वेयर बेल्ट के पास बिखरे पड़े हैं। उत्पादन की रफ्तार बेहद सुस्त पड़ चुकी है।

जगदम्बा ओडिशा में एक बड़े इंजेक्शन मोल्डिंग कारखाने का संचालन करती है जो पूर्वी भारत में सबसे बड़ा है। कंपनी अपने उत्पादों के लिए शीर्ष ब्रांडों में शुमार है और 12 से अधिक राज्यों में उसकी मौजूदगी है। उसके कारखाने में 1 लाख वर्ग फुट से अधिक जगह है।

वहां एक उत्पादन लाइन पर जग (जूस के लिए) पर स्टिकर लगाते हुए एक मजदूर राजेंद्र मंडल ने कहा, ‘युद्ध वहां हो रहा है लेकिन उससे यहां हम लोगों को नुकसान हो रहा है। पहले

सभी मशीनें उत्पादन करती थीं। मगर अब स्थिति बिल्कुल बदल गई है। हमें कच्चे माल की कमी के कारण मशीनें बंद होने से नौकरी जाने की चिंता सता रही है।’

कारखाना प्रबंधकों ने स्वीकार किया कि उत्पादन धीमा होने का असर सबसे पहले ठेका मजदूरों पर पड़ता है। उत्पादन प्रभारी कार्तिक चंद्र कर ने कहा, ‘उत्पादन में लगभग 70 फीसदी की कमी आई है। एक छत के तले 10 उत्पादन लाइनों में से केवल 2 ही चालू हैं। हम मांग के अनुसार मशीनों को नए सिरे से संचालित कर रहे हैं क्योंकि हम कच्चे माल की लागत काफी अ​धिक होने पर उत्पादों का ढेर नहीं लगा सकते। आय के तत्काल नुकसान से भी अधिक खतरनाक है अनिश्चितता की ​स्थिति।’

भारत के पास पेट्रोरसायन की घरेलू उत्पादन क्षमता काफी है लेकिन पॉलिमर की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कच्चे तेल के आयात पर हमारी निर्भरता काफी अधिक है। ऐसे में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के बाधित होने पर घरेलू विनिर्माताओं को मूल्य के झटके और आपूर्ति में कमी यानी दोहरी मार का सामना करना पड़ता है।

जगदम्बा पॉलिमर्स लिमिटेड के प्रबंध निदेशक चंद्र प्रकाश भरतिया ने कहा कि भारतीय प्लास्टिक प्रॉसेसिंग उद्योग वैश्विक कच्चे तेल के परिवहन के प्रति काफी संवेदनशील है। उन्होंने कहा, ‘पॉलिमर नैफ्था एवं अन्य कच्चे तेल उत्पाद से सीधे तौर पर जुड़े होते हैं। इसलिए भू-राजनीतिक अस्थिरता की सूरत में इनकी कीमतें बढ़ जाती हैं। पॉलिमर और पीईटी रेजिन की कीमतों में 75 फीसदी तक की वृद्धि हुई है। इतनी कम अवधि में हुई बेतहाशा वृद्धि वासतव में अभूतपूर्व है। ऐसे में हमारे पास उत्पादन को कम करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है।’

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उत्पादन में व्यापक गिरावट

कुछ ही किलोमीटर दूर प्लास्टिक पाइप एवं फिटिंग्स बनाने वाली इकाई हरि प्लास्ट में भी बड़े पैमाने पर व्यवधान दिख रहा है। वहां की लंबी एक्सट्रूजन लाइनें पहले लगातार चलती रहती थीं, फिलहाल वे बंद हैं और उनके फ्रेम खाली हैं। वहां की 12 उत्पादन लाइनों की मासिक स्थापित क्षमता 650 टन पॉलिविनाइल क्लोराइड (पीवीसी), क्लोरिनेटेड पॉलिविनाइल क्लोराइड (सीपीवीसी), उच्च घनत्व वाली पॉलिथीन (एचडीपीई) और मध्यम घनत्व वाली पॉलिथीन (एमडीपीई) पाइपों के उत्पादन की है। मगर उनमें से फिलहाल 2 लाइन ही चालू हैं जो सिंचाई, पेयजल और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में उपयोग किए जाने वाली पाइपों का सीमित उत्पादन कर रही हैं।

हरि प्लास्ट के उपाध्यक्ष (तकनीकी) तरुण रे ने कहा, ‘फैक्टरी आम तौर पर 300 से अधिक तरह की पाइप एवं फिटिंग्स का उत्पादन करती है। मगर अब उत्पादन घटकर महज 10 से 12 प्रकार के उत्पादों तक सीमित रह गया है। सामान्य दिनों में वहां तीन पालियों में 350 से अ​धिक कर्मचारी काम करते थे जो घटकर अब महज 60 रह गए हैं। कच्चे माल की कीमतों में असामान्य तौर पर वृद्धि हुई है और आपूर्ति के मोर्चे पर अनिश्चितता बरकरार है। ऐसे में सभी लाइनों को चलाने का मतलब भारी नुकसान होगा।’

गनेश्वरपुर में नियो ट्यूब्स के प्रबंध निदेशक सुरेंद्र प्रसाद दास अपने कारखाने में बंद पड़ी मशीनों की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘हमारे पास पांच एक्सट्रूजन लाइनें हैं जिनमें से अब केवल एक चालू है। महज एक महीना पहले हम लगभग 100 टन प्रति महीना उत्पादन करते थे जो अब घटकर 20 टन से भी कम रह गया है। पानी की टंकियों का उत्पादन करने वाली हमारी इकाई बंद हो गई है। हम ऐसे अस्थिर बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते।’

कुछ इकाइयां पूरी तरह से बंद हो चुकी हैं। वेलेंटिना पाइप्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक निकुंज छोटराय ने कहा कि उनकी फैक्टरी कई दिनों से बंद है। भुवनेश्वर के इस विनिर्माता ने कहा, ‘कीमत अथवा आपूर्ति के बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है। कच्चे माल की कीमतों में तेजी के लिहाज से उत्पादों के दाम को अचानक बढ़ाना मुश्किल है। ऐसे में कारखाने को चलाने से रोजाना केवल नुकसान ही होगा।’

यहां तक कि अपेक्षाकृत बड़े निर्माता भी इससे अछूते नहीं हैं। उच्च क्षमता और बेहतर वित्तीय बफर वाली कंपनियों ने भी उत्पादन में 50 से 70 फीसदी की कमी की है। कोलकाता की कंपनी ओरि प्लास्ट के मुख्य परिचालन अधिकारी पीके दवे ने कहा, ‘हमने नुकसान को कम करने के लिए उत्पादन को तर्कसंगत बनाया है। हमने उत्पाद के दाम भी बढ़ाए हैं लेकिन मांग कम हो गई है। फिलहाल बाजार में काफी अस्थिरता दिख रही है। हम स्थिति नजर रख रहे हैं।’ कंपनी की बालासोर इकाई की मासिक स्थापित क्षमता 1,200 टन है।

प्लास्टिक इकाइयां क्यों हो रहीं प्रभावित

प्लास्टिक उत्पादों को कच्चे माल की एक श्रृंखला से तैयार किया जाता है जो कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस से शुरू होती है। ऐसे में यह उद्योग वैश्विक ऊर्जा बाजारों के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाता है। बुनियादी स्तर पर कच्चे तेल की रिफाइनिंग के जरिये नैफ्था का उत्पादन किया जाता है जबकि प्राकृतिक गैस से ईथेन और प्रोपेन प्राप्त होते हैं।

इन फीडस्टॉक्स की प्रॉसेसिंग पेट्रोरसायन संयंत्रों में की जाती है जिससे एथिलीन और प्रोपलीन जैसे प्रमुख उत्पाद तैयार होते हैं। उसके बाद इन उत्पादों को एचडीपीई, एलएलडीपीई, पीपी, पीवीसी और पीईटी रेजिन जैसे पॉलिमर में परिवर्तित किया जाता है जिनका उपयोग प्लास्टिक विनिर्माता पाइप और कंटेनर से लेकर फर्नीचर और पैकेजिंग तक तमाम उत्पाद बनाने में करते हैं।

इसके अलावा प्लास्टिक को अपे​क्षित शक्ति, लचीलापन, रंग और स्थायित्व देने के लिए प्लास्टिसाइजर, स्टेबलाइजर, पिगमेंट और फिलर जैसे विभिन्न घटकों को मिलाया जाता है। आयातित पेट्रोरसायन इनपुट पर भारत की अत्य​धिक निर्भरता समस्या को जटिल बनाती है। एचडीपीई की कीमतें 28 फरवरी को लगभग 91,452 रुपये प्रति टन थीं जो 1 अप्रैल तक करीब 75 फीसदी बढ़कर 1.6 लाख रुपये हो गईं।

इसी प्रकार एलएलडीपीई की कीमतें करीब 77 फीसदी बढ़कर 90,952 रुपये से 1.61 लाख रुपये, पीवीसी की कीमतें करीब 30 फीसदी बढ़कर 89,000 रुपये से 1.16 लाख रुपये, पीपी के दाम 50.5 फीसदी बढ़कर 1,00,384 रुपये से 1.51 लाख रुपये और पीईटी रेजिन की कीमतें 92,000 रुपये से 52 फीसदी बढ़कर 1.4 लाख रुपये हो गईं।

प्लास्टिक उत्पादों की कुल लागत में कच्चे माल की हिस्सेदारी करीब 70 फीसदी होती है। ऐसे में कच्चे माल की कीमतों में भारी उछाल का विनिर्माताओं पर सीधा और गंभीर प्रभाव पड़ता है। अ​धिकतर सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम मामूली मार्जिन और लंबी अवधि के आपूर्ति अनुबंधों पर काम करते हैं। ऐसे में लागत में अचानक हुई वृद्धि का बोझ ग्राहकों के कंधों पर डालना भी मुश्किल हो जाता है।

बड़े परिवेश को खतरा

उत्पादन पर प्रभाव काफी तेज और गंभीर रहा है। प्लास्टिक पाइप एवं फिटिंग विनिर्माताओं के लिए यह दोहरी मार साबित हुई है क्योंकि उन्हें कच्चे माल की कीमतों में उछाल और  कमजोर मांग से जूझना पड़ रहा है। पॉलिमर की लागत में ऐसे समय में जबरदस्त वृ​द्धि हुई है जब सरकारी क्षेत्र की मांग काफी गिर चुकी है।

वित्त वर्ष 2026 के लिए जल जीवन मिशन के तहत बजट आवंटन को काफी कम कर दिया गया है। खर्च में सुस्ती, कार्यान्वयन में देरी और परियोजना में क​थित अनियमिताओं के कारण 67,000 करोड़ रुपये के प्रारं​भिक अनुमान को संशो​धित अनुमान में घटाकर 17,000 करोड़ रुपये ​कर दिया गया है। ग्रामीण जल आपूर्ति परियोजनाओं से एचडीपीई और पीवीसी पाइपों की मांग को बढ़ावा मिलता था।

हरि प्लास्ट और ओम पाइप्स जैसी इकाइयां बड़े पैमाने पर पाइप आपूर्ति के लिए सरकारी अनुबंधों पर काफी निर्भर हैं। मगर आवंटन में कमी के कारण उनके अनुबंध पहले ही रद्द हो चुके हैं और भुगतान में देरी हो रही है। एक विनिर्माता ने कहा, ‘पहले जल जीवन मिशन के लिए मांग पूरे साल रहती थी। मगर अब वह सहारा भी चला गया है। हम बिना ऑर्डर के और कच्चे माल की भारी लागत वाली एक अजीब स्थिति से जूझ रहे हैं।’ केवल ओडिशा में प्लास्टिक उत्पादों से संबंधित 56 इकाइयों के उत्पादन में भारी गिरावट आई है। उद्योग संघों का मानना है कि प्लास्टिक उत्पादों की छोटी विनिर्माण इकाइयों में से 40 फीसदी से अधिक बंद हो चुकी हैं। शेष मझोली एवं बड़ी इकाइयों ने अपने संचालन में भारी कटौती की है।

ओडिशा प्लास्टिक पाइप्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष संग्राम दास ने कहा कि स्थिति एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। उन्होंने कहा, ‘उत्पादन पूरी तरह से अव्यवहार्य हो चुका है। इसके बावजूद अगर हम अपनी इकाइयां चलाना चाहें तो कच्चा माल या तो उपलब्ध नहीं है या ​फिर उसकी कीमत हमारी क्षमता से बाहर है। तीन चौथाई से अधिक इकाइयां पहले ही बंद हो चुकी हैं। अगर यही स्थिति बनी रही तो हमें कुछ महीनों के लिए अपने नियमित कर्मचारियों को बिना काम 50 फीसदी वेतन देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।’ दास हरि प्लास्ट के प्रबंध निदेशक भी हैं।

भारत का प्लास्टिक प्रॉसेसिंग क्षेत्र काफी विशाल और अर्थव्यवस्था से गहराई तक जुड़ा हुआ है। यहां के लगभग 50,000 उद्यमों में 30,000 पंजीकृत प्रॉसेसिंग इकाइयां हैं। इनमें से 85 फीसदी एमएसएमई हैं जो सीधे तौर पर लगभग 50 लाख लोगों को रोजगार देते हैं और लाखों लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर प्रदान करते हैं। यह क्षेत्र करीब 2.2 लाख टन पॉलिमर की खपत करता है और निर्यात में सालाना 12.5 अरब डॉलर का योगदान देता है। मौजूदा व्यवधान एक अप्रत्याशित झटके के रूप में सामने आया है जबकि भारत 2030 तक 25 अरब डॉलर के निर्यात का लक्ष्य रख रहा है।

First Published : April 3, 2026 | 11:43 PM IST