सरकार पश्चिम एशिया संकट की चपेट में आए उद्योगों की मदद के लिए व्यापक उपायों पर काम कर रही है। सरकार से जुड़े सूत्रों ने बताया कि युद्ध से प्रभावित सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) सहित विभिन्न क्षेत्रों को उबारने के लिए व्यापक उपायों पर काम चल रहा है। सरकारी सूत्रों ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को यह जानकारी दी।
एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि कई क्षेत्रों और उद्योगों के लिए योजनाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इसका दायरा केवल एमएसएमई तक ही सीमित नहीं है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि यह एक बड़े राहत पैकेज के रूप में होगा अथवा विभिन्न चरणों में दिए जाने वाले अलग-अलग पैकेज के रूप में।
समाचार एजेंसी पीटीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार सरकार पश्चिम एशिया संकट से प्रभावित एमएसएमई सहित विभिन्न कारोबारों की मदद के लिए 2.5 लाख करोड़ रुपये की ऋण गारंटी योजना पर विचार कर रही है। इस योजना के तहत अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण ऋण अदायगी में डिफॉल्ट होने की स्थिति में ऋणदाताओं को 100 करोड़ रुपये तक के ऋण पर लगभग 90 फीसदी की ऋण गारंटी प्रदान की जाएगी। बैंक ऋण पर यह गारंटी नैशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी द्वारा मुहैया कराई जाएगी जो सरकार की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है।
सूत्रों ने संकेत दिए कि सरकार न सिर्फ ईरान युद्ध के तात्कालिक समस्याओं के लिए समाधान तैयार कर रही है, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दीर्घकालिक असर से निपटने की भी तैयारी कर रही है। एक शीर्ष सूत्र ने बताया कि सरकार मौजूदा संकट पर उसी तरह रोजाना नजर रख रही है जैसा कि कोविड-19 महामारी के दौरान किया था। यह बात उन्होंने तब कही जब उनसे दोनों स्थितियों में समानता के बारे में पूछा गया। मगर सूत्र ने यह भी बताया कि कोविड-19 से निपटना जीवन और आजीविका दोनों से जुड़ा मामला था।
मौजूदा अनिश्चितता को देखते हुए उद्योग जगत ने कोविड काल की ही तरह राहत पैकेज की मांग की है। वित्त मंत्रालय को दिए गए सुझावों में कई बातें शामिल हैं। उनमें कहा गया है कि मौजूदा संकट से कारोबार को बचाने के लिए कोविड महामारी के दौरान शुरू की गई योजना जैसी एक निश्चित समयसीमा वाली आपात क्रेडिट लाइन गारंटी योजना लाने, ईंधन के कच्चे माल पर कर ढांचे को तर्कसंगत बनाने और केंद्र एवं राज्यों के सार्वजनिक उपक्रमों के अनुबंधों के लिए डिलिवरी की समयसीमा बढ़ाने की जरूरत है।
साल 2020 में सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत 1.7 लाख करोड़ रुपये के पैकेज और आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत 20 लाख करोड़ रुपये के प्रोत्साहन की घोषणा की थी। साल 2021 में अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को सहारा देने के लिए 6.28 लाख करोड़ रुपये के एक अन्य राहत पैकेज की घोषणा की गई थी।
वित्त मंत्रालय का कहना है कि निकट अवधि के हिसाब से देखें तो विदेश में काम कर रहे लोगों द्वारा भेजे गए धन की आवक घट सकती है, क्योंकि कर्मचारी घर पर धन नहीं भेज सकेंगे। अगर लंबे समय तक युद्ध जारी रहता है तो बड़ी संख्या में श्रमिकों की अपने घरों की ओर वापसी होगी, यह भी बड़ी चुनौती होगी।
सूत्रों ने कहा कि इस समय श्रमिकों के वापस लौटने जैसी समस्या कोई मसला नहीं है और सरकार 11 प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर श्रमिकों की आवाजाही पर नजर बनाए हुए है, जहां इस तरह की गतिविधियां होती हैं।
आर्थिक मामलों के विभाग ने मार्च में मासिक आर्थिक समीक्षा में कहा था कि वित्त वर्ष 2023-24 में भारत में श्रमिकों द्वारा भेजे जाने वाले कुल धन में गल्फ इकोनॉमिक काउंसिल (जीसीसी) से जुड़ी अर्थव्यवस्थाओं की हिस्सेदारी करीब 38 प्रतिशत थी।
समीक्षा में कहा गया है कि विश्व में भारत से जाने वाले कुल प्रवासियों में आधे जीसीसी देशों में गए हैं। अगर कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि बनी रहती है तो इन अर्थव्यवस्थाओं की राजकोषीय स्थिति पर गंभीर असर पड़ सकता है और इससे निकट के हिसाब से धनप्रेषण प्रभावित हो सकता है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा था कि पूंजीगत व्यय जारी रखने और प्रभावित क्षेत्रों के लिए लक्षित समर्थन देने के लिए पर्याप्त वित्तीय गुंजाइश है। पश्चिम एशिया संकट पर वित्त मंत्री ने कहा, ‘चालू साल ज्यादा चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि हम झटकों की स्थिति से निकलकर स्थायी उतार चढ़ाव के दौर में पहुंच गए हैं।’
वित्त मंत्रालय ने अचानक आने वाले आर्थिक झटकों से निपटने के लिए बने आर्थिक स्थिरीकरण कोष के लिए आवंटन बढ़ाकर दोगुना कर दिया है। वित्त वर्ष 2026 की दूसरी पूरक मांग में इस कोष को बढ़ाकर 1 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है। सूत्रों ने बताया कि कोष की अप्रयुक्त राशि को चालू वित्त वर्ष 2027 में आगे बढ़ाया जाएगा, ताकि सरकार को राहत संबंधी कोई कदम उठाने की पूरी संभावना बनी रहे।
सरकार ने 27 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर अतिरिक्त उत्पाद शुल्क 10 रुपये प्रति लीटर कम करके तेल कंपनियों के लिए एक बड़ी राहत की घोषणा की थी, ताकि उपभोक्ताओं को मूल्य वृद्धि से बचाया जा सके। सरकार ने घरेलू बाजार में इन ईंधनों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए डीजल और विमान ईंधन (एटीएफ) पर निर्यात शुल्क फिर से लागू कर दिया था। डीजल निर्यात पर 21.5 रुपये प्रति लीटर का शुल्क लगाया गया है, जबकि एटीएफ निर्यात पर शुल्क शून्य से बढ़कर 29.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है।
वित्त मंत्रालय ने पश्चिम एशिया संघर्ष को देखते हुए 2 अप्रैल, 2026 से महत्त्वपूर्ण पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर सीमा शुल्क से पूरी तरह छूट देने की घोषणा की थी। उद्योग ने चल रहे संकट से व्यवसायों को बचाने के लिए वित्त मंत्रालय को विभिन्न सुझाव दिए हैं। इन सुझावों में महामारी के दौरान लागू आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना की तरह एक निश्चित समय के लिए योजना पेश करने, ऊर्जा इनपुट पर कर और शुल्क संरचना को युक्तियुक्त बनाने और केंद्र व राज्य के सार्वजनिक उद्यम अनुबंधों के लिए डिलिवरी की समयसीमा का विस्तार करना शामिल है।