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बहुत संभव है कि निकट और मध्य अवधि में दरें कम ही रहें: RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा

हम तटस्थ रुख पर हैं। इसलिए दोनों दिशाओं में परिणाम संभव हैं। तथापि देश के व्यापक आ​र्थिक बुनियादी हालात मजबूत और दमदार बने हुए हैं।

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बीएस संवाददाता   
Last Updated- April 08, 2026 | 10:57 PM IST

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने डिप्टी गवर्नर – टी रवि शंकर, स्वामीनाथन जे और पूनम गुप्ता के साथ मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद संवाददाता सम्मेलन में विभिन्न मुद्दों पर बात की। संपादित अंश…

इस नीति में एक ढांचागत बदलाव यह लगता है कि आपने मुख्य मुद्रास्फीति के आंकड़े देना शुरू कर दिया है। जहां समूचे साल की औसत मुद्रास्फीति 4.4 प्रतिशत है, वहीं दूसरी छमाही का औसत 5 प्रतिशत के करीब पहुंच रहा है। क्या बाजार को दरों में बढ़ोतरी के लिए तैयार रहना चाहिए, खास तौर तब, जब तरलता की तंगी हो रही हो?

संजय मल्होत्रा : बाजार के प्रतिभागी लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे और हमें लगा कि इसे शुरू करने का यही सही समय है, खास कर पांच वा​र्षिक समीक्षा पूरी होने के बाद। अलबत्ता मैं इसे मौद्रिक नीति में कोई बदलाव नहीं कहूंगा, मुख्य मुद्रास्फीति की हमेशा ही आंतरिक रूप से ​निगरानी की जाती रही है, अब हम बस इसके अनुमान साझा कर रहे हैं। मौद्रिक नीति पहले से तय किसी रास्ते पर नहीं है। समग्र मुद्रास्फीति ही हमारा लक्ष्य बनी हुई है और हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि यह निर्धारित दायरे के भीतर ही रहे। साथ ही कोई भी निर्णय लेने से पहले हम मुद्रास्फीति के सभी घटकों और उन्हें प्रभावित करने वाले कारकों का विश्लेषण करते हैं।

फरवरी में अनुमान यह था कि झटकों को छोड़ दें तो दरें 9 से 12 महीने तक कम रहेंगी। अगर स्थितियां स्थिर होती हैं, तो क्या आप उस सहजता को दोहराएंगे?

संजय मल्होत्रा : हम तटस्थ रुख पर हैं। इसलिए दोनों दिशाओं में परिणाम संभव हैं। तथापि देश के व्यापक आ​र्थिक बुनियादी हालात मजबूत और दमदार बने हुए हैं। हाल के झटकों के बावजूद वृद्धि 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। काफी संभव है कि निकट से मध्यम अवधि में दरें कम ही रहें, लेकिन यह इस पर निर्भर करेगा कि हालात किस तरह बदलते हैं।

आपके अनुमानों के अनुसार पश्चिम एशिया का संकट कब तक जारी रहने की संभावना है?

संजय मल्होत्रा : कोई समयसीमा निर्धारित करना बहुत मुश्किल है। हमारे लिए जो बात ज्यादा मायने रखती है, वह है कमोडिटी की कीमतें, विशेष रूप से ऊर्जा तथा आपूर्ति में आने वाली रुकावटों का दायरा और उसकी अवधि। अगर आपूर्ति में आने वाले झटके बरकरार रहते हैं, तो कई महीनों तक इनका असर मांग पर भी पड़ सकता है।

क्या 6.9 प्रतिशत की वृद्धि की उम्मीद कुछ ज्यादा ही आशावादी है? यह देखते हुए कि आपूर्ति श्रृंखला को सामान्य होने में काफी लंबा समय लगता है, खास तौर गैस आपूर्ति को।

संजय मल्होत्रा : नहीं, हमें नहीं लगता कि यह कुछ ज्यादा ही आशावादी है।

First Published : April 8, 2026 | 10:54 PM IST