प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
सोयाबीन उद्योग ने सरकार से खाद्य तेलों की मानकीकृत पैकेजिंग मात्रा (जैसे 250 मिली, 500 मिली, 1 लीटर, 5 लीटर) फिर से लागू करने की मांग की है। इस संबंध में सोयाबीन उद्योग के प्रमुख संगठन सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) ने उपभोक्ता मामलों के विभाग को पत्र लिखा है। यह कदम पांच राष्ट्रीय खाद्य तेल उद्योग संघों द्वारा दिए गए संयुक्त ज्ञापन के बाद उठाया गया है। जिसमें जनवरी 2023 से पैक साइज के विनियमन हटने के बाद उपभोक्ताओं के साथ हो रहे व्यापक भ्रम और भ्रामक स्थिति की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया गया है।
1 जनवरी 2023 से पहले भारत में खाद्य तेलों की पैकेजिंग मानकीकृत नेट मात्रा नियमों के तहत होती थी और खाद्य तेल तय पैक साइज में ही बिकते थे। निर्माताओं को 250 मिली/ग्राम, 500 मिली/ग्राम, 1 लीटर/किलोग्राम, 5 लीटर/किलोग्राम जैसे निर्धारित पैक साइज में ही तेल बेचना होता था। इससे उपभोक्ता आसानी से अलग-अलग ब्रांड के दाम की तुलना कर पाते थे और पारदर्शिता बनी रहती थी।
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1 जनवरी 2023 से सरकार ने इन मानक मात्रा प्रतिबंधों को हटा दिया और कंपनियों को किसी भी मात्रा में तेल बेचने की छूट मिल गई। इसके साथ पैकेट पर ‘यूनिट सेल प्राइस’ (प्रति ग्राम या प्रति मि.ली. कीमत) घोषित करना अनिवार्य किया गया। ताकि उपभोक्ता तुलना कर सकें।
सोपा ने अपने पत्र लिखा है कि सोपा के सर्वे में 40 ब्रांड के पाउच में बेहद अलग-अलग और अजीब पैक साइज मिले जैसे 350 ग्राम, 375 ग्राम, 440 ग्राम, 810 ग्राम, 880 मिली, 910 ग्राम, 970 ग्राम आदि। कई पाउच दिखने में एक जैसे होते हैं, लेकिन उनकी मात्रा अलग होती है। जैसे 880 मिली और 910 मिली के पाउच एक जैसे दिखते हैं। 880 मिली का पाउच कुल कीमत में सस्ता लगता है। इसलिए ग्राहक उसे बेहतर समझ लेता है, जबकि प्रति लीटर वह महंगा पड़ता है। यह भ्रम बड़े पैमाने पर, वास्तविक और व्यवस्थित है।
एक और समस्या यह है कि कई ब्रांड मात्रा को मिली लीटर में दर्शाते हैं, लेकिन तापमान का उल्लेख नहीं करते। चूंकि खाद्य तेल तापमान के साथ फैलता और सिकुड़ता है। इसलिए 30°डिग्री सेल्सियस पर एक लीटर और 40°डिग्री सेल्सियस पर एक लीटर का द्रव्यमान समान नहीं होता। लिहाजा अलग तापमान पर ‘एक लीटर’ का वास्तविक वजन अलग हो सकता है। इससे सही तुलना और मुश्किल हो जाती है।
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सोपा का कहना है कि मानक मात्रा प्रतिबंध हटने से प्रतिस्पर्धा का असमान वातावरण बन गया है। जो निर्माता पारदर्शी और मानक पैक साइज बनाए हुए हैं, वे बाजार हिस्सेदारी खो रहे हैं, जबकि गैर-मानक पैक साइज का उपयोग कर कम कीमत का भ्रम पैदा करने वाले प्रतिस्पर्धी लाभ उठा रहे हैं। नतीजतन ईमानदार कंपनियां भी प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए भ्रामक पैक साइज अपनाने को मजबूर हो रही हैं। उद्योग में उपभोक्ता पारदर्शिता के मामले में गिरावट की होड़ शुरू हो गई है।
कुछ लोगों का तर्क है कि पैकेट पर अनिवार्य ‘यूनिट सेल प्राइस’ लिखने से मानकीकरण की आवश्यकता नहीं रह जाती, क्योंकि उपभोक्ता प्रति यूनिट कीमत से तुलना कर सकता है। लेकिन सोपा इस तर्क को सिरे से खारिज करता है। सोपा ने कहा कि सामान्य उपभोक्ता खरीदारी के समय प्रति यूनिट गणना नहीं करता। यह कीमत अक्सर पैसे में, दशमलव के साथ, छोटे अक्षरों में लिखी होती है जैसे 24.72 पैसे प्रति मिली, जिसे बहुत कम लोग पढ़ते हैं। तेज रफ्तार रिटेल खरीदारी में उपभोक्ता दृश्य संकेतों और कुल कीमत पर अधिक ध्यान देता है। ‘यूनिट सेल प्राइस’ का उपाय सैद्धांतिक रूप से सही है। लेकिन व्यवहार में अधिकांश उपभोक्ताओं के लिए अप्रभावी है। सोपा के शब्दों में ‘चयन की स्वतंत्रता, भ्रम की स्वतंत्रता बन गई है।’
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29 अप्रैल 2026 को उपभोक्ता मामलों के विभाग के सचिव को भेजे गए पत्र में सोपा ने गैर-मानक पैक साइज से उपभोक्ताओं में फैल रहे व्यापक भ्रम की ओर ध्यान दिलाया। पत्र में सोपा ने एक ऐसे ब्रांड का उदाहरण दिया, जो वर्तमान में 19 अलग-अलग पैक साइज में खाद्य तेल बेच रहा है, जिनमें कई पाउच दिखने में समान हैं, जबकि मात्रा में 25 या 50 ग्राम तक का अंतर है।
-सोपा ने उद्योग की संयुक्त सिफारिश दोहराई कि मानकीकृत पैकेजिंग मात्रा को तुरंत बहाल किया जाए और खाद्य तेलों के लिए फिर से मानक पैक साइज लागू किए जाएं।
-निर्माताओं को उत्पादन प्रणाली समायोजित करने और मौजूदा पैकेजिंग स्टॉक खत्म करने के लिए उचित समय देने का अनुरोध किया। ताकि अनुपालन से परिचालन बाधित न हो।