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रसोई गैस का महासंकट: सिलेंडर की किल्लत से ठप हुआ होटलों का चुल्हा, शादियों का जायका भी हुआ फीका

यूपी में गैस किल्लत से मंदिरों की रसोई और होटलों में संकट है। शादियों में लकड़ी-कोयले का उपयोग बढ़ गया है और खाने की वैरायटी में कटौती हो रही है

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बीएस संवाददाता   
Last Updated- March 13, 2026 | 8:00 PM IST

पहले कॉमर्शियल और अब घरेलू रसोई गैस सिलेंडरों की किल्लत का असर सड़क किनारे बिकने वाले खाने से लेकर बड़े होटलों और यहां तक कि शादियों में भी दिखने लगा है। महज एक सप्ताह में ही हालात इतने विकट हो चले हैं कि उत्तर प्रदेश के धार्मिक शहरों अयोध्या, वाराणसी और चित्रकूट में चलने वाले अन्न क्षेत्रों व मंदिरों की रसोई तक में कटौती की जाने लगी है।

अयोध्या के राम मंदिर से सटे अमावा मंदिर परिसर में दशकों से अनवरत चल रही राम रसोई का संचालन गैस उपलब्ध न होने के कारण दो दिन प्रभावित रहा। शुक्रवार से राम रसोई का संचालन लकड़ी व कोयले की मदद से शुरू किया गया है। इसी तरह की खबरें अयोध्या के कई अन्य मठों से भी आई हैं, जहां किचन की सेवा में कटौती की जा रही है। वाराणसी में सतत चलने वाले अन्न क्षेत्रों में गैस के विकल्प के तौर पर लकड़ी व कोयला इस्तेमाल शुरू किया गया है। हालांकि, यहां भी नाश्ते आदि की सुविधा में कटौती की गई है।

गैस की कमी से बदलते व्यंजनों का नजारा

राजधानी लखनऊ के फूड जोनों में इसका असर साफ देखा जा रहा है। रात भर गुलजार रहने वाले हुसैनबाद फूड कोर्ट से लेकर नक्खास और नजीराबाद में खासा सन्नाटा पसर गया है। हुसैनाबाद इलाके में चलने वाली सैकड़ों नॉनवेज दुकानों में महज कुछ दर्जन ही चल रही हैं, उनमें भी चुनिंदा आइटम ही उपलब्ध हैं।

नक्खास इलाके के प्रसिद्ध रेस्टोरेंट ने फूड डिलीवरी के ऑर्डर लेना बंद कर दिए हैं। गोमतीनगर की चटोरी गली में भी गैस सिलेंडर की किल्लत के चलते लगने वाली दुकानें पहले के मुकाबले एक चौथाई रह गई हैं। चौक इलाके में पाटानाले पर सेहरी के समान बनाने वाली दुकानों पर अब तैयार माल की जगह रेडीमेड, पैक्ड आइटम ही दिए जा रहे हैं। होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन ने प्रशासन से कैरोसीन, कोयले और लकड़ी के इस्तेमाल की अनुमति मांगी है।

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सबसे ज्यादा प्रभावित शादियों की कैटरिंग वाले

अचानक से रसोई गैस की किल्लत का सबसे ज्यादा असर शादी-ब्याह में कैटरिंग का काम करने वालों पर पड़ा है। जहां कैटरर्स को या तो कॉमर्शियल गैस सिलेंडर नहीं मिल रहे या उन्हें दोगुनी-तीन गुना कीमत चुकानी पड़ रही है। राजधानी के मशहूर बुद्धालाल और कमल कैटरर्स का कहना है कि शादी के ऑर्डर अब ईंटों के चूल्हे पर लकड़ी व कोयले की मदद से पूरे किए जा रहे हैं।

हिन्द कैटरर्स के प्रतीक यादव का कहना है कि लागत में 50 फीसदी का इजाफा हो गया है और तवे व मेहमानों के सामने तैयार किए जाने वाले आइटमों को ड्रॉप करना पड़ रहा है।

उनका कहना है कि पहले से हुई बुकिंग में अब रेट भी नहीं बढ़ाया जा सकता और किसी तरह लागत निकालने के लाले पड़ गए हैं। राजधानी लखनऊ के कई वीआईपी मैरिज हॉल और लॉन में कोयले व लकड़ी का उपयोग या तो प्रतिबंधित है या सीमित है। इन जगहों पर शादी-ब्याह निपटाना बड़ी चुनौती बन गया है।

लकड़ी-कोयले के दाम बढ़े, इनके लिए भी मारामारी

आमतौर पर थोक में 8 से 10 रूपये किलो मिलने वाली जलावन लकड़ी के दाम उत्तर प्रदेश के कई शहरों में बढ़कर दोगुने हो गए हैं। राजधानी लखनऊ में बड़े चूल्हों में इस्तेमाल होने वाले लकड़ी के सूखे कुंदे 20 रूपये किलो मिल रहे हैं। बहुत से फुटकर लकड़ी की टालों पर तो माल ही खत्म हो गया है। कैटरर से लेकर होटल मालिक तक लकड़ी खरीदने के लिए ग्रामीण इलाकों का रुख कर रहे हैं। कोयले को लेकर भी मारामारी दिखाई दे रही है।

होटलों में इस्तेमाल होने वाला पत्थर का कोयला 60 रूपये किलो बिक रहा है, जबकि इमली का कोयला बाजार से गायब हो चुका है। कोयला मंडी के फर्रुख रहमान का कहना है कि राजधानी में आम दिनों में 60 से 70 कुंतल की मांग रहती थी, जो अचानक तीन गुना बढ़ गई है। इसलिए कीमतें बढ़ गई हैं और किल्लत भी दिख रही है।

First Published : March 13, 2026 | 7:54 PM IST