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पश्चिम एशिया संकट से इंडिया इंक पर दबाव, कंपनियों का घटेगा मुनाफा!

रेटिंग एजेंसी CRISIL के मुताबिक लंबे समय तक सप्लाई चेन में बाधाएं रहने से इस वित्त वर्ष में कंपनियों के परिचालन मुनाफे में करीब 200 बेसिस प्वाइंट (2%) की गिरावट आ सकती है

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रामवीर सिंह गुर्जर   
Last Updated- May 25, 2026 | 4:43 PM IST

West Asia crisis and India Inc profitability: पश्चिम एशिया में जारी लंबे संघर्ष का असर अब भारतीय कंपनियों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। इस संकट के कारण कंपनियों को अपनी सप्लाई चेन बदलनी पड़ रही है। साथ ही उन्हें कीमतों से जुड़ी दिक्कतों, ईंधन और माल ढुलाई की बढ़ती लागत तथा रुपये की कमजोरी जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। हालांकि मजबूत बैलेंस शीट, घरेलू मांग में स्थिरता और सरकार के पूंजीगत खर्च के दम पर भारतीय कंपनियां मजबूत बनी रहेंगी। इससे वे लंबे समय से जारी भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण मुनाफे पर पड़ने वाले दबाव का सामना कर सकेंगी। लेकिन मुनाफे में गिरावट आ सकती है।

कंपनियों के मुनाफे पर क्या होगा असर?

रेटिंग एजेंसी CRISIL ने कहा, “संघर्ष और उससे पैदा हुई बाधाएं अब तीसरे महीने में पहुंच चुकी हैं और हालात लगातार बदल रहे हैं। ऐसे में हमने 34 सेक्टरों का स्ट्रेस टेस्ट किया, जिनका हमारे रेटेड कॉरपोरेट कर्ज में 65% हिस्सा है। हमने अनुमान लगाया है कि इस वित्त वर्ष में सप्लाई चेन से जुड़ी दिक्कतें 9 महीने तक जारी रह सकती हैं, जबकि हमारे बेस केस में यह अवधि 6 महीने मानी गई थी। साथ ही, कच्चे तेल की औसत कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान है, जबकि बेस केस में इसे 95 डॉलर प्रति बैरल माना गया था।”

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CRISIL ने यह भी कहा, “हमने यह आकलन किया कि इन परिस्थितियों का अलग-अलग सेक्टरों की आय, परिचालन मुनाफे और मजबूत बैलेंस शीट के कारण उनकी मजबूती पर क्या असर पड़ेगा, ताकि कर्ज चुकाने की क्षमता पर प्रभाव समझा जा सके। नतीजों के आधार पर हमारा अनुमान है कि लंबे समय तक सप्लाई चेन में बाधाएं रहने से इस वित्त वर्ष में कंपनियों के परिचालन मुनाफे में करीब 200 बेसिस प्वाइंट (2%) की गिरावट आ सकती है। संघर्ष से पहले परिचालन मुनाफा करीब 12% रहने का अनुमान था, लेकिन कुछ सेक्टरों पर इसका असर ज्यादा गंभीर हो सकता है।”

मजबूत बेलेंसशीट बनी सहारा

पश्चिम एशिया संकट से कंपनियों का मुनाफा घट सकता है। लेकिन मजबूत बैलेंस शीट के कारण मुनाफे में बहुत बड़ी गिरावट की संभावना नहीं है। CRISIL के प्रबंध निदेशक सुबोध राय का कहना है कि कंपनियों के लिए बिक्री बढ़ाने से ज्यादा बड़ी चुनौती लागत और मुनाफे को संभालना होगी। जिन 34 सेक्टरों का स्ट्रेस टेस्ट किया गया, उनमें से 22 सेक्टरों का परिचालन मुनाफा 10% से ज्यादा घट सकता है। इसकी वजह बढ़ती इन्वेंट्री लागत और उपभोक्ताओं पर तुरंत पूरा बोझ नहीं डाल पाना है। हालांकि लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचाने से ज्यादातर सेक्टरों की राजस्व वृद्धि पर असर सीमित रहेगा। इसके अलावा, नियंत्रित कर्ज स्तर और मजबूत घरेलू मांग कंपनियों की वित्तीय स्थिति को सहारा देंगे। इसलिए हमारा मानना है कि केवल 8 सेक्टरों की कर्ज गुणवत्ता पर बड़ा असर पड़ेगा, जिनकी हिस्सेदारी हमारे रेटेड कॉरपोरेट कर्ज में करीब 10% है।

पिछले एक दशक में भारतीय कंपनियों का औसत कर्ज-इक्विटी अनुपात घटकर 0.5 गुना रह गया है, जबकि ब्याज चुकाने की क्षमता बढ़कर 5 गुना से अधिक हो गई है। इससे कंपनियों को बढ़ती लागत का सामना करने के लिए पर्याप्त वित्तीय मजबूती मिली है। कार्यशील पूंजी (वर्किंग कैपिटल) की जरूरत बढ़ने के बावजूद इस वित्त वर्ष में कंपनियों की बैलेंस शीट मजबूत बनी रहने की उम्मीद है।

सिरेमिक सेक्टर होगा सबसे ज्यादा प्रभावित

CRISIL की रिपोर्ट में कहा गया है कि सिरेमिक सेक्टर पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ेगा। गैस की कमी और सप्लाई बाधित होने से इस सेक्टर का राजस्व एक तिहाई तक घट सकता है, जबकि मुनाफा आधा रह जाने की आशंका है। इसके अलावा सात सेक्टरों की कर्ज गुणवत्ता पर मध्यम स्तर का नकारात्मक असर पड़ सकता है, जिसकी मुख्य वजह परिचालन मुनाफे में गिरावट होगी। इनमें से 6 सेक्टरों का परिचालन मुनाफा 10% से लेकर एक तिहाई तक घट सकता है, जबकि एयरलाइन सेक्टर का मुनाफा करीब 50% तक कम होने की आशंका है। इसकी वजह हवाई क्षेत्र बंद होने, ईंधन की बढ़ती कीमतें और कमजोर रुपया है।

कच्चे तेल से जुड़े सेक्टर जैसे पॉलिएस्टर टेक्सटाइल, स्पेशियलिटी केमिकल्स और फ्लेक्सिबल पैकेजिंग निर्माता बढ़ी हुई लागत का केवल कुछ हिस्सा ही ग्राहकों पर डाल पाएंगे, वह भी देरी से। ऑटो कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियों के पास आफ्टरमार्केट में बढ़ी उत्पादन लागत को ग्राहकों तक पहुंचाने की सीमित गुंजाइश होगी। साथ ही, कच्चे माल और मालभाड़ा लागत में बढ़ोतरी का असर भी देरी से पास ऑन हो सकेगा। हीरा पॉलिशिंग उद्योग के लिए वैकल्पिक केंद्रों से खरीद करने पर लागत बढ़ेगी, जिससे परिचालन मुनाफे पर असर पड़ेगा। बासमती चावल निर्यातकों को प्रमुख बाजारों में मांग घटने का सामना करना पड़ सकता है, जिससे राजस्व और परिचालन दक्षता प्रभावित होगी।

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रुपये में कमजोरी से कुछ सेक्टरों को फायदा

CRISIL की इस रिपोर्ट के अनुसार रुपये की कमजोरी से निर्यात आधारित सेक्टरों को फायदा हो सकता है। इनमें फार्मास्युटिकल्स, टेक्सटाइल, रेडीमेड गारमेंट्स, झींगा प्रोसेसिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग जैसे निर्यात आधारित सेक्टरों को रुपये में कमजोरी का फायदा मिल सकता है।

रुपये में गिरावट का असर भारतीय कंपनियों पर बहुत ज्यादा पड़ने की आशंका नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, ज्यादातर कंपनियों ने विदेशी मुद्रा जोखिम से बचाव के इंतजाम पहले से कर रखे हैं। कई कंपनियों को कारोबार के जरिए ही प्राकृतिक सुरक्षा मिल जाती है, जबकि कुछ ने फॉरवर्ड कवर लिया हुआ है। जहां ऐसी सुरक्षा नहीं है जैसे खाद्य तेल सेक्टर वहां कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों तक पहुंचाने में सक्षम रही हैं। इसके अलावा, भारतीय कंपनियों के कुल कॉरपोरेट कर्ज में विदेशी मुद्रा वाले कर्ज की हिस्सेदारी भी कम है और उसका बड़ा हिस्सा सुरक्षित (हेज्ड) है।

संकट और लंबा खिंचने पर पड़ेगा महंगाई व मांग दबाव

क्रिसिल रेटिंग्स के वरिष्ठ निदेशक सोमशेखर वेमुरी (Somasekhar Vemuri) ने कहा कि भारतीय कंपनियों की क्रेडिट क्वालिटी फिलहाल स्थिर बनी हुई है, लेकिन पश्चिम एशिया संघर्ष की दिशा और अवधि पर लगातार नजर रखने की जरूरत है। यदि संघर्ष और लंबा खिंचता है तो महंगाई बढ़ सकती है और मांग पर भी दबाव आ सकता है।

First Published : May 25, 2026 | 4:38 PM IST