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क्या है डिलिमिटेशन, और क्यों बढ़ रही है उत्तर-दक्षिण की टेंशन?

डिलिमिटेशन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें चुनावी इलाकों की सीमाएं दोबारा तय की जाती हैं

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सर्जना राय   
Last Updated- April 16, 2026 | 11:17 AM IST

देश की राजनीति में फिर से Delimitation का मुद्दा चर्चा में आ गया है। केंद्र सरकार 16 से 18 अप्रैल के बीच संसद के खास सत्र में संविधान संशोधन बिल और डिलिमिटेशन बिल 2026 लाने की तैयारी में है। इसका मतलब है कि आगे चलकर देश में चुनावी व्यवस्था में बड़े बदलाव हो सकते हैं। यह सिर्फ सीटों की सीमा तय करने की बात नहीं है, बल्कि इससे यह भी बदल सकता है कि किस राज्य की राजनीति में कितनी ताकत होगी। इसलिए अब डिलिमिटेशन सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं रहा, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है।

Delimitation आखिर है क्या, और इसे इतना अहम क्यों माना जाता है

डिलिमिटेशन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें चुनावी इलाकों की सीमाएं दोबारा तय की जाती हैं। यह काम जनसंख्या के हिसाब से किया जाता है, ताकि हर सीट पर लगभग बराबर लोग हों और हर सांसद या विधायक बराबर लोगों का प्रतिनिधित्व करे। इसका सीधा मतलब है कि हर वोट की कीमत एक जैसी होनी चाहिए। अगर कहीं बहुत ज्यादा लोग एक सीट पर हैं और कहीं बहुत कम, तो यह सही नहीं माना जाता। इसलिए समय समय पर इन सीमाओं को बदलना जरूरी होता है, ताकि सभी क्षेत्रों में संतुलन बना रहे और हर नागरिक की आवाज बराबर मानी जाए।

संविधान ने इस प्रक्रिया को कैसे दिशा दी

भारत के संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 बताते हैं कि Delimitation कैसे किया जाना चाहिए। इनके अनुसार चुनावी क्षेत्र ऐसे बनाए जाने चाहिए जो ज्यादा बिखरे हुए न हों, यानी एक साथ जुड़े हों। साथ ही प्राकृतिक सीमाओं जैसे नदियां या पहाड़ और प्रशासनिक सीमाओं का भी ध्यान रखा जाए। इसका मतलब है कि डिलिमिटेशन सिर्फ नंबर का खेल नहीं है। इसमें इलाके की स्थिति, सुविधा और संतुलन भी देखा जाता है। समय के साथ कुछ जगहों की आबादी तेजी से बढ़ती है और कुछ जगहों पर कम बढ़ती है। अगर ऐसे में सीमाएं नहीं बदली जाएं, तो कहीं एक नेता बहुत ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करेगा और कहीं कम लोगों का। इससे वोट की बराबरी बिगड़ जाती है।

भारत में Delimitation होता कैसे है

भारत में डिलिमिटेशन एक तय नियम के तहत होता है, ताकि इसमें राजनीति का दखल कम रहे और प्रक्रिया साफ और पारदर्शी बनी रहे। आम तौर पर जनगणना के बाद संसद एक कानून पास करती है, जिसके बाद केंद्र सरकार डिलिमिटेशन आयोग बनाती है। इस आयोग में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज अध्यक्ष होते हैं, साथ ही चुनाव आयोग के अधिकारी और राज्य चुनाव आयुक्त भी शामिल रहते हैं।

यह आयोग जनगणना के आंकड़ों के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाएं तय करता है। साथ ही यह भी तय करता है कि कौन सी सीटें एससी और एसटी के लिए आरक्षित होंगी। पहले एक ड्राफ्ट जारी किया जाता है, फिर लोगों से सुझाव और आपत्तियां ली जाती हैं। कई बार सार्वजनिक सुनवाई और परामर्श भी किए जाते हैं, ताकि स्थानीय स्तर की चिंताओं को शामिल किया जा सके।

जब पूरी प्रक्रिया खत्म हो जाती है, तो आयोग अंतिम फैसला जारी करता है। इस फैसले को कानूनी मान्यता मिलती है और इसे आसानी से अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। इसी वजह से यह प्रक्रिया लंबी कानूनी लड़ाई से बची रहती है।

आजादी के बाद शुरुआती दौर में Delimitation कैसे हुआ

आजादी के बाद भारत में Delimitation नियमित तरीके से होता रहा। संसद के कानून के तहत 1952, 1963, 1973 और 2002 में डिलिमिटेशन आयोग बनाए गए। 1952 में यह काम 1951 की जनगणना के आधार पर हुआ था, जबकि 1973 में 1971 की जनगणना को आधार बनाया गया। इसी समय तक लोकसभा की कुल सीटें 543 पर तय हो गई थीं।

उस दौर में डिलिमिटेशन के दो अहम काम होते थे। पहला, राज्यों के अंदर चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदलना। दूसरा, जनसंख्या के हिसाब से राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का बंटवारा करना। इसका सीधा मतलब था कि जिस राज्य की आबादी तेजी से बढ़ती थी, उसकी संसद में सीटें भी बढ़ सकती थीं। वहीं जहां आबादी धीमी गति से बढ़ती थी, वहां सीटों में कम बढ़ोतरी होती थी। यानी उस समय राजनीति में ताकत का सीधा रिश्ता जनसंख्या से जुड़ा हुआ था।

फिर ऐसा क्या हुआ कि सीटों का बंटवारा फ्रीज कर दिया गया

बाद में यही प्रक्रिया परेशानी का कारण बनने लगी। 1970 के दशक में सरकार परिवार नियोजन और जनसंख्या कंट्रोल पर जोर दे रही थी। ऐसे में एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ। अगर सीटों का बंटवारा सिर्फ जनसंख्या के हिसाब से होगा, तो जिन राज्यों ने आबादी कम करने में अच्छा काम किया, खासकर दक्षिण के राज्य, उनकी सीटें कम हो सकती थीं।

वहीं जिन राज्यों में आबादी तेजी से बढ़ रही थी, ज्यादातर उत्तर भारत के, उन्हें ज्यादा सीटें मिल जातीं। इससे संतुलन बिगड़ सकता था।

इसी चिंता को देखते हुए इंदिरा गांधी सरकार ने 1976 में 42वां संविधान संशोधन किया। इसके तहत राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का बंटवारा 1971 की जनगणना के आधार पर फ्रीज कर दिया गया। यानी हर राज्य को जितनी सीटें मिली थीं, वही तय कर दी गईं और आगे नहीं बदली गईं।

इस फैसले का मतलब यह था कि बाद में जनसंख्या बढ़ने या घटने का असर राज्यों के बीच सीटों पर तुरंत नहीं पड़ेगा। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया कि जो राज्य जनसंख्या कंट्रोल में आगे रहे, उन्हें नुकसान न हो। आसान शब्दों में कहें तो उस समय बराबर वोट के सिद्धांत से थोड़ा हटकर, कम जन्मदर को बढ़ावा देने पर ज्यादा ध्यान दिया गया।

2001 के बाद भी फ्रीज क्यों जारी रखा गया

जब 2001 आया, तब तक अलग अलग राज्यों की आबादी में फर्क और ज्यादा बढ़ चुका था। अगर उसी समय सीटों का फ्रीज हटा दिया जाता, तो संसद में ताकत का संतुलन पूरी तरह बदल सकता था। इससे कई राज्यों में राजनीतिक असहजता और विवाद पैदा हो सकते थे।

इसी वजह से सरकार ने 2001 में 84वां संविधान संशोधन किया। इसके तहत सीटों के बंटवारे पर लगा फ्रीज और 25 साल के लिए बढ़ा दिया गया, यानी 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक। इसका मतलब यह हुआ कि राज्यों के बीच सीटों की संख्या वही रही, उसमें कोई बदलाव नहीं किया गया। हालांकि राज्यों के अंदर चुनावी इलाकों की सीमाएं बदली गईं और आरक्षित सीटों को अपडेट किया गया।

यानी डिलिमिटेशन पूरी तरह बंद नहीं हुआ, लेकिन सीमित रूप में चलता रहा। अंदर के बदलाव होते रहे, लेकिन राज्यों के बीच सीटों के बंटवारे का बड़ा फैसला टाल दिया गया।

इस पूरे विवाद के केंद्र में असल टकराव क्या है

Delimitation की बहस के पीछे दो बड़ी बातें हैं, जो आमने सामने खड़ी हैं। पहली बात है बराबरी की, यानी हर सांसद या विधायक लगभग बराबर लोगों का प्रतिनिधित्व करे और हर वोट की कीमत एक जैसी हो। दूसरी बात है राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखना, यानी हर राज्य के साथ न्याय हो।

भारत जैसे देश में यह फैसला आसान नहीं है, क्योंकि हर राज्य की आबादी, विकास और हालात अलग अलग हैं।

एक तरफ लोग कहते हैं कि जब आबादी बदल गई है, तो संसद में सीटों का बंटवारा भी उसी हिसाब से बदलना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ यह डर भी है कि ऐसा करने से कुछ राज्यों की ताकत कम हो सकती है, खासकर वे राज्य जिन्होंने जनसंख्या कंट्रोल में अच्छा काम किया है।

इसी वजह से यह मामला सिर्फ नंबर का नहीं है, बल्कि भरोसे, राज्यों के बीच संतुलन और पूरे देश के ढांचे से जुड़ा हुआ बड़ा मुद्दा बन गया है।

दक्षिण बनाम उत्तर की आशंका क्यों उभर रही है

इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि अगर आगे चलकर सीटों का बंटवारा नई जनसंख्या के हिसाब से हुआ, तो दक्षिण भारत के कुछ राज्यों की संसद में हिस्सेदारी कम हो सकती है। वहीं उत्तर भारत के ज्यादा आबादी वाले राज्यों की ताकत बढ़ सकती है। PASG के सीईओ नितीश शर्मा का कहना है कि अगर दक्षिणी राज्यों को यह लगा कि उनकी सीटें घटेंगी, तो उन्हें इस फैसले के लिए तैयार करना आसान नहीं होगा, चाहे सरकार कोई भी तरीका क्यों न अपनाए। उनका यह भी मानना है कि इस मुद्दे को सिर्फ उत्तर बनाम दक्षिण के नजरिए से नहीं देखना चाहिए, बल्कि अलग अलग राज्यों के बीच जो असमानताएं हैं, उन्हें समझकर ज्यादा संतुलित तरीके से हल निकालना चाहिए।

Delimitation सिर्फ सीमाओं का मामला नहीं, लोकतंत्र की दिशा का सवाल है

सीटों के बंटवारे को फ्रीज करना उस समय राजनीतिक तनाव कम करने का एक तरीका था, लेकिन इससे एक बड़ा सवाल आगे के लिए टाल दिया गया। असली सवाल यह है कि बदलते भारत में प्रतिनिधित्व कैसे तय होना चाहिए। क्या संसद में सीटें पूरी तरह मौजूदा आबादी के हिसाब से होनी चाहिए, या फिर राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए कोई अलग तरीका अपनाना चाहिए। इसी वजह से 2026 के आसपास होने वाला अगला डिलिमिटेशन सिर्फ एक सामान्य प्रक्रिया नहीं होगा। यह तय करेगा कि भारत का लोकतंत्र, राज्यों के बीच संतुलन और राजनीतिक ताकत आगे कैसे बदलेगी।

First Published : April 16, 2026 | 10:43 AM IST