प्रतीकात्मक फोटो
क्या दुनिया एक नए ‘China Shock 2.0’ की तरफ बढ़ रही है? कभी सस्ते चीनी सामान ने अमेरिका में लाखों फैक्ट्री नौकरियां खत्म कर दी थीं, और अब वही खतरा यूरोप के सामने खड़ा होता दिख रहा है। अमेरिकी टैरिफ के बावजूद चीन का निर्यात पहले से ज्यादा हुआ है। इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरियों, सोलर पैनल से लेकर हाई-टेक मशीनरी तक, चीनी उत्पाद वैश्विक बाजारों में तेजी से अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं। इसका असर यूरोप की इंडस्ट्रियल इकॉनमी, खासकर जर्मनी जैसे देशों पर साफ दिखाई देने लगा है। यही वजह है कि फ्रांस में हो रहे G7 शिखर सम्मेलन (G7 Summit) में चीन की व्यापार नीतियां और बढ़ती निर्यात ताकत प्रमुख मुद्दों में शामिल हो गई हैं। ऐसे यह है कि क्या दुनिया चीन के बढ़ते आर्थिक दबदबे का मुकाबला करने के लिए नई रणनीति बनाएगी, या फिर यूरोप भी अमेरिका की तरह एक बड़े इंडस्ट्रियल शॉक का सामना करना पड़ सकता है?
एपी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि पिछले आठ सालों से अमेरिका चीन के खिलाफ आर्थिक मोर्चे पर लड़ाई लड़ रहा है। अमेरिका ने चीनी उत्पादों पर भारी आयात शुल्क (टैरिफ) लगाया ताकि वे अमेरिकी बाजार में महंगे हो जाएं। लेकिन इससे चीन की औद्योगिक ताकत पर कोई खास असर नहीं पड़ा। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन पहले से ज्यादा सामान निर्यात कर रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब वह अपना माल अमेरिकी बाजार की बजाय यूरोप और एशिया के अन्य खुले बाजारों की ओर भेज रहा है।
चीन के इस बढ़ते निर्यात से यूरोप को भी वैसा ही झटका लग सकता है जैसा 2000 के दशक में अमेरिका को लगा था। उस समय चीन से सस्ते सामान की बाढ़ आने के कारण अमेरिका में लाखों फैक्ट्री नौकरियां खत्म हो गई थीं। इसे ही ‘चाइना शॉक’ कहा गया था। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन ने पिछले साल 1.2 ट्रिलियन डॉलर का रिकॉर्ड ग्लोबल ट्रेड सरप्लस दर्ज किया।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस साल की शुरुआत में चेताया था कि चीनी निर्यात “यूरोप के बड़े हिस्से की इंडस्ट्री को खत्म कर रहा है।” उन्होंने यह भी माना कि यूरोप को इस खतरे का एहसास होने में काफी देर लगी। अब यूरोपीय देश की आंख खुल गई है और वे इस चुनौती को गंभीरता से ले रहे हैं। फ्रांस के एवियन-ले-बैंस में हो रहे G7 शिखर सम्मेलन में चीन की व्यापार नीति प्रमुख मुद्दों में शामिल है। फ्रांस चाहता है कि सम्मेलन से चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए कोई ठोस रणनीति निकले।
एक संभावना यह भी है कि यूरोपीय यूनियन और अन्य देश चीन के उत्पादों पर अधिक टैरिफ लगाएं। फिलहाल WTO नियमों के तहत यूरोप चीन पर अपेक्षाकृत कम शुल्क लगाता है, हालांकि कुछ उत्पादों जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) पर 35 फीसदी तक टैरिफ लगाया गया है।
पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स के सीनियर फेलो और IMF के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री मॉरिस ऑब्स्टफेल्ड का कहना है कि अगर चीन ने अपने निर्यात पर नियंत्रण नहीं किया तो दुनिया भर में संरक्षणवादी नीतियां बढ़ सकती हैं।
HSBC के अर्थशास्त्री टेलर वांग के अनुसार, चीन और यूरोप के बीच व्यापार विवाद बढ़ने पर चीनी निर्यात को बड़ा झटका लग सकता है। यूरोप चीन के इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर पैनल और लिथियम-आयन बैटरियों का बड़ा खरीदार है। यूरोपीय देश अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को भी यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे यूरोपीय यूनियन और कनाडा जैसे सहयोगी देशों पर टैरिफ लगाने के बजाय चीन की चुनौती से निपटने में उनके साथ काम करें।
पहला ‘China Shock’ 2001 के आसपास शुरू हुआ था, जब चीन विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शामिल हुआ और उसे अमेरिका तथा यूरोप जैसे बड़े बाजारों तक आसान पहुंच मिल गई। उस दौरान चीन के सस्ते कपड़े, फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य उत्पादों ने अमेरिकी इंडस्ट्री को कड़ी चुनौती दी। MIT के अर्थशास्त्री डेविड ऑटोर, यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिख के डेविड डोर्न और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के गॉर्डन हैनसन के शोध के अनुसार, चीन से बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण अमेरिका में करीब 24 लाख नौकरियां खत्म हो गई थीं।
लेकिन “China Shock 2.0” पहले से अलग है। पहले चीन वैश्विक व्यापार में उभरती ताकत था, लेकिन अब वह दुनिया के मैन्यूफैक्चरिंग और ट्रेड पर हावी है। साल 2000 में ग्लोबल वस्तु निर्यात में चीन की हिस्सेदारी केवल 4 फीसदी थी। अब यह बढ़कर 16 फीसदी हो गई है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। इसके अलावा चीन अब सिर्फ सस्ते सामान ही नहीं, बल्कि इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, एडवांस मशीनरी, सॉफ्टवेयर और वैज्ञानिक उपकरण जैसे हाई-टेक उत्पाद भी निर्यात कर रहा है। इससे वह सीधे दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाओं को चुनौती दे रहा है।
कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री ईश्वर प्रसाद के अनुसार, ‘दूसरा चाइना शॉक इसलिए ज्यादा खतरनाक है क्योंकि चीन अब कम तकनीक वाले इंडस्ट्री से लेकर हाई तकनीक वाले क्षेत्रों तक हर जगह प्रतिस्पर्धा कर रहा है।’
एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोप में जर्मनी को सबसे बड़ा झटका लगा है। पहले जर्मन कंपनियां चीन को बड़े पैमाने पर निर्यात करती थीं, लेकिन अब स्थिति उलट गई है। चीन जर्मनी को उससे ज्यादा सामान बेच रहा है जितना वह खरीदता है। जर्मन कंपनियों को औद्योगिक मशीनरी, निर्माण उपकरण, ऑटोमोबाइल और रसायन जैसे क्षेत्रों में चीनी कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है। चीन से बढ़ती प्रतिस्पर्धा जर्मनी की आर्थिक सुस्ती की एक बड़ी वजह है। जर्मनी की अर्थव्यवस्था 2023 और 2024 में सिकुड़ी और पिछले साल सिर्फ 0.2 फीसदी की दर से बढ़ी।
2000 के दशक की तुलना में अमेरिका अब कम प्रभावित है। ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ के कारण बड़ी मात्रा में चीनी उत्पाद अमेरिकी बाजार में नहीं पहुंच पा रहे हैं। अमेरिकी वाणिज्य विभाग के अनुसार, जनवरी से अप्रैल 2026 के दौरान चीन से अमेरिका को होने वाला निर्यात पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 37 फीसदी घट गया। अमेरिका को एक और फायदा यह है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खुद पूरा करता है, जबकि यूरोप और जापान अभी भी आयात पर निर्भर हैं।
ट्रंप के टैरिफ और अमेरिका में बिक्री घटने के बावजूद, चीन को अपनी सस्ती इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EVs) की बढ़ती मांग और AI में निवेश से फायदा हो रहा है। इस निवेश से डेटा सेंटर्स के लिए चीनी इलेक्ट्रिकल पार्ट्स और मशीनरी की बिक्री बढ़ रही है। जनवरी से मई के बीच, चीन से 27 देशों वाले EU को होने वाला एक्सपोर्ट पिछले साल के मुकाबले 16.4% बढ़ गया। फ्रांस के मामले में, बीजिंग के कस्टम्स आंकड़ों के मुताबिक, चीन के साथ उसका ट्रेड डेफिसिट पिछले साल के 3.3 अरब डॉलर से बढ़कर 5.3 अरब डॉलर हो गया।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि चीन की नीतियां उत्पादन बढ़ाने और घरेलू खपत को सीमित रखने को प्रोत्साहित करती हैं। सरकारी बैंक बचतकर्ताओं को कम ब्याज देते हैं लेकिन सरकारी कंपनियों को सस्ते कर्ज उपलब्ध कराते हैं। वहीं कमजोर सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के कारण लोग खर्च करने के बजाय ज्यादा बचत करते हैं। इससे चीन में उत्पादों की अधिकता पैदा होती है, जिसे विदेशों में निर्यात करना पड़ता है।
मॉरिस ऑब्स्टफेल्ड ने कहा कि इन नीतियों का मकसद कुछ हद तक कारखानों को चालू रखना और मजदूरों को रोजगार देना है। उन्होंने कहा कि इन नीतियों का नतीजा यह है कि मैन्युफैक्चर किए गए सामान की घरेलू सप्लाई जरूरत से ज्यादा हो जाती है, जिसे विदेशों में एक्सपोर्ट करना ही पड़ता है। इसलिए कम कीमत वाले चीनी सामान दुनिया भर के बाजारों में भर जाते हैं और यूरोप व अन्य जगहों के कारखानों के बंद होने का खतरा पैदा कर देते हैं।
बीजिंग ने कंपनियों को अपने ही देश में एक-दूसरे के साथ जबरदस्त मुकाबला करने के लिए भी बढ़ावा दिया है। ऑटोर और हैनसन ने पिछले साल न्यूयॉर्क टाइम्स के एक कॉलम में लिखा था, “बाकी दुनिया इन ‘टॉप प्रीडेटर्स’ (सबसे ताकतवर प्रतिस्पर्धियों) का मुकाबला करने के लिए तैयार नहीं है।”
चीन ने बार-बार वादा किया है कि वह जरूरत से ज्यादा प्रोडक्शन पर लगाम लगाएगा और कंज्यूमर स्पेंडिंग को बढ़ावा देगा- जैसा कि अमेरिका और दूसरे देश दशकों से कहते आ रहे हैं। इससे उसकी इकॉनमी एक्सपोर्ट पर कम निर्भर होगी और वहां के लोगों की हालत बेहतर होगी। साथ ही, इससे अमेरिका और यूरोप को अपना सामान बेचने के लिए एक बढ़ता हुआ बाजार भी मिलेगा।
ऑब्स्टफेल्ड ने कहा, “वहां की लीडरशिप लंबे समय से कहती आ रही है कि यह उनका लक्ष्य है, लेकिन वे इस बात को सच साबित करने के लिए बहुत धीरे-धीरे कदम उठा रहे हैं।”
एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और अमेरिका की पूर्व व्यापार वार्ताकार वेंडी कटलर का कहना है, “चीन लंबे समय से अपनी अतिरिक्त उत्पादन क्षमता की समस्या का समाधान दुनिया के बाकी देशों पर छोड़ता आया है। लेकिन अगर यूरोप और अन्य देश भी अमेरिका की तरह चीनी आयात पर सख्ती करते हैं, तो यह स्थिति बदल सकती है।”