US Iran Ceasefire: अमेरिका और ईरान के बीच बीते 36 घंटों में ऐसा घटनाक्रम देखने को मिला जिसने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। माहौल इतना तनावपूर्ण था कि एक पल लग रहा था कि बड़ा युद्ध शुरू होने वाला है, और अगले ही पल अचानक सीजफायर की घोषणा हो गई। लेकिन इस पूरी कहानी के अंदर डर, धमकी, अफरा-तफरी और कूटनीति का ऐसा मिश्रण है, जो दिखाता है कि खतरा अभी टला नहीं है।
न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार की शाम वॉशिंगटन में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप व्हाइट हाउस में बैठे हालात पर नजर रख रहे थे। उनके सामने साफ डेडलाइन थी कि अगर रात 8 बजे तक ईरान स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज नहीं खोलता, तो अमेरिका बड़ा सैन्य कदम उठाएगा। ट्रंप का रुख बेहद सख्त था। उन्होंने यहां तक कह दिया कि जरूरत पड़ी तो वह “पूरी सभ्यता मिटा देंगे”। बैठकों के दौरान भी वे बार-बार अधिकारियों को बताते रहे कि ईरान में कितने पुल, कितने बिजली घर और कौन-कौन से अहम ठिकाने हैं, जिन्हें निशाना बनाया जा सकता है।
इसी बीच उन्हें खुफिया जानकारी दी गई कि ईरान में लोग उन जगहों पर इकट्ठा हो रहे हैं, जहां हमले हो सकते हैं। ट्रंप ने टीवी पर ये तस्वीरें देखीं और कहा कि अगर इन हमलों में आम लोग मारे जाते हैं, तो इसकी जिम्मेदारी ईरान की होगी। उन्होंने ईरानी नेताओं को “खतरनाक” बताया और कहा कि वे अपने ही लोगों को खतरे में डाल रहे हैं।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, ईरान के अंदर डर साफ दिखने लगा। रिपोर्ट बताती है कि तेहरान समेत कई शहरों में लोग घबरा गए। दुकानों पर भीड़ उमड़ पड़ी। लोग खाने-पीने का सामान, पानी, बैटरी, मोमबत्तियां सब कुछ खरीदने लगे। कुछ लोगों ने अपने घरों में बर्फ जमा की, ताकि बिजली जाने पर खाना खराब न हो। हजारों लोग शहर छोड़कर सुरक्षित जगहों की ओर भागने लगे। सड़कों पर इतना जाम लग गया कि पुलिस को रास्ते बंद करने पड़े। माहौल ऐसा था जैसे किसी बड़े हमले से पहले का सन्नाटा और डर एक साथ फैल गया हो।
अमेरिका में भी इस स्थिति को लेकर बेचैनी थी। ट्रंप के अपने सहयोगियों ने भी उनके बयान पर सवाल उठाए। कुछ नेताओं ने उम्मीद जताई कि शायद यह सिर्फ दबाव बनाने की रणनीति है। वहीं विपक्षी नेताओं ने साफ कहा कि अमेरिका को इस तरह के युद्ध में नहीं उलझना चाहिए।
लेकिन इसी तनाव के चरम पर कहानी अचानक पलट गई। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान, चीन, तुर्की, कतर और मिस्र जैसे देशों ने तेजी से बीच-बचाव शुरू किया। फोन कॉल पर फोन कॉल हुए, बातचीत का दौर चला। खासतौर पर चीन ने ईरान को समझाया कि यह मौका हाथ से निकल गया तो हालात और बिगड़ सकते हैं।
फिर घटनाएं तेजी से आगे बढ़ीं। पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने ट्रंप से बात की और बताया कि ईरान सीजफायर के लिए तैयार है। ट्रंप ने तुरंत जवाब दिया कि अगर ईरान मानता है, तो अमेरिका भी तैयार है। इसके बाद उन्होंने इजरायल के प्रधानमंत्री को भी जानकारी दी। और फिर अचानक दुनिया ने देखा कि ट्रंप ने सोशल मीडिया पर ऐलान कर दिया कि दो हफ्ते के लिए बमबारी रोकी जाएगी और शांति की कोशिश होगी।
सीजफायर के ऐलान के बाद अमेरिका ने इसे बड़ी जीत बताया। रक्षा मंत्री और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि उनके सभी सैन्य लक्ष्य पूरे हो चुके हैं और यह एक ऐतिहासिक सफलता है। लेकिन असली कहानी यहीं से और पेचीदा हो जाती है।
रिपोर्ट कहती है कि यह समझौता शुरू से ही कमजोर था। दोनों देशों के बीच इस बात पर कोई साफ सहमति नहीं थी कि युद्ध कैसे खत्म होगा। पाकिस्तान ने कहा कि यह सीजफायर हर जगह लागू होगा, जिसमें लेबनान भी शामिल है। लेकिन ट्रंप ने बाद में साफ कर दिया कि लेबनान का मामला अलग है। इसी दौरान इजरायल ने लेबनान पर फिर से भारी हमले शुरू कर दिए, जिससे स्थिति और उलझ गई।
ईरान की तरफ से भी सख्त बयान सामने आए। वहां के नेताओं ने कहा कि उन्होंने इस संघर्ष में बढ़त बनाई है और अब वे अपने फायदे के हिसाब से ही कोई समझौता करेंगे। संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने अमेरिका पर भरोसा करने से इनकार किया और कहा कि बातचीत का कोई मतलब नहीं है, जब हमले जारी हैं और परमाणु मुद्दे पर दबाव बनाया जा रहा है।
सबसे अहम बात यह है कि जिस मुद्दे से पूरा विवाद शुरू हुआ, यानी स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज , उस पर अब भी कोई साफ स्थिति नहीं है। यह खुला रहेगा या नहीं, इस पर कोई ठोस जवाब नहीं मिला है। साथ ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी मामला अटका हुआ है।
अमेरिकी अधिकारियों ने साफ कहा है कि अगर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज नहीं खुलता, तो यह पूरा समझौता कभी भी टूट सकता है। यानी जो सीजफायर अभी राहत की खबर लग रहा है, वह बहुत नाजुक है और कभी भी खत्म हो सकता है। (न्यूयॉर्क टाइम्स के इनपुट के साथ)