चाबहार बंदरगाह दक्षिण-पूर्वी ईरान में ओमान की खाड़ी के तट पर स्थित है | फोटो: Commons
दक्षिण-पूर्वी ईरान में ओमान की खाड़ी के तट पर स्थित चाबहार बंदरगाह, जो कभी भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी रणनीतिक जीत माना जाता था, आज अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ दिनों से कूटनीतिक गलियारों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में यह चर्चा जोरों पर है कि भारत अपने इस ‘सपनों के प्रोजेक्ट’ से पीछे हट रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों की समय सीमा समाप्त होने और पश्चिम-एशिया में बढ़ते युद्ध के तनाव ने इस प्रोजेक्ट के भविष्य पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अब प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की कुर्बानी दे रहा है या फिर यह तेहरान के साथ मिलकर बिछाई गई कोई ऐसी नई बिसात है, जिसका खुलासा होना अभी बाकी है।
इस पूरे संकट की मुख्य वजह 26 अप्रैल 2026 की वह तारीख है, जब अमेरिका द्वारा चाबहार पोर्ट को दी गई ‘प्रतिबंधों से विशेष छूट’ की समय सीमा समाप्त हो गई। भारत ने पिछली बार बहुत मशक्कत के बाद वाशिंगटन से यह रियायत हासिल की थी, लेकिन इस बार अमेरिकी प्रशासन का रुख बेहद सख्त और समझौताविहीन दिखाई दे रहा है।
हालिया मीडिया रिपोर्ट्स, खासकर न्यूज एजेंसी ब्लूमबर्ग की खबरों ने इस चर्चा को हवा दी है कि इसके बाद भारत सरकार अपनी प्रमुख कंपनी ‘इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल’ (IPGL) की हिस्सेदारी को एक स्थानीय ईरानी कंपनी को ट्रांसफर करने के प्रस्ताव पर चुपचाप काम कर रही है।
भारत ने इस पोर्ट के ‘शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल’ को विकसित करने और उसे आधुनिक उपकरणों से लैस करने के लिए 120 मिलियन डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है। लेकिन इस साल के बजट में चाबहार के लिए अलग से कोई फंड नहीं रखा गया, जिससे यह संकेत मिलता है कि भारत अब नए निवेश की जगह सतर्क रुख अपनाता नजर आ रहा है।
चाबहार बंदरगाह की अहमियत समझने के लिए भारत की भौगोलिक मजबूरी को समझना जरूरी है। पाकिस्तान से समय समय पर विवाद के चलते वह भारत को अपनी जमीन के रास्ते अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बाजारों तक पहुंचने की इजाजत नहीं देता रहा है। ऐसे में चाबहार भारत के लिए एक अहम रास्ता बनकर उभरा, जिसके जरिए भारत अरब सागर पार कर ईरान पहुंच सकता था और वहां से सड़क और रेल नेटवर्क के माध्यम से सीधे काबुल, ताशकंद और मॉस्को तक अपना व्यापार बढ़ा सकता था।
यह प्रोजेक्ट भारत के लिए सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक नजरिए से भी बेहद अहम है। इसे चीन की मदद से पाकिस्तान में विकसित किए गए ग्वादर बंदरगाह के मुकाबले भारत का सबसे बड़ा और प्रभावी जवाब माना जाता है। ग्वादर और चाबहार के बीच सिर्फ 140 किलोमीटर की दूरी है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर भारत चाबहार पर अपनी पकड़ कमजोर करता है, तो अरब सागर और ओमान की खाड़ी में चीन-पाकिस्तान की बढ़ती साझेदारी के सामने उसकी रणनीतिक स्थिति कमजोर पड़ सकती है।
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कूटनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, भारत सरकार इस समय चाबहार को लेकर बेहद संतुलित ‘एग्जिट और एंट्री’ रणनीति पर काम कर रही है। एक तरफ भारत अपने 120 मिलियन डॉलर के निवेश को बेकार नहीं जाने देना चाहता, तो दूसरी तरफ वह ‘सागरमाला फाइनेंस कॉर्पोरेशन’ जैसी बड़ी कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंधों के खतरे से भी बचाना चाहता है।
इसी वजह से अपनी हिस्सेदारी किसी स्थानीय ईरानी कंपनी को ट्रांसफर करने का प्रस्ताव सामने आया है। एक्सपर्ट इसे पूरी तरह पीछे हटना नहीं, बल्कि एक तरह का ‘टैक्टिकल पॉज’ यानी रणनीतिक ठहराव मान रहे हैं।
इस रणनीति के तहत भारत कागजों पर पोर्ट के संचालन से अलग दिखाई दे सकता है, लेकिन पर्दे के पीछे से तकनीकी और रणनीतिक सहयोग जारी रख सकता है। भारत की कोशिश है कि अगर भविष्य में अमेरिका और ईरान के रिश्तों में सुधार होता है या प्रतिबंधों में ढील मिलती है, तो वह तुरंत अपनी हिस्सेदारी वापस लेकर फिर से सक्रिय भूमिका निभा सके।
एक्सपर्ट इसे एक तरह की ‘होल्डिंग’ रणनीति मानते हैं, जिसे भारत ने मजबूरी और रणनीतिक समझदारी दोनों को ध्यान में रखकर तैयार किया है।
एक तरफ दुनिया भर के मीडिया में भारत के पीछे हटने की चर्चा हो रही है, वहीं ईरान का रुख इससे बिल्कुल अलग और काफी भरोसे से भरा दिखाई देता है। भारत में ईरान के राजदूत डॉ. मोहम्मद फतहाली ने ऐसी खबरों को सिर्फ ‘अटकलें’ बताते हुए खारिज कर दिया।
एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में फतहाली ने दावा किया कि चाबहार प्रोजेक्ट न कभी रुका है और न ही इसके रुकने की कोई संभावना है। उन्होंने ये बताते हुए कुछ अहम आंकड़े भी साझा किए, जो इस पूरी कहानी का दूसरा पक्ष सामने रखता है।
फतहाली के मुताबिक, चाबहार-जाहेदान रेलवे लाइन का काम, जिसे इस पोर्ट की सफलता की रीढ़ माना जाता है, करीब 90 प्रतिशत पूरा हो चुका है। तेहरान को उम्मीद है कि जून 2026 के मध्य तक इस रेल लाइन पर पटरी बिछाने का काम पूरा हो जाएगा। इसके बाद चाबहार सीधे ईरान के राष्ट्रीय रेल नेटवर्क से जुड़ जाएगा।
ईरानी राजदूत ने यह भी कहा कि बंदरगाह के आसपास अस्पताल और होटल जैसे जरूरी बुनियादी ढांचे का निर्माण सितंबर 2026 तक पूरा कर लिया जाएगा। ईरान का संदेश साफ है कि वह भारत के साथ अपने आर्थिक संबंधों को किसी तीसरे देश के दबाव में आकर कमजोर नहीं होने देना चाहता। हालांकि बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत की कंपनियां इस प्रोजेक्ट से जुड़े जोखिम उठाने के लिए तैयार होंगी।
इस संकट की गंभीरता को समझने के लिए एक्सपर्टों की राय काफी अहम है। VetoAI में ग्रोथ एंड लीगल के हेड विमर्श रैना इस पूरे मामले को कानूनी और तकनीकी नजरिए से देखते हैं। उनका कहना है कि अमेरिका के ‘काटसा’ (CAATSA) जैसे सख्त कानून वैश्विक कारोबार में ऐसा डर पैदा कर देते हैं कि बैंक, बीमा कंपनियां और शिपिंग ऑपरेटर ईरान से जुड़े किसी भी प्रोजेक्ट से दूरी बनाने लगते हैं।
विमर्श रैना के मुताबिक, चाबहार पोर्ट भारत की कनेक्टिविटी से जुड़ी समस्या का एक स्थायी समाधान है, क्योंकि इससे पाकिस्तान पर निर्भरता खत्म होती है। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों का दबाव इस प्रोजेक्ट की रफ्तार और कामकाज दोनों को काफी धीमा कर देता है।
वह बताते हैं कि भले ही कागजों पर कुछ छूट दी गई हो, लेकिन जमीन पर अनिश्चितता इतनी ज्यादा है कि प्रोजेक्ट को तय समय पर पूरा करना और निजी साझेदारों को साथ बनाए रखना बेहद मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि भारत अब ‘हिस्सेदारी ट्रांसफर’ जैसे कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहा है, ताकि उसकी कंपनियां वैश्विक बाजार में किसी तरह के प्रतिबंध या नुकसान से बच सकें।
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इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा खतरा ‘स्ट्रैटेजिक वैक्यूम’ यानी सामरिक खालीपन का माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह पुराना सिद्धांत है कि कोई भी अहम जगह लंबे समय तक खाली नहीं रहती। एग्रीकेयर कॉर्पोरेशन के CEO और SFIA के राष्ट्रीय सचिव विनोद गोयल भी इसी खतरे की ओर इशारा करते हैं। उनका कहना है कि अगर भारत चाबहार से पीछे हटता है, तो चीन वहां अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार बैठा है।
विनोद गोयल का कहना है कि चीन पहले से ही ईरान के साथ 25 साल के बड़े रणनीतिक समझौते पर काम कर रहा है। उनका मानना है कि खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के दौरान चीन ने जिस तरह ईरान का समर्थन किया है, उससे तेहरान और बीजिंग के रिश्ते और मजबूत हो सकते हैं।
गोयल के मुताबिक, अगर चाबहार और ग्वादर दोनों बंदरगाह चीन के प्रभाव में आ जाते हैं, तो हिंद महासागर और अरब सागर के व्यापारिक मार्गों पर भारत के लिए अपनी रणनीतिक सुरक्षा बनाए रखना बेहद मुश्किल हो जाएगा। वह जोर देकर कहते हैं कि पाकिस्तान आगे भी भारत के लिए चुनौती बना रहेगा और ऐसे में चाबहार ही मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए भारत का सबसे अहम रणनीतिक विकल्प है।
चाबहार प्रोजेक्ट का भविष्य अब भारत के निवेश से कहीं बढ़कर उसकी विदेश नीति की दृढ़ता की परीक्षा बन चुका है। विमर्श रैना जैसे एक्सपर्ट मानते हैं कि चाबहार 7200 किलोमीटर की इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसके बिना भारत की मध्य एशिया और रूस तक पहुंचने की योजना अधूरी रह जाएगी। वहीं विनोद गोयल जैसे जानकारों का मानना है कि अमेरिका की खुद की ‘चीन-विरोधी नीति’ उसे अंततः भारत की चाबहार में मौजूदगी का समर्थन करने के लिए मजबूर करेगी, क्योंकि अमेरिका भी नहीं चाहेगा कि यह रणनीतिक पोर्ट चीन के कब्जे में चला जाए।
एक्सपर्ट्स इस बात पर सहमत हैं कि आज की स्थिति में यह कहना गलत होगा कि भारत का चाबहार सपना खत्म हो चुका है, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि फिलहाल यह सपना ‘कोल्ड स्टोरेज’ में चला गया है। भारत इस वक्त बेहद ‘नाजुक संतुलन’ साधने की कोशिश कर रहा है। एक तरफ वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और क्षेत्रीय हितों को बचाए रखना चाहता है, तो दूसरी तरफ दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अमेरिका के साथ अपने रिश्तों को भी सुरक्षित रखना उसकी मजबूरी है।
एक्सपर्ट्स का दावा है कि आने वाले कुछ महीने यह तय करेंगे कि भारत इस ‘शतरंज के खेल’ में अपनी सबसे अहम चाल कैसे चलता है और क्या वह उस दरवाजे को खुला रख पाता है, जिसे उसने दो दशकों की मेहनत और अरबों रुपये के निवेश से तैयार किया था। फिलहाल चाबहार की कहानी खत्म नहीं हुई है, लेकिन यह जरूर एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है जहां से आगे का रास्ता काफी मुश्किल और अनिश्चित दिखाई देता है।