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ट्रंप को बड़ा कानूनी झटका: अमेरिकी अदालत ने 10% ग्लोबल टैरिफ को बताया गैरकानूनी

फेडरल ट्रेड कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के टैरिफ फैसले पर लगाई रोक, छोटे कारोबारियों और राज्यों को मिली राहत

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एजेंसियां   
Last Updated- May 08, 2026 | 8:52 AM IST

अमेरिका की एक फेडरल ट्रेड कोर्ट ने राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए 10 प्रतिशत वैश्विक टैरिफ को गैरकानूनी करार देते हुए उसके लागू करने पर रोक लगा दी है। यह फैसला ट्रंप प्रशासन के आर्थिक एजेंडे के लिए एक और बड़ा झटका माना जा रहा है। इससे कुछ ही महीने पहले अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप द्वारा लगाए गए पहले के कुछ टैरिफ को भी रद्द कर दिया था।

ब्लूमबर्ग की खबर के मुताबिक, मैनहट्टन स्थित यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में तीन जजों की डिविजन बेंच ने गुरुवार को छोटे व्यवसायों के एक समूह और ज्यादातर डेमोक्रेट शासित दो दर्जन राज्यों की उस याचिका को मंजूरी दे दी, जिसमें इन टैरिफ को अमान्य घोषित करने की मांग की गई थी। ट्रंप ने फरवरी में 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत 10 प्रतिशत शुल्क लगाया था। इस धारा का पहले कभी इस्तेमाल नहीं किया गया था। हालांकि अदालत ने फिलहाल केवल उन दो कंपनियों और वॉशिंगटन राज्य के खिलाफ इन टैरिफ को लागू करने से प्रशासन को रोका है, जिन्होंने मुकदमा दायर किया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह तथाकथित “यूनिवर्सल इंजंक्शन” जारी नहीं कर रही है।

बेंच ने कहा कि अन्य राज्यों के पास कानूनी आधार (स्टैंडिंग) नहीं है, क्योंकि वे सीधे आयातक नहीं हैं। राज्यों का तर्क था कि जब कंपनियां टैरिफ की लागत ग्राहकों पर डालती हैं तो उन्हें महंगे सामान खरीदने पड़ते हैं, जिससे उन्हें नुकसान होता है। गुरुवार शाम इस फैसले पर पूछे जाने पर ट्रंप ने पत्रकारों से कहा, “हमारे खिलाफ दो कट्टर वामपंथी जजों ने फैसला दिया। इसलिए अदालतों से मुझे कोई हैरानी नहीं होती। बिल्कुल भी नहीं। हम हमेशा दूसरा रास्ता निकाल लेते हैं। एक फैसला आता है और हम दूसरा तरीका अपना लेते हैं।”

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि यह फैसला उन अन्य आयातकों के लिए क्या मायने रखेगा, जो इन विवादित शुल्कों का भुगतान कर रहे हैं। लिबर्टी जस्टिस सेंटर के वरिष्ठ वकील जेफ्री श्वाब, जिन्होंने इस मामले में छोटे व्यवसायों का प्रतिनिधित्व किया, ने कहा कि आगे की प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रशासन किस तरह प्रतिक्रिया देता है और क्या अमेरिकी न्याय विभाग इस फैसले के खिलाफ अपील करेगा। न्याय विभाग के एक प्रवक्ता ने इस पर टिप्पणी के अनुरोध का तत्काल जवाब नहीं दिया।

मुकदमा दायर करने वाली कंपनियों में से एक बेसिक फन इंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जे फोरमैन ने पत्रकारों से बातचीत में इस फैसले की सराहना की। उन्होंने कहा कि छोटे व्यवसायों द्वारा इस मुद्दे पर खुलकर सामने आना “बहुत साहस और हिम्मत” का काम था। फोरमैन ने कहा कि उनकी कंपनी इन टैरिफ के लागू होने के बाद से लगभग रोजाना इन शुल्कों का भुगतान कर रही थी और अब तक 100,000 डॉलर से अधिक चुका चुकी है।

सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार, अमेरिकी कस्टम अधिकारियों ने केवल मार्च महीने में ही धारा 122 के तहत लगभग 8 अरब डॉलर के टैरिफ वसूले थे। यह आंकड़ा छोटे व्यवसायों के समूह “वी पे द टैरिफ्स” ने जारी किया। फैसले के बाद समूह के प्रमुख डैन एंथनी ने बयान में कहा, “आज का फैसला उन छोटे व्यवसायों के लिए सकारात्मक खबर है जो इन गैरकानूनी करों से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। अदालत को इससे आगे जाकर अपील प्रक्रिया के दौरान भी इन टैरिफ की वसूली पर रोक लगानी चाहिए थी।”

ट्रेड कोर्ट ने खारिज किए प्रशासन के तर्क

ट्रेड कोर्ट ने प्रशासन के उस तर्क को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि “बैलेंस-ऑफ-पेमेंट्स घाटा”- जो धारा 122 के तहत टैरिफ लगाने की एक प्रमुख शर्त है- एक “लचीला शब्द” है। अदालत ने कहा कि ट्रंप की ओर से जारी घोषणा में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि 1974 के कानून के अर्थों में वास्तव में ऐसा भुगतान संतुलन घाटा मौजूद था। इसके बजाय प्रशासन ने “ट्रेड और करंट अकाउंट घाटे” को उसका विकल्प बनाकर पेश किया। जज मार्क ए. बार्नेट और क्लेयर आर. केली बहुमत में थे, जबकि जज टिमोथी सी. स्टैंस्यू ने असहमति जताई।

यह फैसला कांग्रेस की मंजूरी के बिना टैरिफ लगाने की राष्ट्रपति की कोशिश को लगा ताजा झटका है। इससे पहले लगाए गए शुल्क, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी को रद्द कर दिया था, एक अलग कानून, इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत लगाए गए थे। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ट्रंप ने अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। इसके बाद आयातकों ने लगभग 170 अरब डॉलर की रिफंड मांग को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू कर दी थी।

अमेरिकी न्याय विभाग अब इस नए फैसले को यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फेडरल सर्किट में चुनौती दे सकता है। यही अदालत पिछले टैरिफ विवाद में भी ट्रंप प्रशासन के खिलाफ फैसला दे चुकी है। ट्रंप प्रशासन पहले से ही अगले टैरिफ प्लान पर काम कर रहा है, हालांकि उन शुल्कों को लागू होने में अभी कई महीने लग सकते हैं।

अमेरिका ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत कई देशों की जांच कर रहा है। इसमें जबरन श्रम प्रथाओं और अत्यधिक मैन्युफैक्चरिंग क्षमता जैसे मुद्दों की जांच शामिल है। उम्मीद है कि इस प्रक्रिया के बाद नए टैरिफ लगाए जा सकते हैं। इस बीच व्हाइट हाउस जुलाई तक की अवधि को संभालने के लिए धारा 122 के तहत लगाए गए टैरिफ पर निर्भर था, क्योंकि तब तक कुछ व्यापार जांच पूरी होने की संभावना है।

यह समय ट्रंप के लिए अगले सप्ताह चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ होने वाली बैठक से पहले चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा कर सकता है। टैरिफ लगाने की उनकी एकतरफा शक्ति सीमित होने से उनकी बातचीत की ताकत भी कमजोर पड़ सकती है। धारा 122 राष्ट्रपति को 150 दिनों तक अधिकतम 15 प्रतिशत शुल्क लगाने की अनुमति देती है, जब अमेरिका कानून के अनुसार “अंतरराष्ट्रीय भुगतान संबंधी गंभीर समस्याओं” का सामना कर रहा हो।

ट्रंप द्वारा टैरिफ लगाए जाने से पहले ही अर्थशास्त्रियों और नीति विशेषज्ञों के बीच इस बात पर बहस चल रही थी कि क्या राष्ट्रपति इस कानून के तहत मजबूत कानूनी आधार तैयार कर पाएंगे। धारा 122 लागू करने संबंधी घोषणा में ट्रंप ने कहा था कि टैरिफ इसलिए जरूरी हैं क्योंकि अमेरिका “बड़े और गंभीर” व्यापार घाटे का सामना कर रहा है।

उन्होंने यह भी कहा था कि विदेशों में अमेरिकी निवेशों से होने वाली आय का नकारात्मक नेट फ्लो और अन्य संकेत यह दिखाते हैं कि दुनिया के बाकी हिस्सों के साथ अमेरिका का बैलेंस-ऑफ-पेमेंट्स संबंध कमजोर हो रहा है। इस कानून के तहत राष्ट्रपति को अल्पकालिक आधार पर अमेरिका में आयातित वस्तुओं पर टैरिफ लगाने का अधिकार है, ताकि देश में आने-जाने वाले धन के प्रवाह से जुड़ी चिंताओं का समाधान किया जा सके।

इन चिंताओं में “अमेरिका का बड़ा और गंभीर बैलेंस-ऑफ-पेमेंट्स घाटा” और “डॉलर के मूल्य में आसन्न और महत्वपूर्ण गिरावट” शामिल हैं। ट्रंप जिन अन्य कानूनी विकल्पों के जरिए टैरिफ लगाने की कोशिश कर सकते हैं, उनके मुकाबले धारा 122 का इस्तेमाल बिना किसी संघीय एजेंसी की जांच पूरी हुए भी किया जा सकता है।

छोटे बिजनेसेस, राज्यों ने दी अदालत में चुनौती

छोटे व्यवसायों और राज्यों ने अदालत में ट्रंप द्वारा इस कानून के इस्तेमाल को चुनौती देते हुए कहा कि अमेरिका द्वारा दशकों पहले गोल्ड स्टैंडर्ड छोड़ने के बाद धारा 122 अप्रासंगिक हो चुकी है। उनका कहना है कि ट्रंप ने इस कानून का इस्तेमाल सही ठहराने के लिए “बैलेंस-ऑफ-पेमेंट्स घाटे” और अमेरिका के व्यापार घाटे को गलत तरीके से एक समान बताने की कोशिश की।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि धारा 122 के तहत टैरिफ लागू करने संबंधी ट्रंप का आदेश “कई चूकों और गलत व्याख्याओं” से भरा हुआ था, खासकर बैलेंस-ऑफ-पेमेंट्स घाटे की परिभाषा को लेकर। राज्यों ने कहा कि ट्रंप जिस व्यापार घाटे का हवाला दे रहे हैं, वह देश की बैलेंस-ऑफ-पेमेंट्स स्थिति की गणना का केवल एक हिस्सा है। राज्यों ने यह भी तर्क दिया कि ट्रंप के नए टैरिफ धारा 122 की अन्य शर्तों का भी उल्लंघन करते हैं। इनमें यह शर्त शामिल है कि ऐसे शुल्क भेदभावपूर्ण नहीं होने चाहिए।

राज्यों के अनुसार ट्रंप के नए टैरिफ में कनाडा, मैक्सिको, कोस्टा रिका, डोमिनिकन रिपब्लिक, अल साल्वाडोर, ग्वाटेमाला, होंडुरास और निकारागुआ से आने वाले कुछ सामानों को अनुचित तरीके से छूट दी गई। याचिका के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने IEEPA टैरिफ से जुड़े पहले के मुकदमे के दौरान स्वीकार किया था कि व्यापार घाटा और बैलेंस-ऑफ-पेमेंट्स घाटा “सैद्धांतिक रूप से अलग” चीजें हैं।

IEEPA रिफंड विवाद

धारा 122 को लेकर यह कानूनी लड़ाई ऐसे समय तेज हुई है जब ट्रंप के IEEPA टैरिफ से जुड़े रिफंड विवाद भी गर्माने लगे हैं। कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड के एक अन्य जज रिचर्ड ईटन इस बड़े रिफंड मामले की निगरानी कर रहे हैं। उन्होंने कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन (CBP) को निर्देश दिया है कि सरकार जिस बड़े पैमाने पर स्वचालित प्रक्रिया के जरिए रिफंड जारी करेगी, उसकी नियमित जानकारी उन्हें दी जाए।

अमेरिकी कस्टम एजेंसी ने अप्रैल के आखिर में रिफंड पोर्टल शुरू किया था और इस सप्ताह आयातकों के बैंक खातों में शुरुआती भुगतान पहुंचना शुरू हो गया। हालांकि अभी भी इस बात को लेकर सवाल बने हुए हैं कि रिफंड क्लेम प्रक्रिया का दायरा कितना बड़ा होगा और क्या उपभोक्ताओं के पास उन कंपनियों के खिलाफ कोई कानूनी विकल्प होगा जिन्होंने टैरिफ लागत को कवर करने के लिए कीमतें बढ़ा दी थीं।

इन मामलों की सुनवाई “Oregon v. Trump, 26-cv-1472” और “Burlap and Barrel Inc. v. Trump, 26-cv-1606” शीर्षक से यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड, मैनहट्टन में चल रही है।

First Published : May 8, 2026 | 8:52 AM IST