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US-Iran War: लगभग छह हफ्तों से जारी तनाव के बीच अब हालात संभालने की कोशिश शुरू हो गई है। अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में अहम बातचीत होने जा रही है। दो हफ्ते का नाजुक युद्धविराम फिलहाल कायम है, लेकिन इजरायल के लेबनान में जारी हमलों से हालात पूरी तरह शांत नहीं माने जा रहे। उधर, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान के कड़े नियंत्रण से वैश्विक तेल बाजार भी दबाव में है। ऐसे में यह वार्ता काफी अहम मानी जा रही है।
यह बातचीत सप्ताहांत में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में होगी। प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif के न्योते पर दोनों देशों ने बातचीत के लिए सहमति दी है। ईरान का प्रतिनिधिमंडल पहले ही पहुंच चुका है, जबकि अमेरिकी टीम रास्ते में है। बैठक का सटीक स्थान सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन कड़े सुरक्षा इंतजामों के बीच किसी हाई-सिक्योरिटी होटल में इसके होने की संभावना है।
अमेरिका की तरफ से उपराष्ट्रपति JD Vance बातचीत की अगुवाई करेंगे। उनके साथ विशेष दूत Steve Witkoff और राष्ट्रपति सलाहकार Jared Kushner भी शामिल हैं।
ईरान की ओर से विदेश मंत्री Abbas Araghchi और संसद अध्यक्ष Mohammad Bagher Ghalibaf प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं। इनके साथ सुरक्षा और आर्थिक मामलों के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहेंगे।
यह बातचीत 2015 के परमाणु समझौते के बाद दोनों देशों के बीच सबसे उच्च स्तर के संपर्कों में से एक मानी जा रही है।
जानकारी के मुताबिक, बातचीत सीधे आमने-सामने नहीं होगी। दोनों देशों के प्रतिनिधि अलग-अलग कमरों में बैठेंगे और पाकिस्तान के अधिकारी उनके बीच संदेश और प्रस्ताव पहुंचाएंगे। मुख्य मुद्दों में तनाव कम करना, हमले रोकना और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर सहमति बनाना शामिल है।
इस्लामाबाद को पूरी तरह हाई अलर्ट पर रखा गया है। शहर में 10 हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं। रेड जोन को सील कर दिया गया है और केवल अधिकृत लोगों को ही प्रवेश की अनुमति है। जगह-जगह चेकिंग हो रही है और निगरानी के लिए कंट्रोल रूम भी बनाया गया है। बैठक के दौरान किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए शहर में सार्वजनिक अवकाश भी घोषित किया गया है।
पाकिस्तान के दोनों देशों से पुराने और संतुलित संबंध हैं। ईरान ने 1947 में पाकिस्तान को सबसे पहले मान्यता दी थी और दोनों के बीच गहरे सांस्कृतिक और रणनीतिक रिश्ते हैं। वहीं, पाकिस्तान अमेरिका का भी अहम साझेदार रहा है और उसे मेजर नॉन-नाटो सहयोगी का दर्जा मिला हुआ है। हाल के महीनों में सेना प्रमुख Asim Munir की सक्रिय कूटनीति और चीन के समर्थन ने भी इस पहल को मजबूत किया है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इस पूरे विवाद का अहम केंद्र बना हुआ है। संघर्ष के दौरान ईरान ने इस रास्ते पर नियंत्रण कड़ा कर दिया था, जिससे दुनिया भर में तेल की सप्लाई प्रभावित हुई और बाजार में अस्थिरता बढ़ी। अमेरिका चाहता है कि यह रास्ता पूरी तरह खोला जाए, जबकि ईरान इस पर अपनी पकड़ मजबूत रखना चाहता है। यही मुद्दा बातचीत को और जटिल बना रहा है।